एक ही व्यक्ति अलग-अलग जीवन-स्िथतियों में जीता है, अलग-अलग उम्र को जीता है और अपने फलसफे बनाता है.... या नहीं भी बनाता....। लेकिन फितरत यही होती है कि व्यक्ति अपनी ही मूरत को बनाता है, सँवारता है, फिर उसे तोड़कर चल देता है। हमारा शहर फैलता जा रहा है और हम उसमें सिकुड़ते जा रहे हैं- मन से भी और रिश्तों से भी। मानसिकता का फर्क हमारे भौतिक जगत को प्रभावित कर रहा है और उससे प्रभावित भी हो रहा है।
हमारा संसार 'घर और लैपटॉप' के भीतर सिमटकर रह गया है। इस घर में या लैपटॉप में कुछ भी गड़बड़ी हो, हम बेचैन हो जाते हैं। अब अपनी ही बात बताऊँ, मैंने अपने लैपटॉप पर इंटरनेट से एक एंटी-वायरस डाउनलोड किया था, पर वह कारगर साबित नहीं हुआ, मैंने कंट्रोल पैनल जाकर जैसे ही उसे रिमूव किया, मेरी समस्या वहीं से शुरू हुई। डी-ड्राइव में मौजूद लगभग 5 जी.बी. की सारी फाइल उड़ गई, फिर इसके साथ कई चीजें उड़ गई- मेरी नींद, मेरे होश.....। मेरी हालत देवदास-सी हो गई और अपनी इस हालत पे मुझे गुस्सा भी आया- मैंने अपने-आपको इतना पराश्रित क्यों बना डाला है ?
मैंने याद करने की कोशिश की, मैं दो बार ऐसे अवसाद से और घिर चुका हूँ........... एक बार मोबाइल गुम होने के बाद, दूसरी बार मोबाइल से सारे नंबर डिलिट होने के बाद।
मैं सोच रहा था कि मैं अपने दोस्त को क्या जवाब दूँगा, जिसकी अभी-अभी शादी हुई थी और इस अवसर की सारी तस्वीरें और वीडियो मेरे कम्प्यूटर में सेव थी। मेरा जो नुक्सान हुआ सो अलग।
मैंने अपने एक मित्र से पूछा कि क्या इस रिमूव्ड फाइल को पाया जा सकता है ? फरवरी 2010 तक मेरा लैपटॉप अंडर-वारंटी है, इस वजह से हार्ड-डीस्क निकालना ठीक नहीं है, पर किसी सॉफ्टवेयर से ऐसा किया जा सकता है। मेरा मित्र इसके ज्यादा कुछ न बता सका। अब लैपटॉप मुझे खाली डब्बा-सा लग रहा है।
हम जैसे-जैसे मशीनों के आदी होते जाऍंगे, वैसे-वैसे मैन्यूअल और मैकेनिकल के बीच द्वंद्व बढ़ता जाएगा, क्योंकि मनुष्य अंतत: भूल करने के लिए अभिशप्त है, आखिर हम इंसान जो है।
कभी-कभी लगता है, हम अपने-आपको कितना उलझाते जा रहे हैं। हाई-टेक होती जिंदगी में रि-टेक की गुंजाइश खत्म-सी होती जा रही है।
Saturday, 2 May 2009
Friday, 24 April 2009
चलो बुलावा आया है......
धर्म के बहाने यात्रा या यात्रा के बहाने धर्म का निबाह हो जाना अच्छा लगता है। अगर धार्मिक स्थल पर भीड़ अपेक्षा के बिल्कुल विपरीत हो, तो इसका भी अपना आनंद है। मैं बात कर रहा हूँ, वैष्णों देवी (जम्मू) की यात्रा की। कल शाम ही लौटा हूँ, शरीर पूरी तरह थकान से उबरा नहीं है। विस्तृत विवरण एक-दो दिन में पोस्ट करुँगा, फिलहाल आप सबको जय माता दी !!
Friday, 3 April 2009
राह से गुजरते हुए.......
अजनबी हो जाने का खौफ
बदनाम हो जाने से ज्यादा खौफनाक है।
अकेले हो जाने का खौफ
भीड़ में खो जाने से ज्यादा खौफनाक है।
किसी रास्ते् का न होना
राह भटक जाने से ज्यादा खौफनाक है।
तनाव में जीना
असमय मर जाने से ज्यादा खौफनाक है।
इनसे कहीं ज्यादा खौफनाक है-
आसपास होते हुए भी न होने के अहसास से भर जाना.........
-जितेन्द्र भगत
( चाहा तो था कि ब्लॉग पर निरंतरता बनाए रखूँ, पर शायद वक्त किसी चौराहे पर खड़ा था, जहॉं से गुजरनेवाली हर सड़क मुझे चारो तरफ से खींच रही थी, वक्त के साथ मैं भी बँट-सा गया था...... आज इतने अरसे बाद वक्त ने कुछ यादें बटोरने, कुछ यादें ताजा करने की मोहलत दी है, अभी तो यही उम्मीद है कि वक्त की झोली से कुछ पल चुराकर इस गली में आता-जाता रहूँगा। )
बदनाम हो जाने से ज्यादा खौफनाक है।
अकेले हो जाने का खौफ
भीड़ में खो जाने से ज्यादा खौफनाक है।
किसी रास्ते् का न होना
राह भटक जाने से ज्यादा खौफनाक है।
तनाव में जीना
असमय मर जाने से ज्यादा खौफनाक है।
इनसे कहीं ज्यादा खौफनाक है-
आसपास होते हुए भी न होने के अहसास से भर जाना.........
-जितेन्द्र भगत
( चाहा तो था कि ब्लॉग पर निरंतरता बनाए रखूँ, पर शायद वक्त किसी चौराहे पर खड़ा था, जहॉं से गुजरनेवाली हर सड़क मुझे चारो तरफ से खींच रही थी, वक्त के साथ मैं भी बँट-सा गया था...... आज इतने अरसे बाद वक्त ने कुछ यादें बटोरने, कुछ यादें ताजा करने की मोहलत दी है, अभी तो यही उम्मीद है कि वक्त की झोली से कुछ पल चुराकर इस गली में आता-जाता रहूँगा। )
Monday, 19 January 2009
घिसे हुए जूतों की दास्तान !!
(I)
मेरी चमड़ी पर कई झुर्रियाँ पड़ गई हैं, कमर भी झुक गई है। मेरे फीते की धज्जियॉं भी उड़ गई हैं। मेरी आत्मा (सॉल) लगभग घिस चुकी है, उसके परखच्चे बस उड़ने ही वाले हैं। अपनी उम्र से ज्यादा मैं जी चुका हूँ। सन् 2004 की होली में मैंने मालिक के पैरों को आसरा दिया था, 2009 की होली अब आनेवाली है, पर मेरा मालिक आज भी मेरी अटकी हुई सॉस को रोकने की बेतरह कोशिश कर रहा है।
मुझे आज भी याद है, जब मेरा मालिक दूल्हा बना था, शादी के मंडप से दो कुड़ियॉं मुझे छिपा ले गई थीं। और उस दिन का तो क्या कहना, जब मेरे मालिक को लड़का हुआ था, चाहता तो था कि पालने तक जाऊँ, लेकिन हम लोगों की तकदीर ही कुछ ऐसी है, शुद्ध और स्वच्छ स्थानों से हमें दूर ही रहना पड़ता है, चाहे मंदिर हो या अस्पताल।
वैसे तो मेरे पूर्वजों का इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है। महाराज भरत ने श्रीराम के खड़ाऊ को पूज्य बनाकर मेरे पूर्वजों को जितनी इज्जत बख्शी, ऐसा उदाहरण विश्व में कहीं नहीं मिलता।
एक बार मेरे मालिक सड़क से गुजर रहे थे, मैंने देखा कुछ लोग मेरे सहोदरों को हाथों में लेकर दूसरे आदमी को पीट रहे थे। मुझे ऐसे लोगों से चीढ़ है जो चीजों का गलत इस्तमाल करते हैं। जूते की शोभा पैरों में ही है, कहीं और नहीं। कई बार तो मेरी माला बनाकर मुझे भी गधे नामक जंतु की सैर करा दी जाती है।
कहीं किसी मंच पर कुछ भी गड़बड़ हो, मेरे सहोदरों को ही उठा-उठाकर फेंका जाता है। अभी बीते महिने की बात है, मेरे विदेशी मित्र को किसी ने बुश पर दे मारा।
गर्मी, सर्दी, बरसात - न जाने क्या-क्या झेले हैं मैंने। नदी, पर्वत, आकाश - न जाने क्या-क्या नापे हैं मैंने। मुझे नौकरी पर रखनेवाला मेरा मालिक बेचारा खुद पक्की नौकरी की जुगत में रहा। समय के अभाव के बावजूद उसने बराबर मेरा ख्याल रखा, सुबह बड़े चाव से मेरे चेहरे को चमकाता और रात को गहरी थकान के बावजूद मुझे इधर-उधर फेंकने की भूल नहीं करता। सोचा था मालिक को पक्की नौकरी मिलते ही मुझे रिटायरमेंट मिल जाएगी, पर मालिक पर जिम्मेदारी दिनोंदिन बढती गई और मुझे ओवरटाइम तक करना पड़ा।
मजे की बात बताऊँ, मालिक मेरे बिना रह नहीं सकते, कहीं आ-जा नहीं सकते, ट्रेन के सफर में मैं उनसे बिछुड़कर किसी और के पैरों की शोभा न बढ़ाऊँ, इसलिए अपने पास थैले में डालकर सोते हैं। मेरी चिंता में इन्होंने मंदिर जाना तक छोड़ दिया है, अगर जाते भी हैं तो बाहर से खड़े-खड़े ही नमन कर लेते हैं
कभी-कभी सोचता हूँ दुनिया में जितने भी प्रेमी हुए हैं, अक्सर रोमियो-जूलियट, शीरी-फरहाद, लैला-मजनू, चंदा और चकोर की कस्में खाते देखे गए हैं, लेकिन क्या किसी ने हमारी जोड़ियों की कसम खाई है ??
(II)
लोग मेरे मालिक को कहते हैं यार तेरा जूता तो काफी चल गया!! मैं पूछता हूँ ये तारीफ है या ताना !! एक आदमी ने पक्की नौकरी के इंतजार में छ: साल मेरे साथ गुजार दिए जबकि ऐसे भी लोग हैं जो साल-छ:महिने में जूते बदल लेते हैं।
नए जूते खरीदना कोई मुश्किल नहीं है, पर मेरे मालिक को आज की रवायतों का ठीक-ठीक अंदाजा नहीं है, वर्ना वे इस भरोसे या भ्रम में न जीते कि पक्की नौकरी मिलते ही नए जूते ले लूँगा। अलादीन के चिराग और मुझमें कुछ तो फर्क होता है न!!
जिस तरह पलकें आखों पर बोझ नहीं होती, उसी तरह मेरे मालिक ने भी मुझे कभी बोझ नहीं माना, बल्कि हमेशा अपने पथ का साथी माना है,
मेरी जर्जर काया के बावजूद उनका मोह मुझसे नहीं छुटा है। बस एक ही गुजारिश है इनके विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसरों से, मुझे अपने मालिक से निजात दिलाने का कुछ जतन करो। पक्की नौकरी देकर इसकी एड़ियों को भी नए जूते का सुख भोगने दो। घिसे हुए जूते को पॉलिश से कब तक छिपाता रहेगा मेरा मालिक !! छ: साल कम नहीं होते हैं..... आदमी घिस जाता है, मैं तो अदद एक जूता हूँ।
मेरी चमड़ी पर कई झुर्रियाँ पड़ गई हैं, कमर भी झुक गई है। मेरे फीते की धज्जियॉं भी उड़ गई हैं। मेरी आत्मा (सॉल) लगभग घिस चुकी है, उसके परखच्चे बस उड़ने ही वाले हैं। अपनी उम्र से ज्यादा मैं जी चुका हूँ। सन् 2004 की होली में मैंने मालिक के पैरों को आसरा दिया था, 2009 की होली अब आनेवाली है, पर मेरा मालिक आज भी मेरी अटकी हुई सॉस को रोकने की बेतरह कोशिश कर रहा है।
मुझे आज भी याद है, जब मेरा मालिक दूल्हा बना था, शादी के मंडप से दो कुड़ियॉं मुझे छिपा ले गई थीं। और उस दिन का तो क्या कहना, जब मेरे मालिक को लड़का हुआ था, चाहता तो था कि पालने तक जाऊँ, लेकिन हम लोगों की तकदीर ही कुछ ऐसी है, शुद्ध और स्वच्छ स्थानों से हमें दूर ही रहना पड़ता है, चाहे मंदिर हो या अस्पताल।
वैसे तो मेरे पूर्वजों का इतिहास अत्यंत गौरवशाली रहा है। महाराज भरत ने श्रीराम के खड़ाऊ को पूज्य बनाकर मेरे पूर्वजों को जितनी इज्जत बख्शी, ऐसा उदाहरण विश्व में कहीं नहीं मिलता।
एक बार मेरे मालिक सड़क से गुजर रहे थे, मैंने देखा कुछ लोग मेरे सहोदरों को हाथों में लेकर दूसरे आदमी को पीट रहे थे। मुझे ऐसे लोगों से चीढ़ है जो चीजों का गलत इस्तमाल करते हैं। जूते की शोभा पैरों में ही है, कहीं और नहीं। कई बार तो मेरी माला बनाकर मुझे भी गधे नामक जंतु की सैर करा दी जाती है।
कहीं किसी मंच पर कुछ भी गड़बड़ हो, मेरे सहोदरों को ही उठा-उठाकर फेंका जाता है। अभी बीते महिने की बात है, मेरे विदेशी मित्र को किसी ने बुश पर दे मारा। गर्मी, सर्दी, बरसात - न जाने क्या-क्या झेले हैं मैंने। नदी, पर्वत, आकाश - न जाने क्या-क्या नापे हैं मैंने। मुझे नौकरी पर रखनेवाला मेरा मालिक बेचारा खुद पक्की नौकरी की जुगत में रहा। समय के अभाव के बावजूद उसने बराबर मेरा ख्याल रखा, सुबह बड़े चाव से मेरे चेहरे को चमकाता और रात को गहरी थकान के बावजूद मुझे इधर-उधर फेंकने की भूल नहीं करता। सोचा था मालिक को पक्की नौकरी मिलते ही मुझे रिटायरमेंट मिल जाएगी, पर मालिक पर जिम्मेदारी दिनोंदिन बढती गई और मुझे ओवरटाइम तक करना पड़ा।
मजे की बात बताऊँ, मालिक मेरे बिना रह नहीं सकते, कहीं आ-जा नहीं सकते, ट्रेन के सफर में मैं उनसे बिछुड़कर किसी और के पैरों की शोभा न बढ़ाऊँ, इसलिए अपने पास थैले में डालकर सोते हैं। मेरी चिंता में इन्होंने मंदिर जाना तक छोड़ दिया है, अगर जाते भी हैं तो बाहर से खड़े-खड़े ही नमन कर लेते हैं
कभी-कभी सोचता हूँ दुनिया में जितने भी प्रेमी हुए हैं, अक्सर रोमियो-जूलियट, शीरी-फरहाद, लैला-मजनू, चंदा और चकोर की कस्में खाते देखे गए हैं, लेकिन क्या किसी ने हमारी जोड़ियों की कसम खाई है ??
(II)
लोग मेरे मालिक को कहते हैं यार तेरा जूता तो काफी चल गया!! मैं पूछता हूँ ये तारीफ है या ताना !! एक आदमी ने पक्की नौकरी के इंतजार में छ: साल मेरे साथ गुजार दिए जबकि ऐसे भी लोग हैं जो साल-छ:महिने में जूते बदल लेते हैं।
नए जूते खरीदना कोई मुश्किल नहीं है, पर मेरे मालिक को आज की रवायतों का ठीक-ठीक अंदाजा नहीं है, वर्ना वे इस भरोसे या भ्रम में न जीते कि पक्की नौकरी मिलते ही नए जूते ले लूँगा। अलादीन के चिराग और मुझमें कुछ तो फर्क होता है न!!
जिस तरह पलकें आखों पर बोझ नहीं होती, उसी तरह मेरे मालिक ने भी मुझे कभी बोझ नहीं माना, बल्कि हमेशा अपने पथ का साथी माना है,
मेरी जर्जर काया के बावजूद उनका मोह मुझसे नहीं छुटा है। बस एक ही गुजारिश है इनके विभाग के वरिष्ठ प्रोफेसरों से, मुझे अपने मालिक से निजात दिलाने का कुछ जतन करो। पक्की नौकरी देकर इसकी एड़ियों को भी नए जूते का सुख भोगने दो। घिसे हुए जूते को पॉलिश से कब तक छिपाता रहेगा मेरा मालिक !! छ: साल कम नहीं होते हैं..... आदमी घिस जाता है, मैं तो अदद एक जूता हूँ।
Saturday, 10 January 2009
याद आती रही......
सर्दियों में कुहासे की चादर ओढ़े सुबह की धूप जैसे रेशम-सी नरम होती है,
किरणों के रेशे-रेशे में गरमाहट की जैसे एक आहट होती है, वैसे ही इस गॉंव की याद मन में एक कसक के साथ मौजूद रही। जब भी मैं अकेला हुआ, मुझे महसूस होता रहा कि कुछ छूट रहा है........ रह-रहकर आपलोगों की याद आती रही।
ऐसा लग रहा था, जैसे बिन बताए घर से निकल गया हूँ परदेश में, अब घर आते हुए महसूस हो रहा है कि कितने समय से बाहर था। गॉंव कितना बदल गया होगा, कई नये लोग आकर बसे होंगें। कई नए घर बने होंगें। कुछ लोगों ने अपना घर ठीक किया होगा, उसे नई तरह से सजाया होगा, कई तरह से सजाया होगा.... कुछ लोग मेरी तरह घर छोड़कर निकल गए होंगे, कुछ लोग चाहकर भी घर नहीं लौट पाए होंगे,...... पर खतों ने गॉव की याद को भूलने न दिया........ और इस तरह मैं बरबस लौट आया।
बीते साल कई चीजें निपटाकर आया हूँ। इससे पहले कि उमर के इस पड़ाव पर कुछ कर गुजरने की चाहत दम तोड़ने लगे, मनमाफिक मंजिल को पा लेने की तड़प दिल पर बोझ लगने लगे, जीने का हौसला बरकरार रखना चाहता हूँ। नया साल इसी जोश के साथ शुरू कर रहा हूँ।
कुछ देर से ही सही, आप सभी को नए साल की हार्दिक शुभकामनाऍं। आपके घर धमकने ही वाला हूँ कि नए साल पर आपने अपने घर को किस तरह संवारा है
(आप सबकी दुआओं और मशवरों का तहे दिल से शुक्रगुजार हूँ। दिसम्बर 08 के मध्य में दिल्ली स्थित इस्कोर्ट हर्ट हॉस्पीटल में मेरे पापा की इंजियोप्लास्टी हुई थी और अब वे बिल्कुल ठीक हैं।)
किरणों के रेशे-रेशे में गरमाहट की जैसे एक आहट होती है, वैसे ही इस गॉंव की याद मन में एक कसक के साथ मौजूद रही। जब भी मैं अकेला हुआ, मुझे महसूस होता रहा कि कुछ छूट रहा है........ रह-रहकर आपलोगों की याद आती रही। ऐसा लग रहा था, जैसे बिन बताए घर से निकल गया हूँ परदेश में, अब घर आते हुए महसूस हो रहा है कि कितने समय से बाहर था। गॉंव कितना बदल गया होगा, कई नये लोग आकर बसे होंगें। कई नए घर बने होंगें। कुछ लोगों ने अपना घर ठीक किया होगा, उसे नई तरह से सजाया होगा, कई तरह से सजाया होगा.... कुछ लोग मेरी तरह घर छोड़कर निकल गए होंगे, कुछ लोग चाहकर भी घर नहीं लौट पाए होंगे,...... पर खतों ने गॉव की याद को भूलने न दिया........ और इस तरह मैं बरबस लौट आया।
बीते साल कई चीजें निपटाकर आया हूँ। इससे पहले कि उमर के इस पड़ाव पर कुछ कर गुजरने की चाहत दम तोड़ने लगे, मनमाफिक मंजिल को पा लेने की तड़प दिल पर बोझ लगने लगे, जीने का हौसला बरकरार रखना चाहता हूँ। नया साल इसी जोश के साथ शुरू कर रहा हूँ।
कुछ देर से ही सही, आप सभी को नए साल की हार्दिक शुभकामनाऍं। आपके घर धमकने ही वाला हूँ कि नए साल पर आपने अपने घर को किस तरह संवारा है
(आप सबकी दुआओं और मशवरों का तहे दिल से शुक्रगुजार हूँ। दिसम्बर 08 के मध्य में दिल्ली स्थित इस्कोर्ट हर्ट हॉस्पीटल में मेरे पापा की इंजियोप्लास्टी हुई थी और अब वे बिल्कुल ठीक हैं।)
Sunday, 16 November 2008
मारे गए संकोच में !!
त्योहारों पर उपहार/मिठाई बॉंटने की परंपरा है, लेकिन मेरे शोध-निर्देशक इस अवसर पर भी उपहार देने के लिए मना करते हैं। पर यदि काफी समय बाद जाओ और मौसम भी त्योहारों का हो तो सर के पास खाली हाथ जाना अजीब लगता है।
तो एक बार त्योहार के अवसर पर मैं मिठाई का एक डिब्बा लेकर सर के घर गया, सर अपने कमरे में काम कर रहे थे और दरवाजा नौकरानी ने खोला। हाथ में मिठाई पकड़ाने पर डॉंट सुनना तय था, इसलिए मैंने यह सोचकर मिठाई का डिब्बा मेज पर रख दिया कि जाने के बाद सर को पता तो चल जाएगा कि यह डिब्बा जितेन दे गया है।
मैं सर के पास कमरे में चला गया। वहीं काफी देर बातें होती रही। तभी डोर-बेल बजी, नौकरानी किचन में व्यस्त थी, इसलिए मैं दरवाजा खोलने चला गया। आगंतुक मेरे सर का कोई करीबी था और उपहार के तीन-चार पैकेट लेकर आया था। उसने वो पैकेट मेरे मिठाई के डिब्बे के बगल में लाकर रख दिया।
>तभी सर भी ड्रॉइंग रूम में आ गए और आगंतुक को स्नेह से डॉंटने लगे कि उपहार क्यों लाए। मेज काफी भरी-भरी सी लगनी लगी, सर ने नौकरानी को आवाज दी कि ये पैकेट किचन में ले जाए।
मैं मन ही मन ये सोचकर दुखी हो रहा था कि इतनी अच्छी मिठाई खरीदकर लाया, मगर वह आगंतुक के नाम पर किचन में रख दी गई।
सर के हाथ में डिब्बा नहीं पकड़ाने का मतलब यह तो नहीं था कि उनको मेरे उपहार का पता भी नहीं चले। मैं चाहता था कि सर आज मुझे डॉंट ही दें कि तुमने डिब्बा लाने की गल्ती तो नहीं की है, पर सर ने न डॉंटा न ही पूछा.... वहाँ से लौटते हुए मैं बड़ा उदास था।
U टर्न :सोचता हूँ त्योहारों पर मिठाई का सिर्फ डिब्बा ले जाऊँ, मिठाई नहीं:)
तो एक बार त्योहार के अवसर पर मैं मिठाई का एक डिब्बा लेकर सर के घर गया, सर अपने कमरे में काम कर रहे थे और दरवाजा नौकरानी ने खोला। हाथ में मिठाई पकड़ाने पर डॉंट सुनना तय था, इसलिए मैंने यह सोचकर मिठाई का डिब्बा मेज पर रख दिया कि जाने के बाद सर को पता तो चल जाएगा कि यह डिब्बा जितेन दे गया है।
मैं सर के पास कमरे में चला गया। वहीं काफी देर बातें होती रही। तभी डोर-बेल बजी, नौकरानी किचन में व्यस्त थी, इसलिए मैं दरवाजा खोलने चला गया। आगंतुक मेरे सर का कोई करीबी था और उपहार के तीन-चार पैकेट लेकर आया था। उसने वो पैकेट मेरे मिठाई के डिब्बे के बगल में लाकर रख दिया।
>तभी सर भी ड्रॉइंग रूम में आ गए और आगंतुक को स्नेह से डॉंटने लगे कि उपहार क्यों लाए। मेज काफी भरी-भरी सी लगनी लगी, सर ने नौकरानी को आवाज दी कि ये पैकेट किचन में ले जाए।
मैं मन ही मन ये सोचकर दुखी हो रहा था कि इतनी अच्छी मिठाई खरीदकर लाया, मगर वह आगंतुक के नाम पर किचन में रख दी गई। सर के हाथ में डिब्बा नहीं पकड़ाने का मतलब यह तो नहीं था कि उनको मेरे उपहार का पता भी नहीं चले। मैं चाहता था कि सर आज मुझे डॉंट ही दें कि तुमने डिब्बा लाने की गल्ती तो नहीं की है, पर सर ने न डॉंटा न ही पूछा.... वहाँ से लौटते हुए मैं बड़ा उदास था।
U टर्न :सोचता हूँ त्योहारों पर मिठाई का सिर्फ डिब्बा ले जाऊँ, मिठाई नहीं:)
Wednesday, 5 November 2008
शुक्र है, उनके हाथ में पिस्तौल नहीं थी!!
सर्दियों की रात थी, मैं करीब आठ बजे अपनी मोटर-साईकिल से शक्तिनगर चौक से गुजर रहा था। मुझे एक जरूरी फोन करना था और मेरे पास मोबाइल नहीं था इसलिए मैं एक टेलीफोन-बूथ के सामने रूका। हैलमेट उतार ही रहा था कि संभ्रांत घरों के कुछ लड़के आसपास से दौड़ते हुए निकले, कुछ लड़के बूथ के सामने ही खड़े होकर परेशान-हैरान-से बातें करने लगे-
‘’भाई, तू घबरा मत, तेरे को कुछ नहीं होगा। राहुल, करण भी तेरे साथ हैं। प्रिया का फोन आया था, वह भी साथ देने के लिए तैयार है, बस तू हौसला रख। रोहन का दिमाग आज ही ठीक कर देंगे, लौटेगा तो इसी रास्ते से ना! चार लड़के साथ क्या कर लिए उस *** ने, शेर बन रहा है !’’
उन लड़कों की बातचीत और हरकतों से लग रहा था जैसे टपोरी और संभ्रांत लड़कों के बीच पहनावे के सिवा और कोई फर्क नहीं है।
मैंने गौर से देखा, जिस लड़के को हौसला बंधाया जा रहा था, उसका चमन उजड़ा-सा लग रहा था, चेहरे पर चोट के भी निशान नजर आ रहे थे, ठंड के बावजूद वे सभी पसीने से तर-बतर थे। उनके बीच बेचैनी और अफरा-तफरी का माहौल साफ नजर आ रहा था।
‘‘जाकर बाइक ले आ, अभी देखकर आता हूँ कि कहॉं गया है *** ‘’
बात-बात में उनके मुँह से गाली ऐसे झर रहा था, जैसे पतझर में पत्ते झरते हैं। इससे पहले कि मैं समझ पाता कि मामला क्या है, उसमें से एक लड़का आव देखा न ताव, सीधे मेरी बाइक की तरफ लपकते हुए बोला-
‘’भाई दो मिनट के लिए मुझे बाइक देना, मैं अभी आया।‘’
मैं बाइक से तबतक उतरा भी नहीं था, मैंने कहा-
‘’मुझे दूर जाना है और मैं पहले ही लेट हो चुका हूँ।‘’
पर उसे मेरी बात सुनाई कहॉ दे रही थी, उसपर तो मानों जुनून सवार था। लफंगों की इस बौखलाई जमात में मुझे यह कहने की हिम्मत नहीं पड़ी कि तेरे बाप की बाइक है जो तूझे दूँ। इससे पहले कि मैं स्टार्ट किक लगाता, उसने बाइक की चाबी निकाल ली।
जब दिल्ली ट्रैफिक पुलिस चालान के लिए बाइक रूकवाती है तो सबसे पहले चाबी कब्जे में लेती है क्योंकि बाइकवाले पतली गली से निकलने में माहिर होते हैं, इस तरह तो मेरी चाबी जब भी जब्त हुई है, चालान देकर ही छुटी है। पर आज चालान का मामला नहीं है।
वह लड़का मेरी चाबी लेकर अपने साथियों के साथ तय करने लगा किस तरफ जाऊँ। मेरी जान सांसत में थी, मैंने कहा- ’’भई आपको जहॉं जाना है मैं वहॉं छोड़ देता हूँ।‘’
उन्हें फिर कुछ सुनाई नहीं पड़ा। वे सुनने के लिए नहीं, सिर्फ बकने के लिए जो इकट्ठा हुए थे। मैंने कहा-
‘’अगर चाबी नहीं दोगे तो मैं तुम लोगों की शिकायत थाने में कर दूँगा।‘’
उनमें से ये बात किसी को सुनाई पड़ गई, वह तपाक से मेरी तरफ आया और गुर्राते हुए बोला-
’’कर फोन किसको करेगा, डी.सी.पी. को, एस.पी. को या एस.आई. को ? ऊपर से नीचे तक सब मेरे रिश्तेदार हैं। जा लगा फोन, बैठा क्या है! ओय इसकी बाइक की चाबी मुझे दे जरा!’’
एक आम आदमी, जिसकी कोई ऊँची जान-पहचान नहीं है, यह सुनकर जैसे सकते में आ जाता है, वैसे मैं भी आ गया। उसने चाबी लेकर अपने जेब में डाल ली, मैं बाइक पर असहाय-सा बैठा यह सोचता रहा कि किसी का गुस्सा किसी पर लोग कैसे उतारते हैं। उन नवाबजादों को आपस में बात करते हुए ख्याल भी नहीं था कि अपनी लड़ाई में उन्होंने मुझे किस तरह, बेवजह शामिल कर लिया है।
मैं रह-रहकर उन्हें टोकता रहा कि भई मुझे दूर जाना है, चाबी दे दो। मन ही मन खुद को कोसता भी रहा कि क्यों फोन करने के लिए यहॉं रूका! पर मुसीबत दस्तक देकर नहीं आती, वह न जगह देखती है न समय!
इस बीच मैं यही सोचता रहा कि अमीरजादों की ये नस्लें महानगरीय अपसंस्कृति की ऊपज है, जिनके बाप ने इतना काला धन जोड़ रखा है कि उन्हें अपने कपूतों के लिए भी कुछ करने की जरूरत नहीं है।
पर कुछ-न-कुछ तो करना जरूरी होता है इसलिए ये मारा-मारी, लड़कीबाजी में ही दिन खपातें हैं और इस झगड़े की जड़ में भी शायद वही बात थी। ऐसे अमीरजादों को चोरी-डकैती में जो थ्रील मिलता है, वह पढ़ाई में कहॉं मिल सकता है! तो सब तरह के दुराचार में ये भी लिप्त होते हैं। ऐसे बच्चों के बाप इनपर ये सोचकर अंकुश नही लगाते कि उन्होंने अपनी जवानी में यही गुल तो खिलाए थे!
अचानक वे लड़के आगे चल पड़े। मैंने उन्हें याद दिलाया कि चाबी उनके पास रह गई है। करीब आधे घंटे की इस तनावपूर्ण मन:स्थिति के बाद चाबी लेकर मैं वहॉ से निकल पड़ा। मैं यही सोचता जा रहा था कि उनके हाथ में पिस्तौल नहीं थी, वर्ना ऐसे मामलों में बेगुनाहों की खैर नहीं होती!
इस तरह की घटना 21वीं सदी के महानगर की एक नई पीढ़ी की दिशाहीनता को दर्शाता है। यह भी तय है कि आने वाले समय में यह घटना महानगरों के लिए एक आम शक्ल अख्तियार कर लेगी। हम ऐसे समाज में ही जीने के लिए अभिशप्त हैं और इसके समाधान की संभावनाओं का गुम होना दुखद है।
‘’भाई, तू घबरा मत, तेरे को कुछ नहीं होगा। राहुल, करण भी तेरे साथ हैं। प्रिया का फोन आया था, वह भी साथ देने के लिए तैयार है, बस तू हौसला रख। रोहन का दिमाग आज ही ठीक कर देंगे, लौटेगा तो इसी रास्ते से ना! चार लड़के साथ क्या कर लिए उस *** ने, शेर बन रहा है !’’
उन लड़कों की बातचीत और हरकतों से लग रहा था जैसे टपोरी और संभ्रांत लड़कों के बीच पहनावे के सिवा और कोई फर्क नहीं है।
मैंने गौर से देखा, जिस लड़के को हौसला बंधाया जा रहा था, उसका चमन उजड़ा-सा लग रहा था, चेहरे पर चोट के भी निशान नजर आ रहे थे, ठंड के बावजूद वे सभी पसीने से तर-बतर थे। उनके बीच बेचैनी और अफरा-तफरी का माहौल साफ नजर आ रहा था।‘‘जाकर बाइक ले आ, अभी देखकर आता हूँ कि कहॉं गया है *** ‘’
बात-बात में उनके मुँह से गाली ऐसे झर रहा था, जैसे पतझर में पत्ते झरते हैं। इससे पहले कि मैं समझ पाता कि मामला क्या है, उसमें से एक लड़का आव देखा न ताव, सीधे मेरी बाइक की तरफ लपकते हुए बोला-
‘’भाई दो मिनट के लिए मुझे बाइक देना, मैं अभी आया।‘’
मैं बाइक से तबतक उतरा भी नहीं था, मैंने कहा-
‘’मुझे दूर जाना है और मैं पहले ही लेट हो चुका हूँ।‘’
पर उसे मेरी बात सुनाई कहॉ दे रही थी, उसपर तो मानों जुनून सवार था। लफंगों की इस बौखलाई जमात में मुझे यह कहने की हिम्मत नहीं पड़ी कि तेरे बाप की बाइक है जो तूझे दूँ। इससे पहले कि मैं स्टार्ट किक लगाता, उसने बाइक की चाबी निकाल ली।
जब दिल्ली ट्रैफिक पुलिस चालान के लिए बाइक रूकवाती है तो सबसे पहले चाबी कब्जे में लेती है क्योंकि बाइकवाले पतली गली से निकलने में माहिर होते हैं, इस तरह तो मेरी चाबी जब भी जब्त हुई है, चालान देकर ही छुटी है। पर आज चालान का मामला नहीं है।
वह लड़का मेरी चाबी लेकर अपने साथियों के साथ तय करने लगा किस तरफ जाऊँ। मेरी जान सांसत में थी, मैंने कहा- ’’भई आपको जहॉं जाना है मैं वहॉं छोड़ देता हूँ।‘’
उन्हें फिर कुछ सुनाई नहीं पड़ा। वे सुनने के लिए नहीं, सिर्फ बकने के लिए जो इकट्ठा हुए थे। मैंने कहा-
‘’अगर चाबी नहीं दोगे तो मैं तुम लोगों की शिकायत थाने में कर दूँगा।‘’
उनमें से ये बात किसी को सुनाई पड़ गई, वह तपाक से मेरी तरफ आया और गुर्राते हुए बोला-
’’कर फोन किसको करेगा, डी.सी.पी. को, एस.पी. को या एस.आई. को ? ऊपर से नीचे तक सब मेरे रिश्तेदार हैं। जा लगा फोन, बैठा क्या है! ओय इसकी बाइक की चाबी मुझे दे जरा!’’
एक आम आदमी, जिसकी कोई ऊँची जान-पहचान नहीं है, यह सुनकर जैसे सकते में आ जाता है, वैसे मैं भी आ गया। उसने चाबी लेकर अपने जेब में डाल ली, मैं बाइक पर असहाय-सा बैठा यह सोचता रहा कि किसी का गुस्सा किसी पर लोग कैसे उतारते हैं। उन नवाबजादों को आपस में बात करते हुए ख्याल भी नहीं था कि अपनी लड़ाई में उन्होंने मुझे किस तरह, बेवजह शामिल कर लिया है।
मैं रह-रहकर उन्हें टोकता रहा कि भई मुझे दूर जाना है, चाबी दे दो। मन ही मन खुद को कोसता भी रहा कि क्यों फोन करने के लिए यहॉं रूका! पर मुसीबत दस्तक देकर नहीं आती, वह न जगह देखती है न समय!
इस बीच मैं यही सोचता रहा कि अमीरजादों की ये नस्लें महानगरीय अपसंस्कृति की ऊपज है, जिनके बाप ने इतना काला धन जोड़ रखा है कि उन्हें अपने कपूतों के लिए भी कुछ करने की जरूरत नहीं है।
पर कुछ-न-कुछ तो करना जरूरी होता है इसलिए ये मारा-मारी, लड़कीबाजी में ही दिन खपातें हैं और इस झगड़े की जड़ में भी शायद वही बात थी। ऐसे अमीरजादों को चोरी-डकैती में जो थ्रील मिलता है, वह पढ़ाई में कहॉं मिल सकता है! तो सब तरह के दुराचार में ये भी लिप्त होते हैं। ऐसे बच्चों के बाप इनपर ये सोचकर अंकुश नही लगाते कि उन्होंने अपनी जवानी में यही गुल तो खिलाए थे!अचानक वे लड़के आगे चल पड़े। मैंने उन्हें याद दिलाया कि चाबी उनके पास रह गई है। करीब आधे घंटे की इस तनावपूर्ण मन:स्थिति के बाद चाबी लेकर मैं वहॉ से निकल पड़ा। मैं यही सोचता जा रहा था कि उनके हाथ में पिस्तौल नहीं थी, वर्ना ऐसे मामलों में बेगुनाहों की खैर नहीं होती!
इस तरह की घटना 21वीं सदी के महानगर की एक नई पीढ़ी की दिशाहीनता को दर्शाता है। यह भी तय है कि आने वाले समय में यह घटना महानगरों के लिए एक आम शक्ल अख्तियार कर लेगी। हम ऐसे समाज में ही जीने के लिए अभिशप्त हैं और इसके समाधान की संभावनाओं का गुम होना दुखद है।
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