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Monday, 25 August 2008

चलो, तारलौकि‍क संचार माध्‍यम से पर्व मनायें!


जन्‍माष्‍टमी से मुझे ख्‍याल आया, सन् 1988-90 के आसपास जब केबल चैनलों की बाढ़ नहीं आई थी, तब दूरदर्शन ही एकमात्र सहारा हुआ करता था। हम लोग रामानंदीय रामायण की पीढ़ी के थे, जैसे आज के दर्शक स्‍वयं को एकता कपूर की पीढ़ी के कह सकते हैं। तब दूरदर्शन पर त्‍योहारों के अनुसार कार्यक्रम दि‍खाए जाते थे, उसी तरह आजकल सास-बहू मार्का सीरि‍यलों में त्‍योहारों के अनुरूप कहानी घसीटकर लाई जाती है। अब लोग इस तरह टी.वी के सामने ही बैठकर त्‍योहार मना लेने का तारलौकि‍क सुख (केबल तार का संचार माध्‍यम) प्राप्‍त कर लेते हैं। समरस हो जाने के बाद दर्शकों को मि‍थ्‍याभास हो जाता है कि‍ इस बार उन्‍होंने तुलसी,साधना, प्रेरणा आदि‍ के साथ जमकर जश्‍न मनाया।

खैर, दूरदर्शन के जमाने में तब मैं अपने भाई-बहन के साथ रात के 12 बजने का इंतजार करता था, कि‍ अब कन्हैया कारावास में जन्म लेंगे और नंद उन्हें यमुना की लहरों को चीरते हुए यशोदा के पास ले जाएंगे। दरअसल, यह बि‍म्‍ब आज तक मन में इसलि‍ए बसा हुआ है क्‍योंकि‍ ऐसा एक कैलेण्‍डर अमुमन हर पॉंचवे घर में तब पाया जाता था। भाई बहन तो छोटे थे इसलि‍ए कृष्‍ण जन्म से पहले ही वे सो जाते थे। अगली सुबह उन्हें अफसोस होता और मैं उन्‍हें अगले साल जगाए रखने का आश्‍वासन देकर संतुष्‍ट करता।
अगले साल जन्‍माष्‍टमी में जब हम एक साथ जगे तब ये देखकर हम सभी उदास हो गए कि‍ दूरदर्शन पर कृष्‍ण जन्‍म को संगीतमय शास्‍त्रीय नृत्‍य के रूप में प्रस्‍तुत कि‍या गया है जो हमारी समझ से तब परे था और ऊबाऊ भी।

बहरहाल, अब ऊबने का सवाल ही नहीं उठता। अब गणेश या कृष्‍ण पर एनीमेटेड फि‍ल्‍म देखना या सीरि‍यल में घुसकर पर्व मनाना बहुत आसान हो गया है। तो आपने कृष्‍ण जन्‍मोत्‍सव कैसे मनाया?

11 comments:

pallavi trivedi said...

satya kaha aapne...

रंजन said...

रही सही कसर शायद रीमॊट ने पुरी कर दी...

P. C. Rampuria said...

बहुत सही सही चित्रण कर दिया है आपने !
कुछ बताने की गुंजाइश ही नही छोडी !
शुभकामनाएं !

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

टेलीविजन तो हमारे मनमस्तिष्क को ऐसा कुन्द बनाता जा रहा है कि कभी-कभी ठहर कर सोचने पर चिन्ता होने लगती है। एकता कपूर ने अकेले हमारे मध्यम वर्ग को जितना कुप्रभावित किया है उतना तो १०-२० मल्टीनेशनल कम्पनियाँ भी मिलकर नहीं कर पातीं। लगता है यह देश कभी प्रेमचंद, टैगोर, तिलक, विवेकानंद और गान्धी का था ही नहीं।

जितेन्द़ भगत said...

सिद्धार्थ जी, टी.वी. को लेकर आपकी चि‍न्‍ता वाजि‍ब है। सच है- प्रेमचंद, टैगोर, तिलक, विवेकानंद और गान्धी जैसे चि‍न्‍तक अब रहे नहीं। दरअसल पिछले साठ सालों में परि‍स्‍थि‍ति‍याँ बहुत तेजी से बदलीं हैं।

Tarun said...

kya shandar vishleshan diya hai "रामानंदीय रामायण की पीढ़ी"...hume bhi isi piri ke hain.

Baat bahut sahi kahi hai, Doordarshan dekhke Thore me hi Kyada ka maja aata tha.

ab jyada hai phir bhi thora sa bhi maja nahi aata

योगेन्द्र मौदगिल said...
This comment has been removed by the author.
योगेन्द्र मौदगिल said...

आपको समर्पित करता हूं कि--

तीज क्या त्यौहार क्या..?
है भला अब प्यार क्या..?
टीवी बचपन से कहे,
देख लो संसार क्या..?

----सादर-----------

Neelima said...

धन्य है यह तारलौकिकता !

अनुराग said...

sahi kah rahe ho bhai....albatta ham jag nahi paate the...

Anonymous said...
This comment has been removed by a blog administrator.