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Wednesday, 1 October 2008

पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा.........

स्‍कूल के उन्‍हीं दि‍नों में कई फि‍ल्‍में कॉलेज-बॉय की छवि‍ बना रहे थे- आमि‍र खान की कयामत से कयामत तक, जो जीता वही सि‍कंदर; दि‍ल का क्‍या कसूर; दि‍ल आदि‍। इन फि‍ल्‍मों में देखता था कि‍ कॉलेज में कि‍तनी आजादी है! कि‍सी तरह की कोई बंदि‍श नजर नहीं आती थी। मन कि‍या तो कॉलेज गए, बंक मारा, क्‍लास में गप्‍पे मारी, हूटिंग और रैगिंग में दि‍न बि‍ताकर घर की चारपाई पर पस्‍त हो लि‍ए।

‍ पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा......... जैसे गीत कॉलेज का थीम सॉंग बन चुका था। खैर, सभी कॉलेज में पढ़ने की ख्‍वाईश रखते हैं। जब वे कॉलेज आते हैं तो धीरे-धीरे यहॉं के रि‍वाज से परि‍चि‍त होने लगते हैं। एक छात्र की नजर से कॉलेज की तस्‍वीर क्‍या हो सकती है, यह इस कवि‍ता के माध्‍यम से प्रस्‍तुत कर रहा हूँ, जो 1996 में लि‍खी थी।



बड़े-बड़े दि‍ग्‍गज जहॉं जाकर,
पाते हैं हर नॉलेज,
सुनो बात ये कान लगाकर,
क्‍या है रि‍वाज-ए-कॉलेज।


पढ़ने वाले बाहर होते
टीचर क्‍लास के अंदर,
धमाचौकड़ी देखके इनकी
शरमाए भी बंदर।

जि‍धर भी देखो, दि‍ख जाएगा,
देशी मुर्गी चाल वि‍लायती,
रैगिंग, फैशन, फि‍ल्‍में, कॉफी,
इसके हैं सभी हि‍मायती।

गि‍टि‍र-पि‍टि‍र अंगरेजी बोले,
हि‍न्‍द देश में गजब तमाशा,
जेबों में बज रही है घंटी
भीख मॉगकर बोले भाषा।



कोई दूर से हाथ हि‍लाए
तो कोई आकर हाथ मि‍लाए,
सुबह-शाम बस कॉलेज में तो
बाय-टाटा-हैल्लो-हाय।

धन के मौजी, मन के मौजी
कायदे बड़े ही साफ हैं-
दब्‍बू भी बस में अकड़ के कहते
’स्‍टाफ हैं जी स्‍टाफ हैं।‘

इस सूखी अकड़ के पीछे,
कॉलेज का है जोर,
हल्‍की,छोटी बातों पर भी
मच जाता यहाँ शोर।

एक तरफ हॉकी-खँजर है,
एक तरफ चुनाव,
लड़नेवाले लगा रहे हैं
अपना सबकुछ दॉंव।



राजनीति‍ की वही नीति‍ है
वोट लो हाथ जोड़के
दलबल गर जीत गए तो
रख दें सबकुछ फोड़के।

वोट-दि‍लासा-दावे-वादे,
यही चुनावी भाषा।
होता नहीं भला कि‍सी का
वही है फि‍र भी आशा।


चुनाव की वो बला टली
जो आती थी हर साल में,
बाकी वक्‍त कैंटि‍न में बीता,
बाकी गया हड़ताल में।

कॉलेज का दस्‍तूर कहो या
पश्‍चि‍म का प्रभाव,
सबकुछ है पर कपड़े व
शि‍क्षा का बहुत अभाव।


ऑंख पर चश्‍मा, हाथ में बाइक,
चुस्‍त जींस है पैरों में,
चि‍डि‍यॉंघर से भागा बंदा,
है तो अपना गैरों में।




अपनी नजर में बन बैठे हैं,
कॉलेज के मेहमान,
कॉलेज के ज़ीनों पर जि‍नकी
जीने का रहता अरमान।

वैसे कॉलेज के दि‍न होते हैं,
छोटे पर काफी रंगीले,
साथ जो था मेरी संगी का
क्‍यों करता मैं शि‍कवे-गीले।

खैर अच्‍छा टाइम पास हुआ,
पर बाद में ये अहसास हुआ-
वो समय गया, वो पैसे गए,
फि‍र भी मैं न पास हुआ।

ये नया साल का तीसरा महि‍ना,
और चौथे में इक्‍ज़ैम,
घास चर के लौटी अक्‍ल तब
सुबह से हो गई शाम।

घरवाले थे बीन बजाते
काला अक्षर चरने को।
गया भैंस पानी में देखा,
गुड़-गोबर कर मरने को।

देर को दुरुस्‍त करने का,
अब था केवल यही उपाय,
वक्‍त जब बचा नहीं तो
एक रि‍स्‍क लेकर देखी जाए..

कई रातों तक जग-जगकर,
मैंने खूब पढ़ाई की,
कैसे कहूँ कि‍ छोड़ कलम
कैंची से पर्ची कढ़ाई की।

अब ये मेरा बर्ष पंचम है,
सबकुछ है पहले जैसा,
अब अपने मुँह से क्‍या कहूँ,
कॉलेज होता है कैसा!

-जि‍तेन्‍द्र भगत, 1996

(सभी चि‍त्रों के लि‍ए गुगल का आभार)

31 comments:

रंजना [रंजू भाटिया] said...

सही लिखा है जी ..यही तो कॉलेज के दिन हैं . :)

Anil Pusadkar said...

पुरानी यादें ताज़ा कर दी।तब भी बढिया लिखते थे,जैसे आज लिखते हैं।आणंद आ गया।

Ghost Buster said...

कॉलेज के दिन ऐसे ही याद आते हैं. बढ़िया रहा.

seema gupta said...

कॉलेज का दस्‍तूर कहो या
पश्‍चि‍म का प्रभाव,
सबकुछ है पर कपड़े व
शि‍क्षा का बहुत अभाव।
ऑंख पर चश्‍मा, हाथ में बाइक,
चुस्‍त जींस है पैरों में,
चि‍डि‍यॉंघर से भागा बंदा,
है तो अपना गैरों में।
'wah pdh kr aisa lga sara college ka nazara samne ghum gya, college mey yhee dhamachokdee hotee hai, hotte to aaj bhee hai, pr shayad kuch style badal gyen hain bus jyada modern ho gyen hain students, wonderful presentation'

regards

दिनेशराय द्विवेदी said...

शानदार चित्र काव्य है।

सुशील कुमार छौक्कर said...

वाह सुबह सुबह पुराने दिनों की याद दिला दी। वाह क्या लिखा है क्या चित्र ठेले है। वाह जी वाह मजा आ गया।

mamta said...

वो भी क्या जमाना था । :)
याद दिला दिया आपने अपनी इस रचना से।

Gyandutt Pandey said...

फैश बैक में ले गये आप। और क्या जबरदस्त चित्रमय सीढ़ी बनाई है!

Ranjan said...

सुन्दर चित्रण.. बढ़िया

भूतनाथ said...

कई रातों तक जग-जगकर,
मैंने खूब पढ़ाई की,
कैसे कहूँ कि‍ छोड़ कलम
कैंची से पर्ची कढ़ाई की।

छा गए भाई आप तो ! बेहतरीन गजल है !

भूतनाथ said...

कई रातों तक जग-जगकर,
मैंने खूब पढ़ाई की,
कैसे कहूँ कि‍ छोड़ कलम
कैंची से पर्ची कढ़ाई की।

छा गए भाई आप तो ! बेहतरीन गजल है !

दीपक "तिवारी साहब" said...

बहुत अच्छे बिरादर ! मजा आ गया !

COMMON MAN said...

bahut sundar

ताऊ रामपुरिया said...

कॉलेज का दस्‍तूर कहो या
पश्‍चि‍म का प्रभाव,
सबकुछ है पर कपड़े व
शि‍क्षा का बहुत अभाव।


भाई जीतेन्द्र जी आप जो भी कहते हैं बड़ी शिद्दत से कहते हैं ! पर आज बड़ी टिपणी नही करेंगे क्यूँकी और लोग भी लाइन में लगे हैं ! आज इतना ही ! बहुत सुंदर लगी आपकी रचना !

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

शानदार लिखा है आपने....

Deepak Bhanre said...

बहुत खूब बिरादर .
पुराने कॉलेज के दिन ताजे कर दिए . चित्रों के साथ अभिव्यक्ति मैं चार चाँद लग गए .

Zakir Ali 'Rajneesh' said...

आपने जीवन के विभिन्न पक्षों पर बहुत सूक्ष्मता से दृष्टि डाली है। साथ में व्यंग्य का तडका मजेदार है।

Arvind Mishra said...

कालेज जीवन का जीवंत और रंगमय प्रस्तुतीकरण गजब धा गया ! मैंने भी कई दृश्यों में अपने अतीत को निहारा !

अमित अग्रवाल said...

जितेन्द्र जी,
आज आपके चिट्ठे पर आने का अवसर मिला| अच्छा लिखते हैं आप|
आशा है भविष्य में आपका लिखा नियमित रूप से पढूंगा| आपने किस
विषय में शोध किया है?

अमित

सचिन मिश्रा said...

purani yaadein taja kar di, bahut khub.

ऋचा जोशी said...

मजा आ गया भाई। बहुत खूब।

PD said...

क्या खूब लिखा है भाई..
पापा कहते हैं वाला गाना भी लगा देते तो बढिया रहता.. सोचता हूं इंडियन आईडल में भाग लेते समय यही गाना गाऊं.. :D

वैसे आपने अभी तक कोई जवाब नहीं दिया पत्र का?

योगेन्द्र मौदगिल said...

भगत जी खूब है कविता, हैं खूब नज़्ज़ारे..
इसकी सैटिंग पै भई हम तो अपना दिल हारे..
हाय..! कालेज का ज़माना भी क्या ज़माना था,
लड़कियां, साइकिलें, कैंटीन, समोसे प्यारे..

Nitish Raj said...

वाह जितेंद्र बिरादर गजब ढा दिया। कॉलेज के दिनों को यूं उतारकर निशब्द कर दिया और तुकबंदी भी बढ़िया है।पुरानी यादें ताजा कर दीं हैं।

venus kesari said...

इतनी लम्बी कविता आपने १९९६ में लिखी थी तो अब क्या हाल होता होगा ??? :) :) :D

वीनस केसरी

राज भाटिय़ा said...

कॉलेज का दस्‍तूर कहो या
पश्‍चि‍म का प्रभाव,
सबकुछ है पर कपड़े व
शि‍क्षा का बहुत अभाव।
बहुत ही सच लिखा आप ने हम पर भी पहले साल भूत चढा, ओर रजल्ट देख कर ऎसा भागा की अभी तक नही आया
धन्यवाद

सतीश सक्सेना said...

बहुत खूब !

मथुरा कलौनी said...

बहुत खूब, याद आ गये वे दिन

वह बाप की डपट औ' माँ की फटकार
पहली सिगरेट सुलगाते जब चाचा ने देखा
वह काफी हाउस के झगड़े तोड़फोड़
खींच रहे हैं होठों में स्मित रेखा

डॉ .अनुराग said...

उन दिनों PMT की तैयारी करते थे जिन दिनों ये पिक्चर रिलीज़ हुई थी ,चित्रहार आता था हफ्ते में दो दिन ,बस इसका गाना सुनने कमरे से बाहर आते थे .....ये गाना आज भी उन दिनों में खीच ले जाता है ...आपका अंदाज भी वैसे खूब है इतने सरे फोटो इकट्ठे करना ....

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

मुझी भी याद हैं वह दिन. कविता बहुत सही है, बिरादर. धन्यवाद!

tarun said...

jitendra ji mai is post par bhi apki pichhli post par ki gayi tippadi ko hee dohraaunga. is post ki shuruaat bahut achchhi hai . maine aapka profile dekha hai . aapme aur mujhme ruchiyo ke mamle me kafi samantaye hai . khaas taur se filmo ke mamle me . jo jeeta wahi sikandar meri favourite filmo me se ek hai . hindi me shayad bahut kam filme ho jiska end shuruaat karta ho . mithun ki ek film hai mrigaya, aur aamir khan ki ghulam aur jo jeeta wahi sikandar. in teeno filmo ka end dekhne laayak hai,,teeno hee filme apne end se apni starting karti hai . film dekhne wale sajag darshak jo fimo ko matr manoranjan karne ke liye nahi dekhte . ye baat jaante hai .yoon to mujhe naasir hussain ki lagbhag sabhi filme pasand hai . lekin unme se qayamat se qayamat tak aur jo jeeta wahi sikandar meri favourite filme hai . inhe meri pasandeeda banane me bahut bada haath majrooh sultaan puri ke geeto ka raha hai .