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Monday, 10 November 2008

प्‍ले-स्‍कूल का प्‍ले !!

हम अपने बच्‍चे को बड़ी आस से प्‍ले-स्‍कूल भेजते हैं कि‍ वहाँ वे शहरी परि‍वेश और तरह-तरह की गति‍वि‍धि‍यों से परि‍चि‍त होंगें। हमारे मन में ये भावना होती है कि‍ घर के भीतर घरेलू चर्चा-कुचर्चा से बच्‍चों पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। लेकि‍न क्‍या प्‍ले-स्‍कूल का माहौल दोस्‍ताना होता है, जैसा कि‍ वहॉं की लैडी-प्रिंसीपल जि‍स लल्‍लो-चप्‍पो अंदाज में बात करती है-यहॉं यह आपका बच्‍चा नहीं, मेरा है और मैं इसकी देखभाल कि‍सी माँ से कम नहीं करूँगी।
(MY SON)

देखता हूँ, वहॉं खि‍लौनों से भरा एक कमरा है, साथ ही एक कम्‍प्यूटर रूम भी। मैं सोचता हूँ चलो, मेरा बच्‍चा एक साथ इतने खि‍लौनों से खेल लेगा, और कम्‍प्‍यूटर पर भी खटर-पटर कर लेगा। ट्रायल बेसि‍स पर अपने बच्‍चे को मेड (कामवाली) के साथ छोड़ देता हूँ। वैसे तो नामी-गि‍रामी प्‍ले स्‍कूल में बच्‍चे के साथ ‘मेड’ को नहीं भेजा जाता है, मगर बच्‍चा यदि‍ ज्‍यादा छोटा हो, यानी दो साल से छोटा, तो ट्रायल बेसि‍स पर दो-चार हफ्ते मेड को भी साथ भेजने की छूट मि‍ल जाती है। हफ्ते-भर बाद मेड की बातों से जो हमने नि‍ष्‍कर्ष नि‍काला, वह बेहद नि‍राशाजनक था-
उस प्‍ले स्‍कूल की अपनी सि‍र्फ दो नौकरानि‍यॉं थी, जि‍नका काम था- झाड़ू-पोछे के साथ-साथ बच्‍चों की पोटी-सूसू साफ करना, बच्‍चों को खाना देना व खि‍लाना। तो वे सूसू पोटी करने पर बच्‍चों को पीटा करती थीं, कि‍ मॉंएं अपने घर से ये भी कराकर नहीं भेजती।
एक हफ्ते बाद भी खि‍लौने अपनी जगह पर ही डटे हुए थे, यानी कि‍सी बच्‍चे को उससे खेलने नहीं दि‍या जाता था। बच्‍चे को ब्रेड पकौड़े और ऐसा ही अन्‍य तेलीय भोजन कराया जाता था। हफ्ते में एक-दो बार तो लंच के नाम पर सि‍र्फ आधा केला खि‍लाकर खानापूर्ति कर देते थे। सबसे बुरी बात थी कि‍ 5-7 बच्‍चों को एक ही ग्‍लास से जूठा पानी ही पि‍ला देती थी। यहॉं हाईजीन का कोई ध्‍यान नहीं रखा जाता था। कि‍सी बच्‍चे को खॉसी, कि‍सी को जुकाम, कि‍सी को कुछ और बीमारी होती थी, मगर उन्‍हें साथ ही रखा जाता था। कोई बच्‍चा रोता था तो बाकी बच्‍चे भी उसी सुर में चालू हो जाते थे, तब नौकरानि‍यॉं परेशान होकर पीटने लगती थीं। वहॉं की टीचर और नौकरानि‍यॉ अक्‍सर मेरी मेड को कहती थी कि‍ जरा दूसरे बच्‍चों को भी देख ले, सूसू करा ले। जो लड़कि‍यॉं ग्रेजुएट हैं या शायद सि‍र्फ 12वीं पास, मगर अंग्रेजी में फर्राटेदार, उन्‍हें पढ़ाने(?) के लि‍ए रखा जाता है। हर बच्‍चे से 1500 से 5000 रूपये मासि‍क ऐंठनेवाले ये स्‍कूल 20-25 बच्‍चों के लि‍ए 5 नौकरानी भी नहीं रख सकते तो समझ सकते हैं कि‍ इन्‍हें बच्‍चों के भवि‍ष्‍य की नहीं, अपने भवि‍ष्‍य की अधि‍क चिंता है।
तो मि‍ला-जुलाकर सारी चीजें बाजार में एक डि‍सप्‍ले की तरह आकर्षक रखी जाती है, जि‍से देखकर बुढ़ापे में आप सि‍र्फ इतना संतोष कर सकते हैं कि‍ आपने अपने बच्‍चों को पढ़ाने में कोई कसर नहीं रखी (चाहे स्‍कूल में ही सारी कसर रह गई हो)।

शहरों में प्‍ले-स्‍कूल का चलन बढ़ रहा है, मॉं-बाप इसे फैशन के तौर पर अपना रहें हैं। बच्‍चे को इससे सीधे तौर पर क्‍या लाभ मि‍लता है, मैं साफ-साफ तो नहीं जानता। एक अनुशासन के तहत मि‍लनसार बनाने की मानसि‍कता ने माता-पि‍ता को इन्‍हें उस उम्र में स्‍कूल में डालने के लि‍ए प्रेरि‍त/मजबूर कि‍या है, जि‍स उम्र में वे खुद माटी की सोंधी महक में प्रकृति‍ का आनंद ले रहे थे और अनायास ही सहज जीवन जीने की खुशी और आजादी महसूस कर रहे थे। अफसोस कि‍ भौति‍क दौड़ में आगे रखने की होड़ में हमने अपने बच्‍चों से ये आजादी छीन ली है।

33 comments:

seema gupta said...

अफसोस कि‍ भौति‍क दौड़ में आगे रखने की होड़ में हमने अपने बच्‍चों से ये आजादी छीन ली है।
" read your artical, it is based on real and fact of todays life, many parents feel same what ever you have expressed, but to be fair it is lifestyle of today also, which many parent like to adopt it and even dont bother the impact could be on kids." well met your son on blog, he is so smart and cute, god may bless him"

regards

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

एक सशक्त लेख.. हालाँकि मैं बहुत सारी प्ले स्कूल के बारे में नही जानता.. मगर मेरे होम टाउन जोधपुर की एक स्कूल में मैने उस स्कूल के बच्चो को लेकर एक शॉर्ट फिल्म बनाई थी.. वो वाकई में बच्चो की नींव मजबूत करते है.. उस प्ले स्कूल के बच्चे अपनी उम्र से कम से कम दो साल आगे थे.. हालाँकि आपने बहुत कुछ सोचने पर मजबूर किया है...

Ghost Buster said...

दो साल की उम्र में स्कूल?????

बच्चों पर ये अत्याचार बंद होना चाहिए.

ताऊ रामपुरिया said...

भाई ये तो अपनी २ समझ है ! अपने हिसाब से खेलने की उम्र में खेलना चाहिए ! पर आजकल माँ-बाप, समाज के आगे दबे हैं और बच्चे बेचारे माँ-बाप के अरमानो के नीचे दबे हैं ! यानी सारा बोझ तो बचपन पर ही है ! समस्या इतनी आसान नही है ! आप ये मत समझना की मैं ऐसा कह रहा हूँ तो मैं इससे अछूता रहा होउंगा ? मैं भी आप लीगों के समान ही चाहे अनचाहे इस दौड़ में शामिल रहा हूँ !

Dr.Bhawna said...

इस तरह की स्थिति तो वास्तव में बहुत खराब है...

संगीता पुरी said...

आज की माएं अपने कैरियर के कारण भी जल्‍दी बच्‍चों से पीछा छुडाने की कोशिश में लगी रहती हैं और बच्‍चे को जल्‍द ही स्‍कूल भेजने की गल्‍ती करती हैं। यह नहीं समझती कि बच्‍चे को वे जो सिखाएंगी , वह कोई नहीं सीखा सकता।

Gyan Dutt Pandey said...

दुखद है यह शिशुओं के सन्दर्भ में क्रेश की व्यवसायिकता।

डॉ .अनुराग said...

दो साल की उम्र में ?कौन से स्कूल है भाई ?????यहाँ तो माँ बाप ही दोषी है .. तक वे भेजेगे इस तरह की दुकाने चलती रहेगी...वैसे कानूनी तौर पर ऐसे स्कूल दण्डित हो सकते है....एकल परिवार .पति पत्नी दोनों का काम करना परिवार के बच्चो से उनका बचपन छीन रहा है .....दादा की जगह अब टी वी ने ले ली है ....भारत से बाहर आप ५ साल से पहले स्कूल में बच्चे को नही भेज सकते ...सच पूछे तो यही उम्र भी है....बंद कालानियो ओर बंद फ्लेटो के चलते खेल के मैदान ओर पार्क न के बराबर हो रहे है...दूसरी बात हम पश्चिम देशो की नकल करने की भोंडी कोशिश तो कर लेते है पर बिना ये जाने के वास्तव में प्ले स्कूल है क्या ?

makrand said...

bahut umda lekh
regards
play me ab play.... aa gaya he

COMMON MAN said...

भाई स्कूल-कालेज अब मात्र पैसे उगाने का धन्धा बन कर रह गये हैं.हर आदमी अब नैतिकता-अनैतिकता का खयाल किये बिना सिर्फ पैसे कमाने की अन्धी दौड में लिप्त हो गया है.

अभिषेक ओझा said...

ये तो जबरी बचपना छिनने वाली बात है ! अत्याचार ही कहेंगे और क्या?

रंजना said...

आपका साधुवाद,इस ज्वलंत मुद्दे को उठाने के लिए.सत्य कहा, बड़ी ही अफसोशनाक स्थिति है.हालाँकि सारे प्ले स्कूल ऐसे नही हैं,पर अधिकांशतः शुद्ध व्यावसायिक स्कूल(दुकान) ऐसे ही हैं.
लेकिन सबसे अफसोसजनक तो यह है कि इतने कम उम्र में अपने बच्चों को इस तरह दूसरों के हवाले छोड़ देना या फ़िर उन्हें पढ़ाई के लिए झोंक देना.
जो बच्चे बोली भी ठीक से नही बोल पाते उन्हें बा बा ब्लैक शिप या ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार रत्वाकर कौन से मूल्य बोध दे रहे हैं ,पता नही?

रंजना [रंजू भाटिया] said...

प्ले स्कूल ..महज २ साल की उम्र में ..है तो बहुत ज्यादती .पर आज कल बड़े शहरों में तो यही ट्रेंड बनता जा रहा है...

Udan Tashtari said...

बड़ी ही अफसोसजनक स्थितियां हैं प्ले स्कूल की. मैं तो समझता था कि वहाँ बच्चों के बहुत उचित देखभाल और विकास होता है.

ab inconvenienti said...

मेरे एकदम से अमीर हुए और सामाजिक स्टेटस पाए पिता ने मुझे चार साल की उम्र में ही होस्टल भेज दिया था. उसका नासूर आज तक मन में है, वहां जैसी आपने बताई वैसी ही स्थितियां थी, बच्चा प्ले स्कूल से शाम को घर लौट आता है पर......

समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...

भाई ये सभी व्यवसायिक है इन्हे क्या लेना देना . इन केन्द्रों में जो व्यवहार वहां के नौकरों के द्वारा किया जाता है वह अपने घरो में नन्हे मुन्नों बच्चे के साथ नही करते है . वो हम गार्जियन की मजबूरी रहती है की हम अपने नन्हे मुन्नों को इन केन्द्रों में भेजते है . बहुत सटीक आलेख के लिए धन्यवाद. जो सच का फर्दाफास कर रही है .

राहुल सि‍द्धार्थ said...

जनाब ये तो शहरों की आदत मे शुमार हो गया है.
बडी खरी-खरी बात लिखी

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

बच्चों की उचित देख-भाल, परिवार के भीतर ही हो सकती है। माँ-बाप, दादी-दादा, नानी-नाना, चाची-चाचा, ताऊ-ताई आदि का स्नेह पाकर जो बच्चा अपना बचपन गुजारता है, उसकी प्रतिपूर्ति कोई भी व्यावसायिक संस्था नहीं कर सकती।

हाल ही में मैने इसी प्रकार की एक घटना को देखकर कुछ कचोटते प्रश्नों को अपने ब्लॉग पर उठाया था। उनका उत्तर ढूँढना चाहिए।

सुप्रतिम बनर्जी said...

ये प्ले स्कूलों की असलियत है, जिसे तकरीबन सारे लोग जानते हैं। लेकिन ये दौर ही कुछ ऐसा है। कुछ कर गुज़रने के चक्कर में लोग अपना-अपना घर छोड़ कर महानगरों में आकर जीने लगते हैं। फैमिली न्यूक्लीयर हो जाती है और पति-पत्नी दोनों का काम करना मजबूरी। इस चक्कर में बेचारे मासूम का बचपन छिन जाता है।

राज भाटिय़ा said...

भाई सच मै बहुत अफ़्सोस जनक बात है, क्यो भेजते है इस उमर मै...
हमारे यहां (जर्मनी) मे कम से कम ३ साल के बच्चे को २,३ घ्ण्टो के लिये किण्डर गार्डन मै भेजते है, उस दोरान आप कभि भी वहा जा कर अपने बच्चे को देख सकते है,
ओर स्कुल ६ साल के बच्चे को भेजते है, ओर प्ले स्कुल के वाजये आप उतने खिलोने घर मै भी बच्चो को दे सकते है,एक कमरे मै (अगर आप फ़्लेट मै रहते है)एक बडे पलास्टिक के टब मै दो चार बाल्टी रेत डाल दे बच्चा उस मै भी खुब खेलता है,ओर अपने घर मै उसे ज्यादा मजाभी आता है, अगर मां अनी आजादी के लिये बच्चे को प्ले स्कुलमै भेजती है तो बडा हो कर यही बच्चा भी मां को वर्दाअश्राम मै भेजे गा
धन्यवाद, आप का लेख आंखे खोलने वाला है,बच्चो पर यह एक जुलम है जो उस के मां बाप करते है, अगर समय नही तो मत करो बच्चे को

रंजन said...

काहे का प्ले स्कुल.. बच्चों का जरा भी ध्यान नहीं रखते..

बहुत निराशा हुई ये जानकर.

PN Subramanian said...

आज के अधिकतर प्ले स्कूल ऐसे ही हैं. दो साल की उम्र में ही स्कूल भिजवाना वास्तव में ज़्यादती ही है

Mired Mirage said...

यह बच्चों के साथ सरासर अन्याय है परन्तु जब तक कोई अन्य उपाय नहीं होता यह सब चलता रहेगा । वैसे उपाय बहुत से हैं । उन पर लिखना व सोचना होगा । और फिर उन्हें कार्यान्वित भी करना होगा । वैसे कुछ गिने चुने स्कूलों में बच्चों का पूरा ध्यान रखा जाता है ।
घुघूती बासूती

योगेन्द्र मौदगिल said...

प्ले स्कूल का अर्थ है कि
ऐसी जगह जहां बच्चों से खेल हो
ना कि बच्चे खेल सकें

नौकरीपेशा बहू हिसाब में बहुत अच्छी होती है लेकिन बेचारी ये नहीं समझ पाती कि सास की दो समय की ससम्मान रोटी प्ले स्कूल की फीस से बहुत कम है और संस्कार बोनस में
मजे की बात एक और है कि बेटा भी बहू की ही मानता है पता क्यों पिता जी भी तो अम्मां की बात ही मानते थे
हां थोड़ा समय स्थान व सुविधा की भिन्नता को छोड़ कर

इस सब के बावजूद हमारी विकासशीलता को प्रणाम

अच्छी पोस्ट
मुझे एक कविता याद आ गयी आज डाल दूंगा उस के एक स्टैंज़े में आप ही की पीड़ा है
बहरहाल धन्यवाद
और हां भगत जूनियर को आशीष फोटो अच्छी है

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

बहुत अच्छा आलेख है. "चलता है" की संस्कृति में कोई भी काम अच्छे तरीके से करने की आवश्यकता ही नहीं रहती है.

pintu said...

बहुत अच्छी बात कही है....

pallavi trivedi said...

bachchon se bachpan chheenna bahut galat hai....aur rahi baat 2 saal ki umr mein school bhejne ki to sirf status ko batane ke liye parents aisa karte hain taki kisi se peechhe na rah jaaye..

मोहन वशिष्‍ठ said...

कंप्‍टीशियन अब हर चीज पर हावी हो गया है बिरादर इसी धुन में लोगों ने अपने बच्‍चों का बचपना भी छीन लिया बस जैसे ही चलना और बोलना शुरू किया लिखा दिया नाम प्‍ले स्‍कूल में और शुरू हो गया उसका भविष्‍य जबकि हमारे समय में तो ऐसा कुछ था ही नहीं छह साल की उम्र में जाकर प्रवेश मिलता था

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

हम अपने सपनो को जल्दी पूरा करने के लिए बच्चो को धकेल रहे है और प्ले स्कूल पहला गड्डा है

Tarun said...

क्या बात है नजर का टिका लगा कर सबके नजर कर रहे हो, छोटू भगत तो हीरो दिक्खे है लेकिन अभी से स्कूल भेज कर जुल्म ना करो इस फूल से बालक पर....Let him Enjoy.

प्रदीप मानोरिया said...

बेहद सही ओब्सेर्वेशन है आपका सटीक और सार्थक ब्लॉग जगत से लंबे समय तक गायब रहने के लिए माफी चाहता हूँ अब वापिस उसी कलम के साथ मौजूद हूँ .

Jimmy said...

aache soch hai

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Vidhu said...

बहुत बड़ी समस्या पर इतनी बारीक नजर,पहली बार आपका ब्लॉग देखा प्रोफाइल पढ़ी सरलता से कही गई बातें इस जीवन मैं गहरे भरे अर्थ भरी हैं ,बधाई