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Saturday, 13 November 2010

जीवन चासनी-सा.....

-तुमने चासनी में जामुन क्‍यों छोड़ा ?


उसे समझ नहीं आया। मैंने डब्बा सामने कर दि‍या।


'बि‍कानो' के डब्‍बे में आधा गुलाब जामुन तैर रहा था।


-गुलाब तो तुम खा गई, अब तो जामुन ही बचा है , पूरा ही खा लेती!!


-एक ही बचा था सो आधा तुम्‍हारे लि‍या छोड़ दि‍या!


दोनो हॅसते-हँसते अपने अपने काम पर नि‍कल गए।


दोपहर बाद मैंने उसे फोन कि‍या-


-हैलो !!कहाँ हो ?


पीछे गाड़ि‍यों की हॉर्न सुनाई पड़ रही थी


-मार्केट में हूँ!


-क्‍या खरीद रही हो ?


-हूँ..... पुत्‍तर के लि‍ए कलर बुक खरीद रही हूँ, कुछ काम है क्‍या ?


-कुछ नहीं यूँ ही फोन लगा लि‍या था !


इससे पहले मैं कुछ कहता, मोबाइल पर कि‍सी नंबर से कॉल वेटिंग नजर आया।


मैंने कहा-


-होल्‍ड करो, मैं दूसरी तरफ बात करके लौटता हूँ,


-हैलो.. कौन बोल रहा है?...


.........




मैंने फि‍र पूछा, पर कोई जवाब नहीं आया.........


कॉल वेटिंग का फोन उठाने पर कई बार पीक नहीं होता है,


हार्न की आवाज फि‍र आने लगी-
-हैलो कौन है उधर...... , कौन है......, बोलो भी....सोनि‍या तुम हो क्‍या ?
-हॉं, मैं लाइन पर हूँ!
-तो तुम बोल क्‍यों नहीं रही?
उसने मासूमीयत से कहा-
-मैं तो इधर हूँ ना, तुम तो कि‍सी और से बात करने गए थे ना मुझे होल्‍ड पर रखकर !


मेरी हँसी छूट गई!!


-अरे ,यार इधर-उधर क्‍या होता है, जब तुम्‍हे मेरी आवाज सुनाई दे रही है तो समझो दूसरा कॉल पीक नहीं हुआ, तुम भी ना !!


शाम को जब मैं घर लौटा और सेब नि‍कालने के लि‍ए फ्रीज खोला तो सामने गुलाब जामुन से पैक 'बि‍कानो' का डब्‍बा नजर आया!!


-तो तुम मार्केट में कलर बुक खरीद रही थी.....


यह कहते ही मुस्‍कुराहट से शाम गुलाबी होने लगी।








5 comments:

नीरज जाट जी said...

क्या बात है।
ये सोनिया कौन है?
चलो, अब फिर मजे करो गुलाब जामुन के।

जितेन्द़ भगत said...

अरे भई नीरज जी, सोनि‍या मेरी धर्मपत्‍नी है :)

प्रवीण पाण्डेय said...

वाह, मधुरम् जीवनम्।

कुश said...

ये चाशनी तो मोहब्बत वाली है..

वो कॉल वेटिंग वाली बात तो रियलास्टिक है..

डॉ॰ मोनिका शर्मा said...

जीवन की मिठास बनी रहे यही दुआ है..... प्रवाहमयी लिखा आपने.....