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Friday, 5 September 2008

हर ‘बाल्‍टी’ डस्‍ट-बीन नहीं होती और हर ‘डस्‍ट-बीन’ बाल्‍टी नहीं होता !!

पि‍छले कई हफ्तों से मैं अपने बेटे को डस्‍ट-बीन में कागज के टुकड़े, पॉलि‍थीन आदि‍ फेंकने का अभ्‍यास करा रहा हूँ। वो एक साल, पॉंच महि‍ने का ही है और अभी पुनरावृत्‍ति‍ वाले शब्‍दों, यानी मम्, दा-दा, दे-दे, मम्‍मा, ला-ला जैसे शब्‍दों को ही बोल पाता है। इन शब्‍दों को अभी वह कि‍सी अभीष्‍ट अर्थ से ‘को-रि‍लेट’ नहीं कर पाता है, या यों कहें कि‍ सभी अर्थों के लि‍ए वह इन सीमि‍त शब्‍दों का ही जी-जान से उपयोग करता है। अब यह माता-पि‍ता के ‘सिक्‍‍स्‍थ सेंस’ पर नि‍र्भर करता है कि‍ वे उसकी शब्‍दहीन पहेली को बूझें या फि‍र उसे रोने-चि‍ल्‍लाने के लि‍ए छोड़ दें।

कि‍सी रेडि‍यो प्रोग्राम में एक सर्वे के बारे में मैं सुन रहा था, जो संभवत ब्रि‍टेन में पर्यावरण वि‍भाग द्वारा कराया गया था। वहॉं तमाम स्‍कूलों में जाकर 10 साल तक के बच्‍चों को जानवर और पेड़-पौधों की तस्‍वीरें दि‍खाई गई। लगभग एक ति‍हाई बच्‍चे ऐसे थे जि‍न्‍हें कैट-डॉग से आगे कुछ नहीं पता था। पर्यावरणवि‍दों का नि‍ष्‍कर्ष था कि‍ आप आनेवाले समय में इन बच्‍चों से कैसे उम्‍मीद करते हैं कि‍ बड़े होने पर इनमें पर्यावरण को लेकर कोई जागरुकता आएगी। यह पर्यावरण के संकट को समझने या देखने का एकतरफा नजरीया हो सकता है। मैं ये भी नहीं कहता कि‍ डस्‍ट-बीन के अभ्‍यास से दि‍ल्‍ली या हि‍माचल प्रदेश को साफ रखने में मेरे बेटे की कोई खास भूमि‍का होगी। मैं सि‍र्फ साफ-सफाई की समझ को बच्‍चों में शुरू से ही वि‍कसि‍त करने की बात कह रहा हूँ।


तो, मेरे बेटे का, डस्‍ट-बीन का अभ्‍यास इतना ठोस हो गया है कि‍ अब मेरी कि‍ताबें, मेरा मोबाइल, चाबी, आलू-प्‍याज, चम्‍मच आदि‍- गुम होने पर डस्‍ट-बीन में ही मि‍लती हैं। मैं उसमें अब ये वि‍वेक जगाने की कोशि‍श कर रहा हूँ कि‍ डस्‍ट-बीन में क्‍या फेंकना है, और क्‍या नहीं फेंकना!
आज हुआ ये कि‍ उसने घड़े से ढक्‍कन हटाया तो मैने कहा- ऐसा मत करो, इसको हटाने से डस्‍ट अंदर चली जाती है। वह कमरे में गया और अखबार का टुकड़ा लाकर उस घड़े में डालने लगा। मैंने अपने वाक्‍य पर दुबारा ध्‍यान दि‍‍या- ‘ढक्‍कन हटाने से डस्‍ट अंदर चली जाती है’। मैं समझ गया कि‍ बच्चा रि‍सर्च का पहला पाठ सीख रहा है। अब मुझे लग रहा है कि‍ उसमें ये वि‍वेक भी जगाना जरुरी है कि‍ हर ‘बाल्‍टी’ डस्‍ट-बीन नहीं होती और हर ‘डस्‍ट-बीन’ बाल्‍टी नहीं होता। वैसे, बड़ों में भी इस वि‍वेक की कमी पाई जाती है। एक तरफ, वे अच्‍छी चीजों को कूड़ा समझते हैं, जबकि‍ दूसरी तरफ, कूड़ेदान से भी सार-तत्‍व नि‍काल लाते हैं।

24 comments:

महामंत्री-तस्लीम said...

चिन्ता की बात नहीं बच्चा जल्दी ही मोबइल, किताबों और गैर जरूरी चीजों में फर्क करना सीख जाएगा। आप उसके विकास के प्रति सजग है, यह महत्वपूर्ण बात है।

seema gupta said...

कि‍ताबें, मेरा मोबाइल, चाबी, आलू-प्‍याज, चम्‍मच आदि‍- गुम होने पर डस्‍ट-बीन में ही मि‍लती हैं। मैं उसमें अब ये वि‍वेक जगाने की कोशि‍श कर रहा हूँ कि‍ डस्‍ट-बीन में क्‍या फेंकना है, और क्‍या नहीं फेंकना!
"ha ha ah great article to read, we all face same type of problem some time, and it also irretates me when kids do this type of mistake, but your article about it is very useful that we should handle it with care as kids are at learning stage and they need proper guiedence what to do and not" thanks for the post.

Regards

संगीता पुरी said...

बहुत ही अच्छा।

जितेन्द़ भगत said...

मेरे मि‍त्र ने फांन पर कहा कि‍ आलू-प्‍याज छोड़कर बाकी चीज़ें डस्‍ट-बीन में ही छोड़ दि‍या करो- क्‍योंकि‍ इन्‍होंने सबका जीना हराम कर रखा है- कि‍ताबें, मोबाइल, चाबी,चमचा.......

अनुराग said...

संभल जाए अब केवल dust bin ही नही आपको अपनी बोलचाल की भाषा पर भी गौर करना होगा....बच्चा एक सबसे बेहतरीन विधार्थी होता है वो वही करता है जो देखता है .....आपको सिर्फ़ ये ध्यान रखना है की आप उसी तरह का जीवन जिए जैसा आप उसे बनाना चाह रहे है ...तो उसे कुछ सिखाने की जरुरत नही पड़ेगी वो ख़ुद सीख जायेगा

विनीत कुमार said...

aji kuch log to aise bacche ko dekhkar hi dust-bin generation kahte hai, jiski aaj sabse acchi khapat aur demand hai,aapka ladka bada hokar jarur koi bada producer banega aur aalu aur mobile ke beech kuch pasctiche paida karega.
aap bahut hi khushnaseeb baap hone jaa rahe ho, badhai

Lovely kumari said...

आप अच्छे और जिम्मेदार पिता की भूमिका का निभा रहें हैं यह टिप्पणी आपके उत्साहवर्धन के लिए.




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एक अपील - प्रकृति से छेड़छाड़ हर हालात में बुरी होती है.इसके दोहन की कीमत हमें चुकानी पड़ेगी,आज जरुरत है वापस उसकी ओर जाने की.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बच्चे तो कच्ची मिटटी के समान है .वह सब वही सीखते हैं जो हम उन्हें bataate हैं यह pankti बहुत सही likhi है आपने
एक तरफ, वे अच्‍छी चीजों को कूड़ा समझते हैं, जबकि‍ दूसरी तरफ, कूड़ेदान से भी सार-तत्‍व नि‍काल लाते हैं।

notepad said...

मज़ेदार पोस्ट ।वैसे क्या फेंकना है की समझ अक्सर बड़ो मे भे दुर्लभ ही है।

भाषा का बच्चे के संज्ञानात्मक ,भावात्मक विकास मे कितना बड़ा हाथ है यह पुन:साबित हुआ।बच्चे को बेहतर भाषा दे पाए तो उसके व्यक्तित्व के गठन का आधे से ज़्यादा पूरा कर लिया समझो।

Radhika Budhkar said...

Achcha likha hain Aapne

Arvind Mishra said...

ऐसा तो नही कि आप कुछ ज्यादती कर रहे हैं?

Udan Tashtari said...

बहुत बढ़िया- जो सिखायेंगे वो उसकी सहज आदत हो जायेगी. कल स्विमिंग पूल में था, एक महिला अपने एक साल के बच्चे को स्विमिंग पूल में हाथ पैर मारना सिखा रही थी कि वाटर फीयर न रहे उसमें.

Tarun said...

is terah ki achhi adat jitne jaldi se daalen utna accha, aap accha sikha rahe hain seekh jaayega

रंजन said...

बहुत सही है.. बच्चे तो गिली मिट्टी जैसे होते है.. जैसा रुप देंगे वैसे हि हो जायेगें..

आपको बधाई

राज भाटिय़ा said...

सही जा रहे हे, लेकिन बच्चा अपने आप ही आप को देख कर सीख जायेगा, ज्यादा सीकाने से अच्छा हे आप जो भी करे उस के सामने सही करे, ओर फ़िर देखे बाप बेटा दोनो कितने समझ दार हो जायेगे :) धन्यवाद

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

मेरा बेटा भी डेढ़ साल का है... उससे काफ़ी कुछ सीखने और अपने को सुधारने का अवसर मिल रहा है।

बढ़िया और रोचक पोस्ट...।

योगेन्द्र मौदगिल said...

हर बाल्टी डस्टबीन नहीं होती.....
वाकई..
सही कहा भाई.
और सही सिखा रहे हैं आप.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

डस्ट-बिन-ज्ञान की सीढ़ी पर हैं - खुशी की बात है की आप कूदे-दान में से सार ढूंढ रहे हैं.

ताऊ रामपुरिया said...

दोस्त म्हारै हरयाने म तो बच्चे न पैदा होते ही
हम लोग तो बस लट्ठ पकड़ना सिखा दिया करै सें ! बाक़ी सब वो लट्ठ क धोरै अपने आप ही सीख लिया करै ! ज्यादा सिखावण की जरूत ही नी पड्या करती ! :)

शोभा said...

बहुत अच्छा विश्लेषण है किन्तु सच यही है कि संसार का हर प्राणी अपने विवेक से ही सीखता है। बच्चे बड़ों से अधिक समझदार होते हैं और बड़े बच्चों से अधिक मूर्ख।सस्नेह

vipinkizindagi said...

अच्‍छी पोस्ट...........

venus kesari said...

वैसे, बड़ों में भी इस वि‍वेक की कमी पाई जाती है। एक तरफ, वे अच्‍छी चीजों को कूड़ा समझते हैं, जबकि‍ दूसरी तरफ, कूड़ेदान से भी सार-तत्‍व नि‍काल लाते हैं।

अच्छा व्यंग है
अच्छे आलेख के लिए बधाई

वीनस केसरी

Anonymous said...

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