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Monday, 12 January 2009

‘’डॉन्‍ट बी संतुष्‍ट, थोड़ा और वि‍श करो’’

चीजें हासि‍ल होने के बाद धीरे-धीरे उसका सम्‍मोहन टूटने लगता है। दुनि‍या जि‍स तेजी से बदल रही है, स्‍वाद और जरू‍रतें जि‍स तेजी से बदल रही है, उसकी गति‍ का अंदाजा लगाना आसान नहीं है। 1984-85 में हॉस्‍टल के प्रार्चाय के पास टी.वी रि‍मोट देखा था जो दस मीटर की दूरी से उसे बंद कर देते थे, तब इतनी हैरानी हुई थी कि‍ जैसे पी.सी.सरकार का जादू देख लि‍या हो! 2001 में जब मोबाइल हाथ में लि‍या था तो हैरान होता था कि‍ न तार है न कोई एंटीना, आवाज पहुँच कैसे रही है! जैसे कल की ही बात हो, मैं अपनी मॉं को मोबाइल पर डायल करना, कॉल रीसीव करना आदि‍ सीखा रहा था। और पि‍छले दि‍नों, जब एक रि‍श्‍तेदार के घर गया तो पॉच-सात रि‍मोट देखकर घबरा गया कि‍ टी.वी. कि‍स से चलाऊँ! तब 10-12 साल का एक बच्‍चा बताने लगा कि‍ ये ए.सी. का रि‍मोट है, बाकी डी.वी.डी., टी.वी., टाटा स्‍काई, फैन, म्‍यूजि‍क सि‍स्‍टम आदि‍ के रि‍मोट हैं। मैं अपनी मॉं की तरह अवाक् सुनता रहा! और यह सोचता रहा कि‍ अप-टू- डेट न होने की पीड़ा क्‍या होती है। जब 1999 में विंडो 98 कम्‍प्‍यूटर खरीदा था, तब हम सभी खुद को समय के साथ चलने के भ्रम में जीए जा रहे थे। लगता था जैसे बड़े एडवांस हैं, अगले कुछ सालों में विंडो एक्‍स.पी. आ गई, उसे बेचकर ये ले लि‍या, कि‍ तभी वि‍स्‍टा चल पड़ी।
भौति‍क चीजों घि‍राव हम लोगों पर इस कदर हावी हो चुका है कि‍ हम उसके बि‍ना जीवन की संभावनाओं का अंत मानने लगते हैं। इसलि‍ए आजकल ए.एम.सी. कराकर चिंतामुक्‍त रहना चाहते हैं। बेचैनि‍यों के कई उदाहरण हैं, कम्‍प्‍यूटर पर नेट नहीं चलता तो हम सर्विस प्रोवाइडर को बेचैन होकर फोन लगा देते हैं, बि‍जली गुल हो जाती है तो ठंडे पानी में नहाने के नाम से सि‍हर उठते हैं, पेट्रॉल मि‍लना बंद हो जाए तो हमारी नौकरी खतरे में पड़ने लगती है, मोबाइल घर पर छूट जाए तो हम 10 कि‍.मी. वापस लौटकर आते हैं, गुम हो जाए तो तुरंत नए की जुगाड़ में बेचैन हो उठते हैं।
क्‍या हमने अपने आपको इतना व्‍यस्‍त कर लि‍या है या जीवन की जटि‍लताओं की यह अनि‍वार्य मांग है, जि‍से टाला नहीं जा सकता। शांति‍ चीजों को हासि‍ल कर लेने में है या उसके सम्‍मोहन से मुक्‍त रहने में। शांति‍ अपनी जरूरतों को कम करने में है अथवा हर जरूरत को पूरा कर लेने में है।
इन सवालों का जवाब देना आसान नहीं है। जो आज जि‍स मुकाम पर हैं, उन्‍होंने अपने आपको झोंककर उसे हासि‍ल कि‍या है या अभी भी संघर्षरत हैं। यह इति‍हास की गति‍ है, चक्र है, जो अब शायद तेजी से घूम रहा है, उसे रोकने या धीमा करने का प्रयास या वि‍चार नि‍रर्थक है, वह व्‍यक्‍ति‍ के अपने जीवन-चक्र पर ही जाकर समाप्‍त हो सकता है, उसमें पीसते हुए, घि‍सते हुए, रि‍सते हुए........ और यह बात खासकर दुनि‍या के उस तबके पर लागू होती है, जि‍न्‍होंने रोटी के लि‍ए ज्‍यादा संघर्ष कि‍या है।

26 comments:

ताऊ रामपुरिया said...

यह इति‍हास की गति‍ है, चक्र है, जो अब शायद तेजी से घूम रहा है, उसे रोकने या धीमा करने का प्रयास या वि‍चार नि‍रर्थक है, वह व्‍यक्‍ति‍ के अपने जीवन-चक्र पर ही जाकर समाप्‍त हो सकता है, उसमें पीसते हुए, घि‍सते हुए, रि‍सते हुए.......

शायद आप सही कह रहे हैं. ये एक चक्र है जो जीवन की समाप्ति तक चलता ही रहता है.

रामराम.

seema gupta said...

बेचैनि‍यों के कई उदाहरण हैं, कम्‍प्‍यूटर पर नेट नहीं चलता तो हम सर्विस प्रोवाइडर को बेचैन होकर फोन लगा देते हैं, बि‍जली गुल हो जाती है तो ठंडे पानी में नहाने के नाम से सि‍हर उठते हैं, पेट्रॉल मि‍लना बंद हो जाए तो हमारी नौकरी खतरे में पड़ने लगती है, मोबाइल घर पर छूट जाए तो हम 10 कि‍.मी. वापस लौटकर आते हैं, गुम हो जाए तो तुरंत नए की जुगाड़ में बेचैन हो उठते हैं।
" अगर ध्यान से देखा जाए तो ये बेचानिया हम रोजमर्रा की जिन्दगी मे झेलते हैं, शायद इसलिए क्योंकि हमने अपने आप को इन सब चीजों का आदि बना लिया है, और हम इनके बिना नही जी सकते.... यही जीवन का चक्र है और इसी तरह चलता भी रहता है..."

regards

कुश said...

शायद सब कुछ पा लेने की चाह ही ये सब करवाती हो... आपका ये लेख एक रिवर्स गियर लगवाता है...

Irshad said...

bahut sunder...bahut bahut mubarabaad.

आदर्श राठौर said...

इसे सम्महोन कहें या कुछ और, इसके प्रभाव से बच पाना नामुमकिन है।

डॉ .अनुराग said...

ज्यूँ ज्यूँ आप तरक्की करते है.....आपके जीवन की आवश्यकता बढती चली जाती है....याद कीजिये आपने लास्ट चिट्ठी कब लिखी थी ?

संगीता पुरी said...

आश्‍चर्य की बात तो यह है कि फिर भी हम अपने को स्‍वतंत्र मानते हें , जबकि इतने परतंत्र तो हम आदिमकाल में भी नहीं होंगे....क्‍या यह माना जा सकता है कि सभ्‍यता और विज्ञान के विकास के साथ साथ हम पराधीन भी होने लगते हें।

Gyan Dutt Pandey said...

कभी कभी मै यह अनुमान लगाता हूं कि ठीकठाक स्तर पर कितने कम में काम चल सकता है। और सिवाय मैडिकल खर्चों के - जिनका अनुमान लगाना कठिन है, जीवन मैनेज करना बहुत कठिन नहीं लगता।

और आम भारतीय मैडीकल एक्सीजेंसी प्लान नहीं करता। वह कर ले तो जिन्दगी कष्टकर न हो!

जीवन चक्र अभी भी मैनेजेबल है।

COMMON MAN said...

मुझे तो ऐसा लगता हि कि विज्ञान ने तो तरक्की है लेकिन आदमी जंगली बनता चला जा रहा है.

अभिषेक ओझा said...

इस चक्र में तो हम भी फंसे हुए है ! निकलने का कोई उपाय हो तो बताएं. आपके पिताजी के स्वास्थलाभ को जानकर प्रसन्नता हुई. शुभकामनायें.

रंजना [रंजू भाटिया] said...

यही अब जीवन बनता जा रहा है और इस से आगे आने वाली पीढी और भी प्रभावित है ..अच्छा विश्लेष्ण किया आपने

सुशील कुमार छौक्कर said...

समय के पहिए में बैक गियर नही होता। हमें उसके साथ ही दोडना पड़ता है। कुछ लोग तेजी से दोडते है और कुछ धीरे धीरे। और अनुराग जी पूछ रहे है आपसे कि याद करो कि लास्ट चिट्ठी कब लिखी। मैंने तो पिछले गुरुवार को लिखी थी। और आपने ...। अवश्य बताना।

विवेक सिंह said...

अरे साहब दुनिया को आगे बढने दो :)

Ghost Buster said...

परिवर्तन ही एकमात्र अपरिवर्तनीय चीज है.

Udan Tashtari said...

अच्छा ये बताओ कि क्या हुआ है?? हमसे बात करो न, सब सही चलने लगेगा सही दिशा में.

अनूप शुक्ल said...

सुन्दर,विचारणीय पोस्ट!

नीरज गोस्वामी said...

शांति‍ चीजों को हासि‍ल कर लेने में है या उसके सम्‍मोहन से मुक्‍त रहने में। शांति‍ अपनी जरूरतों को कम करने में है अथवा हर जरूरत को पूरा कर लेने में है।
इन सवालों का जवाब देना आसान नहीं है।
सच कहा आपने...शान्ति मन में होती है चीजों के पीछे भागने से नहीं मिलती....और चीजों का कोई अंत नहीं है...भाग दौड़ में सब शरीक हैं....सबको पीछे न रह जायें ये डर सता रहा है...और इसी डर ने इंसान को कितना स्वार्थी आत्म केंद्रित कर दिया है....
नीरज

सचिन मिश्रा said...

Bahut badiya.

राज भाटिय़ा said...

जी मानते है जिन्दगी बहुत रफ़तार से बढ रही है, लेकिन सोचो जिन के पास यह सब साधन नही है या जिन के पास यह सब साधन तो है लेकिन वो फ़िर भी इन का प्रयोग नही करते , क्या वो जिन्दा नही, यह तो हम सब के सोचने की अपनी अपनी शक्ति है, मेने आज तक ४ मंजिल तक लिफ़्ट क प्रयोग नही किया, आप जेसे जेसे इस जीवन को ढालो वेसे ही यह जीवन ढल जाता है.
धन्यवाद

विनय said...

आपका सहयोग चाहूँगा कि मेरे नये ब्लाग के बारे में आपके मित्र भी जाने,

ब्लागिंग या अंतरजाल तकनीक से सम्बंधित कोई प्रश्न है अवश्य अवगत करायें
तकनीक दृष्टा/Tech Prevue

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

यह सिर्फ सोचने का एक नजरिया है। जिसकी जैसी सोच हो, उसे वैसा ही सही लगता है।

रंजना said...

निःसंदेह ......शांति‍ चीजों को हासि‍ल कर लेने में नही , उसके सम्‍मोहन से मुक्‍त रहने में है.
जैसे रेल के सफर में ,वहां उपलब्ध प्रत्येक सुविधा का उपभोग कर स्टेसन आते ही आराम से उस से उतर आगे की ओर चल देते हैं,सीट या वहां की सुविधा से बंधे नही रहते,वैसे ही जीवन में भौतिक संसाधनों को आवशयकता भर बिना उसके मोह में आबध्द हुए उपभोग कर और आत्मिक उत्थान के मार्ग पर चल देना है.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

जीवन की भौतिक जरूरतों में ‘न्यूनतम’ की सीमा तो है लेकिन ‘अधिकतम’ की कोई सीमा नहीं है। मुश्किल यह है कि हम अधिकतम का अर्जन करने के लिए भाग रहे हैं। परिणाम है एक मृग मरीचिका।

सन्तोष का धन ही सन्तुष्टि दे सकता है। बाकी कुछ भी नहीं।

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

समय के साथ चलने में कोई बुराई नहीं है. मगर अपन तो अभी भी "संतोषः परमो धर्मः:" से ही चिपके है. पिताजी की सफल इंजिओप्लास्ती के बारे में जानकर खुशी हुई.

Dev said...

आपको लोहडी और मकर संक्रान्ति की शुभकामनाएँ....

प्रदीप मानोरिया said...

यथार्थ सटीक सार्थक