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Sunday, 19 October 2008

प्‍लेटोनि‍क प्रेम ही असल प्रेम है, बाकी सड़कछाप !!

एक प्रसंग है- नायक अपनी प्रेमि‍का से पूछता है- क्‍या तुम मुझसे नफरत करती हो? नायि‍का कहती है- इतना प्रेम नहीं करती कि‍ तुमसे नफरत करुँ! यानी सच्‍चे दि‍ल से नफरत करनेवाला दरअसल उस चीज़ से कहीं भीतर तक जुड़ा होता है या आहत होता है पि‍छली पोस्‍ट में श्री अरविंद मि‍श्र एवं लवली जी ने प्‍लेटोनि‍क प्रेम के आयाम से रूबरू कराने की बात कही। वहॉं इश्‍क की कवि‍ता को सड़कछाप और हताश कवि‍ता के रूप में भी समझा गया। प्‍लेटोनि‍क प्रेम ही असल प्रेम है, बाकी सड़कछाप, यह नफरत ठीक नहीं। (मैं यह भी ध्‍यान दि‍लाना चाहूँगा कि‍ वह कवि‍ता 1996 में लि‍खी गई थी, जब मेरी उम्र 18-19 साल रही होगी।)

मेरा मानना है कि‍ आदर्श अक्‍सर अकेलेपन से जूझता है और यथार्थ हमेशा भीड़ से। जब मैं आदर्श की बात करता हूँ तो मुझे वास्‍वि‍कता में जीने की सलाह दी जाती है, जब यथार्थ का दामन पकड़ता हूँ तो आदर्श की सीख दी जाती है।

तब मुझे लगता है कि‍ ज्‍यादातर लोग अपने दि‍ल की बात को, अपने अतीत के सत्‍य को स्‍वीकार करने में संकोच करते हैं, अपनी उम्र के एक पड़ाव पर उसे स्‍वीकार करने में हि‍चकि‍चाते हैं अथवा अपने सामाजि‍क हैसि‍यत के माकूल नहीं समझते हैं। वे कई बार दि‍ल से तो स्‍वीकार तो करते हैं मगर दि‍माग से अस्‍वीकार। क्‍या यह सच से कतराना नही है अथवा उससे दूर भागना?

अनि‍ल पुसेडकर जी की स्‍वीकारोक्‍ति‍ में यह सत्‍य छि‍पा है कि‍ हर आदमी कभी-न-कभी प्रेम नाम की चीज़ से टकराता जरूर है, भ्रमि‍त जरूर होता है, आज उसका स्‍टेटस उसे स्‍वीकार करने में बाधक बन जाए, यह अलग बात है। आज आप बड़े हो गए तो बचपन में की गई उन नादान बहसों, प्रेम प्रसंगो को गैरजरूरी करार दे रहे हैं, इससे उसका अस्‍ति‍त्‍व खत्‍म तो नहीं हो जाता।
क्‍या वि‍रह-मि‍लन की शायरी को आप प्‍लेटोनि‍क प्रेम समझकर वाह-वाही देते हैं? प्रकारांतर से उसमें भी देह की मांग होती है, असफल हो जाने पर वह नि‍राशा और तड़प बनकर रह जाती है। उर्दू शायरी की यह खास पहचान रही है।

टीन-एज से गुजरने के बाद मैंने महसूस कि‍या है कि‍ प्रेम करने की भावना सबके मन में रहती है, उसकी परि‍णति‍ कहॉं होती है, यह शोध का वि‍षय है। सूत्र ये दे सकता हूँ कि‍ प्रेम का आधार कुछ प्रेमि‍यों के लि‍ए शरीर होता है कुछ के लि‍ए आत्‍मा। तो दो बातें हुई- शरीर की सुंदरता और आत्‍मा की सुंदरता।
एक बार की बात है- परदेश में एक बार कि‍सी भले ट्रक-ड्राइवर ने मुझे लि‍फ्ट दि‍या। रास्‍ते में घर-परि‍वार पर बातें होने लगी। उसने सादगी से बताया कि‍ उसकी पत्‍नी इतनी खूबसूरत है कि‍ वह हमेशा उसकी यादों में खोया रहता है, काम कुछ ऐसा है कि‍ हफ्ते में शायद एकाध दि‍न साथ रहने का अवसर मि‍ल पाता है। इसके बाद उस ड्राइवर ने अपनी बीवी की इतनी तारि‍फ की कि‍ मेरे मन में उसे देखने की इच्‍छा हो आई। रास्‍ते में उसका घर पड़ता था। उसने नाश्‍ते के लि‍ए अनुरोध कि‍या। दरवाजा खोलने पर सामने सॉवली-सी एक महि‍ला बाहर आई जो एकदम सामान्‍य वेशभूषा की थी। मुझे आश्‍चर्यमि‍श्रि‍त खुशी हुई थी।
जाहि‍र है, सुंदरता शरीर में नहीं, देखनेवाले के ऑंखों में होती है।

अलौकि‍क प्रेम एक आकर्षक वि‍चार है, जो आदर्श के समान सम्‍मोहन पैदा करता है, लेकि‍न अलौकि‍क प्रेम को अंत तक नि‍भा पानेवाले बि‍रले ही होते हैं, इसका उदाहरण मीरा और मोहन ही बन सकते हैं, राधा और मोहन नही। सगुण और नि‍र्गुण भक्‍त कवि‍यों के बारे में आपने सुना होगा। सगुणवादि‍यों के लि‍ए ईश्‍वर सगुण और साकार होता है, जबकि‍ नि‍र्गुण उपासक के लि‍ए ईश्‍वर नि‍राकार हैं, नि‍र्गुण का मतलब यहॉं गुणरहि‍त नहीं, गुणाति‍त है। दोनों का लक्ष्‍य अंतत: ईश्‍वर प्राप्‍ति‍ है। साध्‍य को प्राप्‍त करने के लि‍ए लोग अपने अनुरूप साधन अपनाते हैं, इसलि‍ए कि‍सी की उपासना-पद्धति‍ पर शक करना यहॉं अनुचि‍त होगा।
सच्‍चे प्रेम के संदर्भ में शरीर आत्‍मा का पूरक है, आत्‍मा शरीर का। इसलि‍ए कोई कहीं से भी आरंभ करे, लक्ष्‍य तो प्रेम ही है। मेरी समझ से, प्लेटोनि‍क प्रेम को वासनाहीन माना जाता है, ,यहॉ यौनेच्‍छा को पूरी तरह नकारकर अलौकि‍क/आध्‍यात्‍मि‍क प्रेम को अपनाया जाता है।

मेरा ये मानना है कि‍ शरीर की मांग को यदि‍ शमि‍त किया जाए तो उसका प्रेम अलौकि‍क हो जाता है, पर यदि‍ दमि‍त कि‍या जाए तो वह अलौकि‍क प्रेम का ढ़ोंग बनकर रह जाता है। इस लि‍हाज से मैंने कि‍सी को प्‍लोटोनि‍क प्रेम करते नहीं पाया है, अगर आपके पास ऐसे अनुभव हैं, उदाहरण हैं, साथ में पुख्‍ता सबूत भी, तब ये अनुभव हम लोगों के साथ भी बॉंटे।

वास्‍तव में ऐसी चीजों का कभी पुख्‍ता सबूत नहीं होता, संदेह हमेशा बना रहेगा, श्रद्धा या आस्‍था की नि‍गाह से देखने पर व्‍यवहारि‍कता कई बार दरकि‍नार भी हो जाती है। जाते-जाते कुछ सवालों का जवाब चाहूँगा- आपलोग ऐसे कि‍तने लोगों को जानते हैं, जि‍सने प्‍लेटोनि‍क प्रेम कि‍या, क्‍या वह प्रेम सफल रहा? अगर सफल हुआ भी तो क्‍या वह प्‍लेटोनि‍क प्रेम रह पाया?

21 comments:

makrand said...

bahut sochana padaga dear
prem me shardha ka frame jaroori he

समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...

pletinam prem ke bare me apne ek nai janakari di hai sar ji age dekhiye prem ke kai prakaar dekhane ko milenge jaise- microw prem adi . achca likha hai apne . dhanayawad.

Gyandutt Pandey said...

अगर आत्मिक न हो तो प्रेम कैसा?
लेकिन मुझे कोई अथारिटी न माना जाये। यह बहुत जाना पहचाना क्षेत्र नहीं है।

ताऊ रामपुरिया said...

मोटे तौर पर आपने इस पोस्ट में शायद आत्मिक और देहिक प्रेम की बातें की हैं जो निर्गुण और सगुण तक जा पहुँची हैं ! मेरी समझ से कब दैहिक प्रेम आत्मिक में बदल जायेगा और कब आत्मिक प्रेम दैहिक हो जायेगा ! ठीक २ कहा नही जा सकता ! ये सारा खेल इतना सीधा नही है और ना ही चंद अक्षर मेरे/आपके लिखने से हल होने वाला है ! अगर प्रेम हो ही गया है, ध्यान दीजिये मैं सिर्फ़ प्रेम की बात कर रहा हूँ ये जरुरी नही की स्त्री/पुरूष का ही हो ! ये माँ/बेटे , भक्त/ईश्वर के बीच भी घट सकता है ! जीसस की देशना तो पूरी प्रेम के इर्द गिर्द घूमती है ! तो बात ख़त्म हुई समझो !

असल में हम प्रेमी या दोस्त की इतनी फ़िक्र ही नही पालते ! क्यों ? क्योंकि हम जानते हैं की दोस्त की जब भी जरुरत होगी हम पुकारेंगे वैसे ही दौडा चला आयेगा ! दोस्त की फिक्र क्यूँ करनी ? और नफ़रत/दुश्मन असल में २४ घंटे साथ रहती है ! अगर मैं आपको यहाँ गाली देकर चला जाऊं तो आपका दुश्मन हो गया और आप २४ घंटे मेरे बारे में ही सोचते रहेंगे ! इसी लिए जिनसे हम जितना गहरा प्रेम करते हैं , समय पर उतनी ही नफ़रत अपने आप हो जायेगी ! अब किसी को पीडा पहुंचानी है तो उसकी उपेक्षा करो ! इससे बड़ा कोई टॉर्चर नही है ! और आपकी नायिका यही कर रही है ! घोर उपेक्षा ... !

और भाई सगुण निर्गुण दोनों ही एक दुसरे के पूरक हैं ! वैसे ही जैसे प्रेम और नफ़रत ! असल में आज समय कम है ! फ़िर कभी अच्छी लम्बी चौडी बात इस विषय पर अवश्य करेंगे ! इतना सुंदर टोपिक उठाने के लिए धन्यवाद और शुभकामनाएं !

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

@"मेरी समझ से, प्लेटोनि‍क प्रेम को वासनाहीन माना जाता है, यहॉ यौनेच्‍छा को पूरी तरह नकारकर अलौकि‍क/आध्‍यात्‍मि‍क प्रेम को अपनाया जाता है।"

आपकी इतनी बात बिलकुल ठीक है। लेकिन इस बात पर सोचना होगा कि “सच्‍चे प्रेम के संदर्भ में शरीर आत्‍मा का पूरक है, आत्‍मा शरीर का। इसलि‍ए कोई कहीं से भी आरंभ करे, लक्ष्‍य तो प्रेम ही है।”

कुछ जानकार बताते हैं कि ‘आत्मा’ और ‘शरीर’ का जो सम्बन्ध है वही सम्बन्ध ‘प्रेम’ और ‘वासना’ का है। शरीर की ओर जो आकर्षण होता है वह वासना से प्रेरित होता है, तथा आत्मा की ओर जो आकर्षण होता है वह विशुद्ध प्रेम से प्रेरित होता है।

अब जो बात अरविन्द जी ने कही उसका सूत्र यहीं से निकलता है। प्रेम का वह रूप जो शरीर से शुरू होकर शरीर पर ही न्यौछावर होकर समाप्त हो जाता है, उसे ‘सड़क छाप प्रेम’ या जवानी के जोश में पैदा हुई वासना का आनुषंगिक प्रतिफलन कहा जा सकता है। इसमें दिल-विल की बातें केवल एक बहाना या तैयारी मात्र होती हैं।

दूसरी श्रेणी वह है जहाँ दो प्रेमी जन एक दूसरे को दिल से प्यार करते हैं, एक दूसरे की आत्मा से जुड़े होते हैं, लेकिन सामाजिक बन्धनों, मर्यादाओं, पारिवारिक अनुशासन का आदर करते हुए, या कायरतावश ही एक दूसरे का भौतिक सामीप्य प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं। ऐसे प्रेमी भावनात्मक स्तर पर तो एक दूसरे की दुनिया में स्थापित होते हैं लेकिन इसका प्रकटन शारीरिक मेल-मिलाप के रुप में नही हो पाने पर भी सन्तोष कर लेते हैं। यही स्थिति शायद प्लेटोनिक प्रेम के रूप में महिमा मण्डित की जाती है।

तीसरी श्रेणी उन भाग्यशाली प्रेमी जन की है जो एक दूसरे को भावनात्मक स्तर पर प्रेम करते हुए एक दूसरे का जीवनसाथी बन जाने का अवसर पाने में सफल होते हैं तथा जीवनपर्यन्त प्रेम की स्थिति बनी रहती है। केवल इस श्रेणी के लिए ही आपकी वह बात सही है कि “सच्‍चे प्रेम के संदर्भ में शरीर आत्‍मा का पूरक है, आत्‍मा शरीर का। इसलि‍ए कोई कहीं से भी आरंभ करे, लक्ष्‍य तो प्रेम ही है।”

एक रोचक बात और कही जाती है कि ‘हुस्न’ और ‘इश्क’ क्रमशः ‘स्त्री’ और ‘पुरूष’ की पूँजी (USP) हैं। इस पूँजी के प्रयोग से वे अपना इच्छित लक्ष्य जो स्त्री के लिए प्रेम और पुरुष के लिए वासना होती है, उसकी पूर्ति करते हैं। आप इससे कहाँ तक सहमत हैं, यह बिलकुल व्यक्तिनिष्ठ (subjective) मामला है।

रंजना [रंजू भाटिया] said...

अच्छा विषय लिया है आपने ...एक बार अमृता से किसी ने पूछा कि असल में प्लेटोनिक लव क्या है आपकी नजरो में ..तो अमृता ने कहा कि "'मोहब्बत से जिस्म को माइनस करना ,और यदि जिस्म को माइनस कर दिया मोहब्बत से तो खाली रूह की तो पूर्णता उस में बचेगी नही .जिस्म तो एक मिडिया है आत्मा से मिलने का ..और जब यह अलग हो गया तो वहां तक पहुंचेंगे कैसे ..""

वैसे मेरी नजर में प्यार असल वही है जिसकी रोशनी में हम ख़ुद को समझ पाते हैं .जान पाते है अपने को किसी दूसरे की नजर में ...और वह उस हद को छू ले जहाँ निजी स्वार्थ पीछे रह जाए |.एक दूसरे को समझना , आपसी विचारों को मान देना और "मैं "से हट के "हम" की बात हो ..अहम् को त्यागना ही प्रेम है ...यह विषय बहुत बड़ा है और इस पर सबके विचार अपने अपने हो सकते हैं ...विषय बहुत अच्छा है ..इस पर सार्थक बात हो तो यह प्रेम की धारा अंत हीन है ...

राज भाटिय़ा said...

अमर्ता या कोई भी अन्य के बारे मै नही जानता , लेकिन प्यार एक पुजा है, जो मीरा ने किया जो हम अपनी बेटी से भी करते है, वही प्यार हम अपनी बीबी से करते है , बही प्यार हम सब से करते है प्यार बस एक प्यार है इस का कोई अन्य रुप नही ओर प्यार करने वाले कभी भी किसी का भी दिल नही दुखाते.
धन्यवाद

मोहन वशिष्‍ठ said...

प्‍यार पूजा है प्‍यार त्‍याग हे प्‍यार तपस्‍या है प्‍यार तुम हो प्‍यार सब है सब अर्थात ईश्‍वर है और जहां प्‍यार वहां ईश्‍वर

PD said...

मैं तो कन्फ्यूज्ड हूँ की प्यार क्या है.. इसे समझना इतना आसान नहीं है.. किसी सूफियाने गाने में आबिदा परवीन को सुना था, उसके अनुसार - भीखा बात अधम की, कहन सुनन की नाही.. जो जानत सो कहे नाही, जो कहे सो जानत नाही.. पता नहीं.. जैसे जैसे उम्र और अनुभव बढ़ते जा रहे हैं वैसे वैसे यह धारणा बढती जा रही है की प्यार एक ढोंग के अलावा और कुछ नहीं होता है.. सच्चे प्यार बस सिनेमा और कहानियो तक ही अच्छे लगते हैं.. मैं यह भी मानने को तैयार हूँ की मेरी यह धारणा गलत हो सकती है.. मगर मेरी तरफ से सच्चाई तो बस यही है..

प्लेटोनिक प्यार का तो पता नहीं मगर प्लेटोनिक मित्रो की संख्या कम नहीं है.. और सच कहूँ तो प्लेटोनिक प्यार का मतलब अब भी नहीं समझ पाया..

अभिषेक ओझा said...

विज्ञान में हमेशा पहले आइडियल थियोरी पढ़ाई जाती है फिर आती है रीयल और अंत में ये बताया जाता है की ये रीयल थियोरी भी वास्तविक दुनिया के करीब है पर पूरी तरह रीयल नहीं ! शायद वही बात यहाँ भी होती है.

Arvind Mishra said...

बिरादर ,बहुत अस्त व्यस्तता है इन दिनों फिर भी ये कमेन्ट ले लें -मेरा उद्द्येश्य महज एक विमर्श का था और मुझे बेहद खुशी हो रही है कि विद्वान् मित्रों ने विषय का विवेचन मनोयोग से किया है -खासकर सिद्धार्थ शंकर जी ने और रंजू जी ने -दरसल रूहानी प्रेम एक यूटोपिया ही ज्यादा है -पर हाँ ताऊ की बात में बड़ा दम है कि हम प्रेम किसके किसके बीच देख रहे हैं !
प्रेम की यह कशिश भी तो देखिये -तुलसी कहते हैं कि मुझे राम वैसे ही प्रिय हैं जैसे 'कामिहि नारि पियारि जिमि ...' तो आपकी भी बात हो ही गयी ! मैं इस विषय पर क्वचिदन्य्तोअपि पर भी चर्चा करना चाहता हूँ -देखिये कब ?

Mrs. Asha Joglekar said...

प्रेम अगर सफल हो गया तो प्लेटॉनिक नही रहता ।
केवल असफल प्रेम में ही प्लेटॉनिक रहने का स्कोप है । जैसे पहले की ट्रेजेडी फिल्मों में हुआ करता था ।

seema gupta said...

' ye to bhut mushkil sa sval ho gya, itne readers ne apne comments mey pyar ko bhut acche treeke se prebasheet kiya hai, or ye annant hai, vyapk hai, jitna khen thoda hai, pyar ke anekon rup hain so isko kuch lfjon mey byan krna mushkil hai tabhee shayad ek geet likha gya hai" pyar ko pyar hee rehen do koee naam na do..., pyar koee bol nahee, pyar aavaj nahee , ek khamoshee hai kehtee hai suna kertee hai, jo na ruktee hai na tehree hai kabhee, ruh kee bund hai sadeey se bha kertee hai..."
' bhut accha arttcal ek bhut sensitive subject pr aapne likha hai or tareef ke kabil hai..."

Regards

tarun said...

बाँधो न नाँव इस ठाँव बंधु .....................................................।




बंधु तुम्हारी सड़कछाप वाली बात से मैं बिल्कुल भी इत्तेफ़ाक़ नही रख पा रहा हूँ पता नही तुमने ये किस अनुभव या संदर्भ में कहा । मुझे पढ़ने पर बड़ा अजीब लगा । दोस्त प्लेटोनिक लव अच्छी फीलिंग है पर जब हम रीयल लाइफ की बात करते हैं तो मुझे नहीं लगता कि प्लेटोनिक लव जैसी कोई चीज़ इस कलयुग में मौजूद है ..........इसका मतलब यह भी नहीं कि मैं प्लेटोनिक लव से इतर प्रेम को सड़कछाप मानता हूँ इस पर विचार करो मिञ । आज प्यार के नाम पर जो फीलिंग हमें और तुम्हें अपना बनाए हुए है वो प्लेटोनिक और सड़कछाप दोनो के बीच की स्थिति है ।

Anil Pusadkar said...

जितेंद्र भैय्या ये अपना फ़ील्ड नही रहा,इसलिये एक्स्पर्ट कमेण्ट नही कर रहा हूं।लेकिन ढाई अक्षर प्रेम के सुना था अब वो बढकर साढे तीन अक्षर का हो गया है,यानि जितेन्द्र से। आप अच्छे इंसान है और हर अच्छे इंसान की तरह आप इमानदारी से आपनी बात कहते हैं ,कहते रहिये,हमारे जैसे बहुत से भाई, सच्चे प्रेमी है आपके।

COMMON MAN said...

hamne to platonic, mohallic, collegic wagaira pyar ki badi koshishen ki, lekin naakam rahe

डॉ .अनुराग said...

इक आग का दरिया है....डूब के जाना है.

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

आज की पोस्ट में तो बढ़िया जानकारी मिली...

विनीत कुमार said...

nahiji hame to is tarah ke vibhajan se hi dikkat hai

रंजना said...

सच्‍चे प्रेम के संदर्भ में शरीर आत्‍मा का पूरक है, आत्‍मा शरीर का। इसलि‍ए कोई कहीं से भी आरंभ करे, लक्ष्‍य तो प्रेम ही है। मेरी समझ से, प्लेटोनि‍क प्रेम को वासनाहीन माना जाता है, ,यहॉ यौनेच्‍छा को पूरी तरह नकारकर अलौकि‍क/आध्‍यात्‍मि‍क प्रेम को अपनाया जाता है।
...............


बहुत प्रभावशाली लगा आपका आलेख.
प्रेम तो बस प्रेम है,चाहे दो मनुष्यों के बीच हो या पशु पक्षी या परमात्मा रचित किसी भी इकाई के साथ.प्रेम में शरीर बचा रह कहाँ जाता है ?

मनुज मेहता said...

sach hi hai bhai, prem ke ab anek roop paye jate hain, yeh nayi paudh hai jo pletinam pyar par parwan ho rahi hai