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Sunday, 31 August 2008

जब अमेरि‍का मेरे मुँह में फँसा !

मेरी पत्‍नी सुबह के नाश्‍ते के लि‍ए कुछ न कुछ रि‍सर्च करती रहती है। इस रि‍सर्च का ऑबजेक्‍ट मैं हूँ, इसलि‍ए भला-बुरा खाकर हर हाल में कहना पड़ता है- ‘क्रंची’! जल में रहकर मैं तो मगर से बैर नहीं कर सकता, आखि‍र नई-नई शादी जो है, (हालॉंकि‍ एक संतान भी है और शादी का चौथा साल भी चल रहा है, पर नई कहने में ताजगी का अहसास होता है और नि‍भाते जाने का हौसला भी मि‍लता है।)
तो, आज सुबह नाश्‍ते में पीला भुट्टा पेश कि‍या गया, जि‍से आपकी भाषा में ‘अमेरि‍कन कॉर्न’ कहा जाता है। मैं देशी भुट्टे तो खाता ही रहता हूँ पर बारि‍श हो रही हो तो उसका मजा दुगुना हो जाता है और इसे शाम को सबके साथ बैठकर खाने में और भी मजा आता है।

खैर, आज न तो बारि‍श हो रही थी और न ही शाम का समय था। पत्‍नी ने घोषणा कर दी कि‍ हफ्ते में दो-तीन सुबह नाश्‍ते में अमेरि‍कन कार्न ही दि‍या करुंगी, स्‍वास्‍थ के लि‍ए अति‍ लाभप्रद रहेगा। मेरी हालत बिंगो चि‍प्‍स के ऑब्‍जेक्‍ट की तरह लग रही थी। इस पि‍लपि‍ले नाश्‍ते को मैं खा तो गया पर मेरे दॉंतों मे ये कई जगह फँस गया। जब मैं अंगुली से ही इसे बाहर निकालने लगा तो मेरा डेढ़ साल का बेटा मुझे अचरज से देखने लगा। उसे लग रहा था कि‍ मैं उसे मुहँ में ऊंगली‍ लगाए रखने के लि‍ए डाँटता रहता हूँ और खुद ऊंगली लगा रहा हूँ। तभी मेरा दोस्‍त वि‍जय आ गया और पूछा- दॉंतों में कोई तकलीफ है क्‍या? मैंने खीजकर कहा- मेरे मुँह मे..... वो क्‍या कहते हैं... हॉं, अमेरि‍का फँस गया है। पत्‍नी ने जोड़ा- अमेरि‍का नहीं, अमेरि‍कन कॉर्न!
‘’हॉं-हॉं वही, आजकल अमेरि‍का मुँह को भी कब्‍जाने लगा है। भई ये मुँह है, कोई इराक, अफगानि‍स्‍तान थोड़े ही है’’- यह कहकर मैं टूथ-पि‍क ढूंढ लाया और अमेरि‍का को नि‍काल बाहर कि‍या।
( मेरी पत्‍नी ये पोस्‍ट पढ़ लेगी तो हफ्ते भर मुझे नाश्‍ता नहीं मि‍लेगा।)

9 comments:

Lovely kumari said...

jaldi se e-mail dijiye unka taki aapko sabak sikhaye :-)

Arvind Mishra said...

इसे पढ़कर तो वह मुहावरा याद आ गया -मियाँ यह मुंह और मसूर की दाल ....तो दाढ़ में अमेरिका तो फसेगा ही .काश मेरे जैसा जौनपुरी होते तो इस अमरीकी भुट्टे को भी कच्चा ही चबा जाते ......यहाँ भारत में .जौनपुर में भुट्टा सबसे ज्यादा होता है !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

खुदा खैर करे!

Nitish Raj said...

हफ्ते भर के लिए अब तो नहीं मिलेगा नाश्ता और खाना भी नहीं मिलेगा। वैसे अपने भुट्टे भी फंस जाते हैं।

राज भाटिय़ा said...

बाप रे, कही आप ने भुट्टा जड समेत तो नही खा लिया,:)

अनूप शुक्ल said...

"जब अमेरि‍का मेरे मुँह में फँसा !"- मन किया चबा जायें।

Anil Pusadkar said...

yahan barsaat ho rahi hai aur bhutte khana ka maza aapne dila diya

डा. अमर कुमार said...

.

वह टूथ-पिक मुझे दे दे ज़ालिम..
नहीं तो भाड़े पर ही उठा दे.. ओसामा तुझे मालामाल कर देगा ।

Rahul Singh said...

रोजमर्रा में रचनात्‍मकता रोचक है.