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Friday, 31 October 2008

आदर्श की स्‍थापना का ठेका

कभी अपने बचपन की डायरी पढ़ता हूँ और तब की कुछ कवि‍ताऍं सामने आ जाती हैं तो ये सोचकर अजीब लगता है कि‍ तब मन में क्‍या-क्‍या चला करता था। कवि‍ता को मैं सपनों की सेज पर लेटी हुई दास्‍तॉं मानता था, संभावनाओं के आकाश में उछाला हुआ पत्‍थर मानता था और सबसे ज्‍यादा ये मानता था कि‍ राहगीरों के लि‍ए मील का पत्‍थर है।

इसी धोखे में मैं आदर्श की ऐसी कल्‍पनाऍ करता था, जि‍से आज मैं सि‍र्फ थोथी कल्‍पना ही कह सकता हूँ और पढ़ते हुए जि‍से हँसी आती है। मैंने ऐसी कल्‍पना क्‍यों की, क्‍या मुझे मेरे शि‍क्षकों ने आदर्श की स्‍थापना का ठेका दे रखा था। आश्‍चर्य है कि‍ उन्‍होंने मुझे सि‍र्फ अच्‍छी बातें सि‍खाई, मैंने उनकी बातों को कुछ ज्‍यादा ही तवज्‍जो दी, जबकि‍ दुनि‍या इससे कहीं अलग थी, बल्‍कि‍ उल्टी थी।

ऐसा क्‍यों लगता था कि‍ संसार में अच्‍छाइयॉं मौजूद हैं बस उसे याद दि‍लाने की जरूरत है, लोग भटक गए हैं, उन्‍हें रास्‍ता दि‍खाने की जरूरत है। इति‍हास पढ़ानेवाले मेरे सर मुझे छठी क्‍लास में खलीफा कहकर मेरा मजाक उड़ाते थे। अब लगता है कि‍ खलीफई का ख्‍याल सचमुच बेवकूफाना था, जि‍से मैं कवि‍ता में उतारा करता था, सोचता था कि‍ 1857 की स्‍थि‍ति‍ पैदा हो तो मैं भी क्रांति‍ कर डालूँगा। लेकि‍न खाड़ी युद्ध(1990-91) के दौरान तेल की कमी को लेकर स्‍कूल में पोस्‍टर बनाते हुए मुझे महसूस कराया गया कि‍ युद्ध का आधार तेजी से बदलने लगा है। (तब चन्‍द्रशेखर प्रधानमंत्री थे, उनकी दाढी की तस्‍वीर पर सफेद पोस्‍टल कलर लगाते हुए मैंने ऊपर से एक ति‍नका चि‍पका दि‍या था)।

आज कबाड़ से एक कवि‍ता सामने आ गई, मैंने पाया कि‍ असंभावि‍त पर बात करना एक बकवास से ज्‍यादा कुछ नहीं है। ऐसी दुनि‍या की कल्‍पना करना बकवास ही लगती है कि‍ जहॉ मतभेद और दंगे-फसाद से दूर रहकर लोग आपस में सुख-शांति‍ से रहते हों और समता का सम्‍मान हो। बचपन में लि‍खी ये कवि‍ता आज मुझे यूँ ही बता जाती है कि‍ खुशफहमी में जीना लड़ते हुए हार जाने से ज्‍यादा खतरनाक है-


मुझे लेकर ऐसे जहान में तू ले चल चंचल मन
जहॉं पल-पल की पलकों में ऑसू हो खुशि‍या बन

अमावस की जहॉं हो न काली रात
आपस में करते हों मानस केवल प्‍यार की बात
फूलों की खूश्‍बू से महके जहाँ का हर चमन
मुझे लेकर ऐसे जहान में......................

जहॉं मेहनत के जोश से रक्‍त बनता हो स्‍वेद
और लोगों में होता न हो आपस में मतभेद।
जहॉं पलती हो साथ-साथ, सुख-चैन औ चमन
मुझे लेकर ऐसे जहान में......................

जहॉं इंसा ही पूजे जाऍं और नर नारी का हो सम्‍मान।
बात-बात में जहॉं न नि‍कले, बरछी या तीर कमान।
जहाँ की धरती नीची न हो, न ऊँचा हो नील गगन
मुझे लेकर ऐसे जहान में......................

-जि‍तेन्‍द्र भगत( 1992)

21 comments:

seema gupta said...

जहॉं मेहनत के जोश से रक्‍त बनता हो स्‍वेद
और लोगों में होता न हो आपस में मतभेद।
जहॉं पलती हो साथ-साथ, सुख-चैन औ चमन
मुझे लेकर ऐसे जहान में......................

" when you have written these words , your innocent heart have thought of these pure pearls of words......but how much it suits to the present world it is difficult to say..... but ur words are wonderfull and appreciable.."

Regards

Gyan Dutt Pandey said...

बहुत कुछ एक पुष्प की अभिलाषा जैसा गीत लिखा था आपने।

विनीत कुमार said...

बचपन में आदर्श की इच्छा पर आज हंस रहे हो, कई बातें थोथी लग रही है। लेकिन झूठ मत बोलो, चाहते तो आज भी हो कि आदर्श स्थिति पैदा हो, दुखद तो ये है कि अब बच्चे से ही लोग इस पर हंसने लगे हैं, उपहास उड़ाने लगे हैं और उनमें इस बात का रत्तीभर भी भरोसा नहीं है कि कभी आदर्श समाज भी बनेगा। फर्क सिर्फ इतना है कि आप हंस भर रहे हो, इच्छा आपकी अभी भी बनी है कि एक आदर्श समाज बने। ये अलग बात है कि आप यहां अल्पसंख्यक हो जा रहे हो।

डॉ .अनुराग said...

सच कहा ......आपने तो हिम्मत दिखायी की यहाँ पोस्ट कर दी ....हम में ये हिम्मत नही है

मा पलायनम ! said...

अमावस की जहॉं हो न काली रात
आपस में करते हों मानस केवल प्‍यार की बात
फूलों की खूश्‍बू से महके जहाँ का हर चमन
मुझे लेकर ऐसे जहान में......................
भाव-स्पर्शी पंक्तियाँ है .

Zakir Ali 'Rajneesh' said...

जहॉं मेहनत के जोश से रक्‍त बनता हो स्‍वेद
और लोगों में होता न हो आपस में मतभेद।
जहॉं पलती हो साथ-साथ, सुख-चैन औ चमन।

बहुत सुन्दर अभिलाषा है। काश ऐसा होता...

pintu said...

bahut sundar rachna hai!dhnybaad."http://pinturaut.blogspot.com/"http://janmaanas.blogspot.com/

रंजना [रंजू भाटिया] said...

बचपन के दिन भी अच्छे होते हैं ..यादे वो कभी भूलती नहीं ..अच्छा लगा आपकी उन यादों को पढ़ना

योगेन्द्र मौदगिल said...

वाकई भगत जी
२ लाइनें समर्पित हैं कि
बचपन की हों यौवन की हों यादें तो यादें होती हैं
जुगनू की हों तारों की हों रातें तो रातें होती हैं
शेष शुभ

सतीश पंचम said...

आपकी कल्पना की दाद देनी पडेगी कि तिनके का इस्तेमाल दाढी के चित्र पर किया आपने..वैसे इस दाद के साथ खुजली दाढी वाले को फ्री :) अच्छी पोस्ट।

सुशील कुमार छौक्कर said...

जितेन्द्र जी कही वो डायरी मेरी तो नहीं। कविता बैशक आपकी हो सकती है।
मुझे लेकर ऐसे जहान में तू ले चल चंचल मन
जहॉं पल-पल की पलकों में ऑसू हो खुशि‍या बन
बहुत उम्दा।

"Arsh" said...

जहॉं मेहनत के जोश से रक्‍त बनता हो स्‍वेद
और लोगों में होता न हो आपस में मतभेद।
जहॉं पलती हो साथ-साथ, सुख-चैन औ चमन
मुझे लेकर ऐसे जहान में......................

आपकी ये लिखी हुई पुराणी कविता भी मार्ग दर्शक के रूप si प्रतीत होti है...
आप मेरे ब्लॉग पे आए आपका बहोत बहोत आभारी हूँ आपका बहोत बहोत स्वागत है हमेशा के लिए...

अर्श

अनूप शुक्ल said...

अच्छी पोस्ट!

अभिषेक ओझा said...

उम्र के साथ काफ़ी कुछ बदलता है. सोच भी और वास्तविकता से परिचय भी. काश ये कल्पना सच होती !

Anwar Qureshi said...

जितेन्द जी .. आप का धन्यवाद ..यह लेख लिखने के लिए ..और मुझे पहचानने के लिए भी ..मुझे लगा के सब मुझे भूल ही गए होंगे ....

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

कविता तो सुंदर है ही, विचार भी कोई खोखले नहीं हैं. मैं दिल्ली के ऐसे टैक्सी ड्राइवर को जानता हूँ जो जब भी किसी सवारी को AIIMS में छोड़ता है तो टैक्सी खड़ी करके रक्तदान भी कर लेता है. पैसा नहीं दे सकता तो क्या खून तो बेमोल है. ऐसे रिक्शे वालों को जानता हूँ जो ट्राफिक लाईट ख़राब होने पर बारी-बारी से यातायात सञ्चालन करने लगते हैं. और ऐसे छात्रों को भी जानता हूँ जो अपनी गर्मियों की छुट्टियां अपने छोटे से गरीब शहर के नालों की कीचड साफ़ करने में निकालते हैं.

विनीत कुमार से काफी हद तक सहमत हूँ. १८५७ में जब सिंधिया जैसे महाराजे अंग्रेजों के आगे दम हिला रहे थे तब एक साधारण सिपाही की गोली ने दो महान साम्राज्यों ईस्ट इंडिया कम्पमी और मुग़ल सल्तनत को एक साथ ख़त्म कर दिया था.

"आदर्शों का थोथा होना" एक आसान बहाना है असुविधा से बचने के लिए मगर आज अगर थोथे आदर्श वाले ज़िंदा भी हैं तो उल लोगों के रक्तदान की बदौलत जो इन आदर्शों को अपना जीवन मानकर चल रहे हैं,
"सच तानकर चलते रहना है, जहाँ झूठ फिसलता होता है"

विचार कर्म का बीज है. अगर आप अपने ह्रदय में अंकुरित हुए सद्विचार को हवा-पानी-रौशनी देते रहेंगे तो वह मुरझाने के बजाय पल्लवित ज़रूर होगा चाहे वह जैपुरिया पाँव के रूप में हो या सुलभ शौचालय के रूप में या किसी अन्य बेहतर रूप में.

राहुल सि‍द्धार्थ said...

भाई काफी दिनों से चलते-चलते आपको पढता रहा हूं.बस कुछ लिख नहीं पाया.
आप पेट के पत्थ्रर से निजात पा चुके दिल को सुकून मिला.
आप दनादन लिखते रहें.
शुभकामनाऍ

समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...

जहॉं इंसा ही पूजे जाऍं और नर नारी का हो सम्‍मान।
बात-बात में जहॉं न नि‍कले, बरछी या तीर कमान।
जहाँ की धरती नीची न हो, न ऊँचा हो नील गगन
मुझे लेकर ऐसे जहान में...
Bachapan ki yado ko padhakar bachapan yaad aa gaya . badhiya aalekh. dhanyawad.

Zakir Ali 'Rajneesh' said...

दरअसल हमारे पास जो चीजें नहीं होती हैं, लोग उन्हीं के बारे में सोचते हैं। यही बात आदर्श पर भी लागू होती है।

विवेक सिंह said...

शुभकामनाऍ .

भुवनेश शर्मा said...

मेरा भी बचपन कुछ ऐसी ही कल्‍पनाओं में गुजरा....और लगता है आज भी दुनिया की हकीकत से वाकिफ नहीं हो पाया हूं