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Tuesday, 23 September 2008

वी.सी.आर. नाम की एक चीज़ हुआ करती थी !!

उम्र यही कोई 12-14 साल रही होगी। बोर्ड का इम्‍तहान अभी सर पर नहीं था, तब बाकी सामान्‍य बच्‍चों की तरह मेरे भी दो शौक हुआ करते थे- गाने सुनना और फि‍ल्‍में देखना। पर 1990 के शुरुआती दौर में ये दोनों शौक मछली मारने जैसे धीरज की मॉंग करते थे। फि‍ल्‍म देखने के लि‍ए सि‍नेमा हॉल जाने की जुर्रत तब एक बद्चलनी के रूप में देखी जाती थी। तब ले-देकर वी.सी.आर और वी.सी.पी. ही एक सहारा था,जि‍से कि‍राए पर लाकर फि‍ल्‍में देखना संभव हो पाता था। आज सी.डी. और डी.वी.डी के जमाने में इसका फुल-फॉर्म बमुश्‍कि‍ल याद आएगा- वि‍डि‍यो कैसेट रि‍कॉडर/ वि‍डि‍यो कैसेट प्‍लेयर।

इस तरह टी.वी. के बगल में वी.सी.आर. सेट कर दि‍या जाता, फि‍ल्‍मों की दो-तीन कैसेट एक साथ कि‍राए पर ले ली जाती, और शनि‍वार की शाम 6 बजे पहला शो चलता, डीनर के बाद दूसरा, और रवि‍वार सुबह 9 बजे से 10 बजे के बीच मॉं जब धार्मिक धारावाहि‍क (संभवत:महाभारत) सम्‍पन्‍न करके उठती तब तीसरा शो देखा जा सकता था। पर ऐसा शायद ही कभी हो पाया हो- मछली मारने की धीरज वाली बात मैंने यूँ ही नहीं कही थी। बि‍जली गुल होनी ही थी, अगर वो ठीक तो वी.सी.आर का हेड खराब नि‍कलता, अगर वो ठीक तो फि‍ल्‍म की रील घि‍सी-पीटी मि‍लती। सौभाग्‍य से यदि‍ ये ति‍कड़ी जम जाती तो अगले एक हफ्ते तक दोस्‍तों के बीच यही चर्चा करता- क्‍या गजब की फाइट थी, मि‍थुन ने एक घूंसा मारा, तो वि‍लेन जमीन में धॅस गया। डॉंसर भी कि‍तना बढ़ि‍या है ना-
‘’मैं से मीनो से न साकी से,..... दि‍ल बहलता है मेरा आपके आ जाने से।‘’
(बहुत दि‍नों बाद जब ये गाना फि‍र सुनाई पड़ा तो ये पता चला कि‍ मै इस गाने में जि‍से ‘मैं’ समझता था, वो दरअसल ‘मय’ था और तब जाकर इस गाने का मतलब समझ आया।)

एक-दो महि‍ने में इस प्रकार का आयोजन हमारे मोहल्‍ले के लि‍ए कि‍सी पर्व से कम न था। पर्व इसलि‍ए कह रहा हूँ कि‍ तब कि‍सी घर में वि‍डि‍यो फि‍ल्‍म चलती थी, तब कुछ पड़ोसि‍यों को बकायदा न्‍योता दि‍या जाता था और हम बच्‍चे इसे सूँघ लि‍या करते थे। जब कोई फि‍ल्‍म छूट जाती तब ये सोचता था कि‍ बड़ा होकर अपनी एक कैसेट लायब्रेरी बनाऊँगा और वहीं बैठकर सारी फि‍ल्‍में देख लूँगा।

आज जब ये बातें याद आती है तो हॅसी भी साथ चली आती है- आज जब अपने जीवन की प्राथमि‍कताऍ बदल गई हैं, तब वे बातें कि‍तनी बेतुकी लगने लगती हैं, जि‍से हम अपने बचपन में वर्षो तक संजोए हुए थे और उस बात का गुम हो जाना हमें सालता नहीं, बल्कि‍ ऐसी बातें आज हमें हैरान करती हैं कि‍ बचपन में क्‍या कभी हमने ऐसा भी सोचा था या कि‍या था?

जारी......

29 comments:

Tarun said...

बचपन के दिन याद दिला दिये बिरादर, हमने तो बकायदा केबल लगायी हुई थी २-३ घरों में, एक जगर रेंट करके लाया हुआ VCR चलता था और सब अपने अपने घर के टीवी में आराम से फिल्म देखते थे। मेरे ख्याल से ये बेताब या तेरी मेहरबानियां टाईप की फिल्मों के वक्त की बात होगी।

PD said...

क्या बात है.. आपने पुरानी याद ताजा कर दी.. आप तो तीन पर ही मान जाते थे, हमारे यहां तो चार कैसेट आते थे.. बाद में वी.सी.पी. खरीद लिया गया(जो अभी तक काम करता है) और फिर वो मजा ना रहा.. एक साथ 4 सिनेमा फिर शायद ही कभी देखे वी.सी.पी. पर..

seema gupta said...

" han sach kha aaj aapke ye post pdh kr aapna bhee bachpan yaad aa gya, us waqt mithun ka govinda ka jmana tha, or subke paas V.C.R hua bhee nahee krty thye, to hotta yun tha kee jub bhee aas pdos mey kise ke yhan koee picture chultee thee sub log jma ho jatey thye, kuch to baith jatey or kuch saree picture khde khde hee dekh laite thy...magar fir bhee bhut mja aata thaa... aaj ye sub bateyn dhundlee ho chukee hain, us waqt ke ye mastee aaj bevkufee nazar aatee hai... magar jo bhee tha bilkul aapke artical ke treh tha, sara nazara samne aa gya" thanks for sharing such childhood memories with us.."

Regards

योगेन्द्र मौदगिल said...

ye panktiyan aapko samarpit karta hoon ki

भई अपना-अपना वक्त रहा..
कहीं कोमल कहीं सख्त रहा..
मन तो ससुरा पागल है,
यादों में कम्बख्त रहा....

रंजन said...

बहुत पुरानी यादें ताजा कर दी.. जोधपुर में उन दिनों केबल भी नहीं हुआ करती थी.. केवल दुरदर्शन था..

हम भी VCR किराये पर लाते थे.. रात भर film ्देखने का प्रोग्राम चलता था.. किसी के घर VCR आता तो उनके घर भी चले जाते थे.. film देखने..

रंजना [रंजू भाटिया] said...

वाह मैं कल ही याद कर रही थी यह .वी सी आर .बच्चों को बता रही थी :) कि कैसे फिल्म देखते थे हम इस से

Anil Pusadkar said...

आज ढून्ढना पडेगा वीसीआर को,फ़िरसे ज़िन्दा कर दिया आपने उसे। अच्छी तस्वीर बनाई आपने गुज़रे ज़माने की।

Ghost Buster said...

बढ़िया संस्मरण. वीसीआर के साथ कुछ ऐसे ही अपने भी अनुभव हैं.

Gyandutt Pandey said...

तीन दशक पहले की याद आ गयी।
मेरे दफ्तर की एक डिंक (डबल इनकम नो किड्स) वाली क्लर्क ने कहा था कि उन्होंने "वीसीआर खरीदा है, मेरे हसबेण्ड को बहुत शोक है वीसीआर का"!

सौरभ कुदेशिया said...

kya yaadon ka mausam chala hai..maja aagaya

VCR to hamare yahan bhi hai, par ab na to chalta hai or na hi woh baat rahi..waise jab hum logo ne liya tha to aas pas ke 2-3 mohhallo main shayad hamare hi pass tha..Mithun da, amitabh or govina ki khoob filme dekhi.

pallavi trivedi said...

सचमुच बचपन के दिन याद आगये....हमारे मोहल्ले में भी यही तस्वीर थी!

राजीव कुमार said...

भाई एक सतेन्दर चाचा हुआ करते थे। 10वी पास कर पटना से दिल्ली भाग आए। फिर वापस पटना गए तो बहुत बड़े टीवी मैकेनिक (इंजियनर) कहलाने लगे। मुहल्ले मे वही वीसीआर लाते थे। हम बच्चे उनके चमचई में लगे रहते थे। सादे कॉपी का पन्ना फाड़ कर उनके घर जाते। वीसीआर का हेड गंदा होता तो बड़ी गर्व से वे सादे पन्ने उन्हें देते। अपनी इज़्जत बढ़ जाती थी। संयोग देखिए, आज टीवी चैनल में काम करता हूं....लेकिन वो खुशी मयस्सर नहीं होती जो उस अकाई या फुनाई के वीसीआर को देख कर मिलती थी।

COMMON MAN said...

sahi likha hai mitra

mamta said...

वी.सी.आर. उफ़ वो भी क्या दिन थे । बहुत ही सही चित्रण किया है आपने।

वैसे अभी जब हम दिल्ली गए हुए थे तो घर मे रक्खे वी.सी.आर देख कर यही सोच रहे थे कि एक जमाना था जब इस बेचारे को कोई चैन से नही रहने देता था और एक आज का समय है कि बेचारा बस टी.वी.ट्रॉली पर रक्खा हुआ है ।

ताऊ रामपुरिया said...

बड़ी मेहरवानी आपकी ! बच्चों का बचपन याद दिला दिया !
कभी २ पुरानी यादें भी बड़ी मीठी लगती हैं ! बहुत धन्यवाद !

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

kaha lekar chale gaye jeetu bhai... kitne hi purane din jeb se gir pade... shaandar post..

yunus said...

लो जी । मुझे भी वही दौर याद आ गया । कॉम्बिनेशन कैसा होता था फिल्‍मों का--तेरी मेहरबानियां,अलग-अलग,घर-संसार, संजोग,फासले,अजीब फिल्‍मों का दौर था और अजीब जुनून था उन्‍हें देखने का ।

Udan Tashtari said...

अच्छी डुबकी लगवाई पुरानी यादों में..किराये पर लाकर सब मोहल्ले वालों के साथ रात भर देखा करते थे. आगे जारी रहें...

अभिषेक ओझा said...

ढिसुम-ढिसुम... मिथुन दा की जय !

नीरज गोस्वामी said...

हमारी दुखती रग पर हाथ रख दिया...कोई जमाना था जब फ़िल्म देखने का उसपर क्रेज हुआ करता था...कितनी ही खट्टी मीठी यादें जुड़ी हुई हैं उस से.
नीरज

डॉ .अनुराग said...

घातक कई बार देखी थी........मिथुन की कुछ पिक्चर .... सारे मोहाले का इकठ्ठा होना ओर एक ही स्ट्रेच में तीन चार पिक्चर देखना.....

venus kesari said...

बिल्कुल सही बात कही आपने
हम भी पहले ऐसा सोंचते थे जब पतंग उड़ते और कट जाती तो सोंचते काश जो पतंग उड़ रही है सब कट के हमारे घर में आजाये
हम तो सपना भी देखते थे की हमारे घर का सबसे बड़ा कमरा पतंगों से भर गया है
फ़िर जाग कर सोंचते थे जब बड़े हो जायेगे तो कमरा भर के पतंग खरीदेंगे
मगर आज तो बच्चो के हाँथ में पतंग देख कर मुस्कुरा कर रह जाते है

वीनस केसरी

लोकेश said...

बढ़िया संस्मरण।
कितनी ही खट्टी मीठी यादें

सच है, .लेकिन वो खुशी मयस्सर नहीं होती

राज भाटिय़ा said...

बहुत सुन्दर, बहुत कुछ याद दिला दिया
धन्यवाद

sab kuch hanny- hanny said...

vcr par filme hamne v dekhi hain, par ab sab bite jamane ki chij ho gai, yahi hota samay ki dhul me purani chije dabti jati hain

makrand said...

sahi kaha apane
regards

Zakir Ali 'Rajneesh' said...

सही कहा भइये, अब भी बहुतों ने वो पुरातात्विक महत्व की चीज संभाल कर रखी हुई है।

शोभा said...

बहुत सुन्दर और प्रभावी लिखा है। बधाई स्वीकारें।

Nitish Raj said...

पढ़ नहीं पाया था पर देखा थी ये पोस्ट तो इसलिए पहले ही सोच रखा था कि पढ़ुंगा जरूर। हम बड़ी मुश्किल से वीसीआर का जुगाड़ कर के लाते थे सभी दोस्त और फिर बैठकर मूवी देखा करते। चलाना आता नहीं था फिर भी उस शक्स से सीख कर कभी खुद ही हाथ साफ करने में लग जाते थे। वो दिन याद करा दिए बिरादर।