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Tuesday, 16 September 2008

आपके कॉलेज के स्‍टाफ-रूम में क्‍या-क्‍या बातें होती थी?

पहली बार जब बतौर गेस्‍ट लेक्‍चरार दि‍ल्‍ली के उसी कॉलेज में मुझे पढ़ाने का अवसर मि‍ला, जहॉं से पढ़कर मैं नि‍कला था, तब घबराया-सकुचाया-सा स्‍टाफ-रूम पहुँचा और सोफे पर फैलकर बैठे दूसरे लेक्चरार को पार करता हुआ दूर एक कुर्सी पर जा बैठा। कि‍सी स्‍टाफ-रूम को नजदीक से देखने-समझने का मेरा वो पहला अवसर था, जहॉं ‘रश आवर’ में लगभग 10 महि‍ला और 20 पुरूष लेक्‍चरार आमतौर पर बैठे मि‍ल जाते थे। कि‍सी मुद्दे पर कुछ लोग बहस कर रहे होते थे, कुछ सि‍र्फ सुन रहे होते थे और कुछ सि‍र्फ मुस्‍कुराकर हर दि‍न बच नि‍कलते थे। मुद्दे भी क्‍या होते थे- यार स्‍टाफ-रूम में अब तक ए.सी. नहीं लगा, पता नहीं फंड कहॉं जा रहा है........ अरे मि‍स्‍टर कृपलानी को देखा, बुढ़ापे में झक लाल कार खरीदी है और तबसे सूट और टाई पहनकर आने लगे हैं........., मि‍. वर्मा तो साल भर में एक सेशन भी ठीक से क्‍लास नहीं लेते और प्रिंसि‍पल भी उनसे कुछ नहीं कहते, जाने क्‍या सेटिंग है..............., अरे राय जी तो पागल हैं, हमेशा क्‍लास में फोटो-कॉपी बॉंटते रहते हैं, केवल सेमि‍नार आयोजि‍त कराने से क्या होता है, हमारे बीच स्‍टाफ-रूम में तो कभी बैठते नहीं..........., अरे मोहनलाल जी फर्स्‍ट ईयर की क्‍लास तो आजकल बि‍ल्‍कुल मि‍स नहीं करते, सुना है, उनके क्‍लास की वह स्‍टूडेंट मि‍स फेमि‍ना के लि‍ए चुनी गई है, अपना तो लक ही खराब है, पि‍छले पॉंच साल से लड़को को ही पढ़ा रहा हूँ, और जो स्‍टूडेंट आई भी, उनका रूप तो माशाअल्लाह........., और मि‍सेस लता का क्‍या कहना, क्‍लास के बाद कॉमर्स के रमण बाबू के साथ उनकी कार में बैठकर न जाने कहॉं की हवा खा रही हैं........अरे वाह, जूते तो ब्रांडेड लग रहे हैं, कि‍स कंपनी के हैं, और सर्ट.....,इस प्रकार कुछ और भी अंतरंग मुद्दे थे जि‍नके बारे में मैं बता नहीं सकता। जब स्‍टाफ-रूम में कोई महि‍ला शि‍क्षक नहीं होती तो शि‍क्षकों के मुँह से आपको गाली तक सुनाई पड़ सकती थी, और महि‍ला शि‍क्षकों की काया पर टीका-टि‍प्‍पणी तो श्रृंगार रस में डुबो-डुबोकर की जाती थी। ऐसे माहौल में वहॉं बैठकर अगली क्‍लास का इंतजार करना नारकीय हो जाता था।

जो कभी मेरे शि‍क्षक हुआ करते थे, अब वो मेरे कलि‍ग्‍स थे। अकेले में रस्‍तोगी सर पूछते थे- तुम्‍हारे समय में वि‍वेक जी कैसा पढ़ाते थे। मैं गोलमोल जवाब देकर नि‍कल लेता। कभी वि‍वेक जी मुझसे अकेले में पूछते- उस जमाने में रस्‍तोगी जी कैसा पढ़ाते थे, पढ़ाते भी थे या नहीं। गलती से मैंने कह दि‍या- उन्‍होंने तो कभी क्‍लास ली भी नहीं सर, और जो भी ली, उसमें गपशप मारकर चल दि‍ए‍। हश्र तो पता ही था, मुझे नि‍काले जाने की अंदरुनी राजनीति‍ शुरु हो गई और जैसा कि‍ अक्‍सर होता आया है, इसमें वे सफल हुए। आखि‍र सबको अपने सगे रि‍श्‍तेदारों के कैरि‍यर की भी तो चि‍न्ता थी। जाने कि‍सने, कि‍स अनुभव के बाद ये सूत्रवाक्‍य कहा होगा कि‍ सत्‍य की हमेशा जीत होती है।

तो, इस प्रकार, मेरे मन में शि‍क्षकों के प्रति‍ जो आदर्श छवि‍ बनी हुई थी, उसका धीरे-धीरे ध्‍वंस हो रहा था।‍ अगली कड़ी में कॉलेज से जुड़ी कुछ और खट्टी-मीठी यादों के साथ उपस्‍थि‍त हूँगा।
(उक्‍त सभी नाम काल्‍पनि‍क हैं)

24 comments:

डॉ .अनुराग said...

सही कहते हो बिरादर ...इसलिए कभी किसी ने ये भी कहा था की लिखने वालो से मत मिलो वरना उनकी रचनायों से शायद उतना मोह नही रहेगा

Udan Tashtari said...

अंदर की बात!!! अच्छा लगा आपका संस्मरण सुनना! आगे इन्तजार है.

निरन्तर - महेंद्र मिश्रा said...

joradaar posr
aap kisi mahila vidhyalaya me padhane kyo nahi lagate apki khvahish jarur poori ho jayegi.dhanyawad.

सुशील कुमार छौक्कर said...

अच्छा लिखा । अगली कडी का इंतजार है। जहाँ खट्टी मीठी बाते होगी।

PREETI BARTHWAL said...

बहुत बढ़िया अगली पोस्ट का इंतजार रहेगा।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

आप तो बड़े खतरनाक आदमी हो जी। बिना कैमरे के स्टिंग ऑपरेशन कर डाला, और वह भी गुरुजनों का। किसी कॉलेज में आपको अब घुसने नहीं दिया जाएगा।

जरा सम्हल के जइयो जी...।

Manish Kumar said...

chaliye aapke bahane humein bhi staff room ka mahoul janne ko mil gaya.

ताऊ रामपुरिया said...

जब स्‍टाफ-रूम में कोई महि‍ला शि‍क्षक नहीं होती तो शि‍क्षकों के मुँह से आपको गाली तक सुनाई पड़ सकती थी, और महि‍ला शि‍क्षकों
की काया पर टीका-टि‍प्‍पणी तो श्रृंगार रस में डुबो-डुबोकर की जाती थी।


ग़लत बात है ! अगर शिक्षक ऐसे करने लग पड़े तो हम गुरु चेले क्या करेंगे ! ये हमारे अधिकार क्षेत्र का हनन है और ज़रा मर्यादावादियों से
सावधान ! :)

Arvind Mishra said...

पहले पूरी पढ़ तो लें !

राज भाटिय़ा said...

अजी आप तो सब को नंगा कर रहे हे, चलिये अगली कडी का इंतजार रहेगा, वेसे मजा आ गया
धन्यवाद

seema gupta said...

, इस प्रकार, मेरे मन में शि‍क्षकों के प्रति‍ जो आदर्श छवि‍ बनी हुई थी, उसका धीरे-धीरे ध्‍वंस हो रहा था।‍
" great artical with homours examples, enjoyed reading it..."

Regards

रंजना [रंजू भाटिया] said...

इंसान ही तो है यह भी :) कैसे बच पायेंगे पर निंदा रस से ....बस आपको बहुत ध्यान से नही सुनना चाहिए था इन बातों को .क्यूंकि यह बातें तो अन्दर के बातें हैं .:) ..अच्छा लेख है ..यह बात स्टाफ रूम पर ही नहीं हर जगह एक सी है ..सामने कुछ और और बाद में कुछ और ..इन्तजार रहेगा अगली कड़ी का

Satyendra Prasad Srivastava said...

धन्य हैं ऐसे गुरु

vineeta said...

निंदक नियरे राखिये वाली कहावत चरितार्थ हो रही है. बढ़िया लिखा है. कॉलेज में छपी चिप कर स्टाफ रूम जाया करते थे. वो दिन याद आ गये.

COMMON MAN said...

maalko, har sarkari daftar me aisa hi hota hai.

Nitish Raj said...

भई जितेंद्र पढ़कर मजा आगा क्या बारीकी से गुरुजनों पर ही अपने अब तक के फेल होने और कम नंबर देने का राज एक साथ ही उजागर कर दिया। अरे गुरू आप तो अपने गुरुओं के भी गुरु निकले।

Gyandutt Pandey said...

आदर्श किसी न किसी स्तर पर टूटता है। न टूटे तो मर्यादा पुरुषोत्तम न हो जाये!

PREETI BARTHWAL said...

मैडमों के बीच स्टाफ रूम में तो जाना कम ही होता था पर अभी तक ये नहीं जानती थी कि क्या बातें होती हैं आज जान गई। निंदनीय।

अनूप शुक्ल said...

अरे शिक्षक कहां रहे बाद् में वो। वो तो आपके साथी हो गये। आगे के संस्मरण का इंतजार है।

Ek ziddi dhun said...

college staaff room ke male teachers ki ghatiya baaten utnee hee kachra hotee hain, jitni adhiktar mardon kee

Tarun said...

ये टोन और विषय दोनों ही जंच रहे हैं हैं बिरादर को, लेकिन धुड़की देने का असर भी दिख रहा है। ये चिट्ठाकार हैं ही ऐसे जब तक लात मारकर ना बताओ कि हम भी हैं लाईन में कोई मुँह नही लगाता। लगे रहो बिरादर।

अभिषेक ओझा said...

सच में ऐसा होता है? हम कभी-कभार इन बातों की अटकलें लगाते तो थे, पर कभी भरोसा नहीं होता था !

योगेन्द्र मौदगिल said...

Theek Farmaya BHAI...
lekin.......
khair...

रंजन राजन said...

अच्छा लिखा। अगली कडी का इंतजार रहेगा।