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Sunday, 10 March 2013

वसूली

दरवाजे पर कि‍सी ने दस्‍तक दी !
-मैं देखता हूँ !
-आप बैठि‍ए और चाय लीजि‍ए, मैं देखती हूँ कौन आया। 
चाय की चुस्‍की लेते हुए रघु पांडेय ने देखा कि‍ दो तगड़े सरदार सख्‍त चेहरे लि‍ए रेखा को कुछ कह रहे हैं।
करीब दो मि‍नट बाद जब वह लौटी,उसका चेहरा उतरा हुआ था। रघु को स्‍थि‍ति‍ भॉंपते देर न लगी।
-क्‍या बात है भाभी ?
- कुछ नहीं रघु, साल भर हुए हैं यहॉं आए हुए। यह सरदारों के मुहल्‍ला है और बाहर से आकर बसनेवाले अभी हम ही है। कह गए हैं- कल दस हजार रूपये चाहि‍ए।
रघु ने गहरी सॉंस ली और बोला- कल दरवाजा मैं खोलूँगा।
रेखा ने घबराकर कहा-
नहीं रघु, हमें कोई मुसीबत नहीं चाहि‍ए। 
- आप चिंता मत करो, कल हम अपने-आप नि‍पट लेंगे!

रघु हट्टा-कट्टा जवान था, और राजनीति‍क कार्यकर्ता होने की वजह से आस-पास के इलाकों से परि‍चीत भी।
उसने अपने लड़कों को इस घटना से आगाह भी कर दि‍या।  
अगले दि‍न दरवाजे पर फि‍र दस्‍तक हुई। रघु ने दरवाजा खोला। बाहर वही दोनो सरदार थे। उनमें से एक सरदार ने कहा-
-भाभी जी को भेजना जी! 
-बोलो, क्‍या काम है? 
रघु ने पूछा।
आप उनको ही भेज दो, उनसे ही काम है-
यह कहकर दोनो सरदार दरवाजे से अंदर आने लगे। उनके सामने रघु अड़कर खड़ा हो गया।  
धक्‍का-मुक्‍की की नौबत आ गई, रघु ने एक घूँसा सरदार के नाक के पास जड़ दी, खून आने लगा।
पल-भर में घर के बाहर खबर फैल गई। मुहल्‍ले की औरतें और दूसरे सरदार वहॉ इकट्ठे हो गए।
इतनी भीड़ देखकर रघु भी घबरा गया। आखि‍र इस मुहल्‍ले में वह भी तो बाहरवाला ही था।
उधर रघु का घूंसा खाकर दोनो सरदार घबराए हुए थे, वास्‍तव में उन्‍हें अंदाजा नहीं था कि‍ ऐसी नौबत भी आ जाएगी। मामला ठंडा हुआ और सब अपने-अपने घर को चले गए।
 रघु अकेला ही घूमा करता था, इसलि‍ए उसे अक्‍सर यह डर सताता था कि‍ वे सरदार अपने साथि‍यों के साथ उन्‍हें कहीं घेर न ले। एक बार वह मुहल्‍ले की एक संकरी गली से नि‍कल रहा था। गली इतनी संकरी थी कि‍ इससे दो लोग ही साथ-साथ चल सकते थे। तभी वही दोनों सरदार सामने से आते नजर आए। रघु ने देखा इस गली के दॉए-बॉए कोई कट नहीं है और अगर वह पीछे मुड़कर जाएगा तो ये फि‍र से शेर बनने की कोशि‍श करेंगे। 
अब चाहे जो हो इनके बीच से ही निकलूँगा- रघू ने अपने भीतर हि‍म्‍मत बांधी और तनकर आगे बढ़ा। जैसे ही वह उनके नजदीक पहुँचा, दोनों ने कहा- शस्‍त्रि‍काल भाई साब् ।
रघु को इसका अंदाजा ना था, पर उसने भी पलटकर सहजता से कहा-
- हॉं जी नमस्‍कार्। और सब ठीक्?
इतना पूछना था कि‍ एक सरदार रूआंसा होकर बोला-
-अजी कहॉं ठीक, मेरी बीवी से मेरा झगड़ा चल रहा है। मैं बहुत परेशान हूँ। संजना आपको जानती है। मैंने आपसे झगड़ेवाली बात जब बताई थी, तब उसने कहा कि‍ अच्‍छा हुआ जो भइया ने तुम्‍हे मारा। अब आप ही सुलह करा सकते हो जी। आ जाओ जी, हमारे घर चलो और कुछ लस्‍सी-वस्‍सी लो!
हॉं जी, चलो-चलो, दूसरे सरदार ने भी जोर दि‍या।
इसे साजि‍श समझे या मान-सम्‍मान- रघु सोच में पड़ गया पर बि‍ना जाहि‍र कि‍ए वह उनके साथ चल पड़ा।
संजना रघू को देखकर खुश हुई और भागकर लस्‍सी लेने गई। उनके बीच सुलह कराकर रघु अपने घर के लि‍ए चल पड़ा।
: जि‍तेन्‍द्र














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