Related Posts with Thumbnails

Thursday, 11 September 2008

रब्‍बा, इश्‍क दा लग्या रोग.......

सन् 1996 की बात है, जब मैं दि‍ल्‍ली के एक कॉलेज से बी.ए.कर रहा था और द्वि‍तीय वर्ष में था, जब मेरी नादानी(दूसरों की नजर में बेवकूफी) बरकरार थी। 'कोक' को काली शराब समझकर न पीनेवाले को बेवकूफ ही तो समझा जाएगा। स्‍कूल-हॉस्‍टल के कड़े अनुशासन से नि‍कलने के बाद कॉलेज की स्‍वच्‍छंदता में जो सबसे ज्‍यादा रास आया था, वह थी लड़कि‍यों से बात करने की आजादी। जि‍स सरकारी स्‍कूल से पढ़कर नि‍कला था, वहॉं गणि‍त के एक शि‍क्षक हुआ करते थे- मि‍श्रा जी। लड़कि‍यों से बात करना तो दूर, उनकी तरफ ऑंख उठाकर देखने पर भी वे लड़कों की भीषण पि‍टाई कर दि‍या करते थे। जाहि‍र है, लड़कि‍यॉँ हम जैसों के लि‍ए एक हव्‍वा बनती जा रही थी, जि‍ससे दूर रहना चाहि‍ए। ऐसे में कॉलेज मे जब कोई लड़की बात करने, या कुछ पूछने के लि‍ए मेरे पास आती थी, तब मैं डर जाता था कि‍ कहीं से मि‍श्रा सर घूर तो नहीं रहे हैं! जब ये भरोसा हो चला कि‍ अब कॉलेज में कोई मि‍श्रा सर नहीं है तब धीरे-धीरे सकुचाहट मि‍टने लगी और जल्‍दी ही कई लोगों से दोस्‍ती हो गई। नई-नई आजादी थी, लगता था सब-कुछ हासि‍ल कर लूँ।प्रेमी-प्रेमि‍का के जोड़ों को देखकर लगता था कि‍ भगवान ने इन्‍हें कि‍तना खुशनसीब बनाकर भेजा है। लोगों ने भड़काया कि‍ जि‍से मैं पसंद करता हूँ, उसे खत लि‍खकर इश्‍क का इजहार कर लूँ। लोग इस तरह पीछे पड़े रहे कि‍ मुझे लगने लगा अगर मैं जल्‍दी ही कोई कदम न उठाऊँ तो लोग मुझे नकारा और नालायक समझने लगेंगे। सि‍र्फ इस बेइज्‍जती से बचने के लि‍ए मैंने कदम उठा ही लि‍या, माफ करें, कदम नहीं, कलम। एक वो दि‍न था, और आज एक ये दि‍न है। मैने जीवन में फि‍र दुबारा कि‍सी को इजहारे-इश्‍क का तो क्‍या, वैराग के लि‍ए भी कोई खत नहीं लि‍खा।उस खत में तो दोस्‍ती के लि‍ए सि‍र्फ अपील की गई थी लेकि‍न पूछकर की गई दोस्‍ती को तो इश्‍क का दर्जा दे दि‍या जाता है। खैर, वहॉं से ठुकराए जाने के बाद मैंने बाकी सारे चक्‍कर छोड़ दि‍ए और तब सौभाग्‍य से मै तीनों साल उस कॉलेज का टॉपर रहा। उस खत को उसने मुझे सरे-आम वापस कर दि‍या, तब मुझपर जो बीती, उसे यहॉं कवि‍ताबद्ध कर रहा हूँ-


उसने मेरा ही खत
मुझको जब लौटाया-
लोग यही समझे कि‍
उसका जवाब आया।

लोग मचलने लगे
ख्‍वाब बुनने लगे,
जो नासमझ थे,
वे भी समझने लगे1

मैं भी सुनता रहा,
देख हँसता रहा,
पर कहीं चुपचाप,
गम था रि‍सता रहा।

बनके ऑंसू वही
थमके जम गई कहीं।
नज़रें झुकती गई,
ज़ुबॉं भी रुकती गई।


धूल जमता रहा,
खत भी खलता रहा।
खोल पन्‍ना वही,
जब पढ़ा मैंने फि‍र-

याद करने लगा,
जी था भरने लगा,
खुद को रोका तभी,
मन ने टोका था भी-

जो थी राहें चुनी,
थी वो बि‍ल्‍कुल सूनी।
न रहती खुद की खबर,
फि‍र था दुनि‍या का डर!

ये भी अच्‍छा हुआ
खुद खोदा कुऑं,
गि‍रके संभला भी मैं,
राहें ऐसी चुनी-

जि‍समें न हो दगा,
और फि‍र बढ़ने लगा;
आगे बढ़ता रहा;
दि‍न यूँ चढ़ता रहा।

काम खटका नहीं,
मैं भी भटका नहीं।
अब भी भूला न था,
पर थी कोशि‍श यही।

याद करता हूँ जब,
खुद पे हँसता हूँ अब।
जो थी भूलें मेरी
भूल सकता हूँ कब!

याद आता है दि‍न
वो घड़ी और वो पल
मेरा खत, जो न मि‍लता मुझे
क्‍यों फि‍र होता सफल!

-(1996, जि‍तेन्‍द्र भगत)


(नि‍ष्‍कर्ष: हर आदमी की सफलता के पीछे हर हाल में एक नारी का हाथ होता है, चाहे वो हाथ गाल पर थप्‍पड़ बनकर ही क्‍यों न पड़े!)

(सभी चि‍त्रों के लि‍ए गूगल का आभार।)

24 comments:

manvinder bhimber said...

उसने मेरा ही खत
मुझको जब लौटाया-
लोग यही समझे कि‍
उसका जवाब आया।
kya khoob ....bahut achcha

रंजना [रंजू भाटिया] said...

खूब है यह दस्ताने इश्क :)

seema gupta said...

याद करता हूँ जब,
खुद पे हँसता हूँ अब।
जो थी भूलें मेरी
भूल सकता हूँ कब!

"ha ha ha ha very interesting to know abt this unsaid love story, ye isqh nahee aasan..."

Regards

Lovely kumari said...

:-)

महामंत्री-तस्लीम said...

खुशनसीब थे, जो पहली बार में ही अक्ल आ गयी।
ह-ह-हा।
जीवन की सच्चाई से रूबरू कराने का शुक्रिया।

Advocate Rashmi saurana said...

bhut badhiya. jari rhe.

दीपक राजा said...

kavita achchhi hai aur
kavita ke bhav bhee

lekhnee chalatee rahe...

शोभा said...

अच्छा लिखा है. आपका अनुभव रोचक है बहुत से लोगों के साथ ऐसा होता है. कविता मैं भावों की सुंदर अभिव्यक्ति की गई है. बधाई.

Arvind Mishra said...

भई मान गए तुलसी के बाद एक तूं ही धरा पर अवतरित हुए -पत्नी का तिरस्कार उनको खान से कहाँ पहुँचा गया और प्रेयसी का आप्को !अस्थि चर्म मय देह में .......आप बच गए गुरू !

COMMON MAN said...

ch;ch;ch; hamen ek aur tulsi dass ji mil gaye hote.

डॉ .अनुराग said...

इक आग का दरिया है......डूब के जाना है........दास्तान बढ़िया रही......

pallavi trivedi said...

अपनी दास्ताँ को क्या खूब कविता में पिरोया है....मज़ा आया.

राज भाटिय़ा said...

भईया किस्मत वाले हो बच गये, अगर गले पद जाती तो ... हम ने देखे हे बहुत से मजनू जो शादी के बाद सच मे मजनू बन गये, ओर गंजे भी हो गये.
धन्यवाद

Udan Tashtari said...

आशिकी मे चलता है-बहुत खूब रही. :)

venus kesari said...

इस लिए हमने ये रोग नही पाला


वीनस केसरी

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

यादें,
मीठी यादें,
अधूरेपन का अहसास दिलाती,
तडपाती,
फ़िर भी दिल को छू जाती,
यादें,
बहुत सुन्दर कविता, बधाई!

rakhshanda said...

याद करता हूँ जब,
खुद पे हँसता हूँ अब।
जो थी भूलें मेरी
भूल सकता हूँ कब!

याद आता है दि‍न
वो घड़ी और वो पल
मेरा खत, जो न मि‍लता मुझे
क्‍यों फि‍र होता सफल!

nayapan or freshness hai aapki nazm mein..

Nitish Raj said...

भई बहुत ही बढ़िया लेखन चल रहा है मियां कई रोज से आना नहीं हुआ था आज आया आपकी पोस्ट पर पढ़कर मजा आगया। और एक बात हर बाल्टी...इस पोस्ट को पहले सिर्फ पढ़ा था लेकिन अब तो अमल में लाना भी हो रहा है। बहुत ही उत्तम लेखन के लिए साधुवाद।

manu said...

well said, har hal me aadmi ki safalta k peeche naari ka hi haath hota hai. aapko to usne sahi rasta hi dikha diya .
shukrguzar hona chahiye

मोहन वशिष्‍ठ said...

वाह जी वाह जितेन्‍द्र जी पहले तो मुझे माफ करना कि इतने खूबसूरत ब्‍लाग से दूर रहा आपका लिखने का तरीका और लेयआउट करने का जो तरीका है बहुत ही काबिलेतारीफ है बधाई हो आपको

रंजन राजन said...

खूब है यह दस्ताने इश्क

ताऊ रामपुरिया said...

भाई जीतेन्द्र जी आपकी तो बात ही निराली है ! लगता है आप
लोगो की दुकाने बंद करवा कर ही रहोगे ! भई ताऊ पै तो रहम करणा !
झूंठी तारीफ़ नही करूंगा ! मैंने इस तरह का लेखन कम ही देखा है !
ईश्वर आपको ऐसे ही श्रेष्ठ लेखन की प्रेरणा देता रहे ! यही शुभकामना है !
बहुत धन्यवाद !

निरन्तर - महेंद्र मिश्रा said...

Ishk se labarej post kavita ke sath bahut hi achchi lagi. bahut khoob bhagat ji. dhanyawad.

Mrs. Asha Joglekar said...

भहुत बढिया थी आपके प्रेमभंग और उत्थान की ये दास्तान।