
कबूतर के जिस बच्चे को मैं पिछले तीन दिनों से सुबह-सुबह देखा करता था वह एक बिल्ली के जबड़े में दबी पड़ी थी। जालीवाली खिड़की के उस पार से बिल्ली मुझे नहीं देख सकती थी। कबूतर के बच्चे को मुँह में दबाए वह मुझसे दो फुट की दूरी पर खड़ी होकर उतरने का रास्ता ढूँढ रही थी। मैं हैरान हुआ कि यह बिल्ली पहली मंजिल के इस चबूतरे तक आई कैसे??
मैंने देखा कबूतर का वह नवजात बच्चा निष्क्रिय और अचेत- सा बिल्ली के जबड़े में झूल रहा है। न जाने मुझे ऐसा क्यों लगा कि जाली के उस पार से उसकी खुली ऑंखे मुझे बेबस निगाहों से देख रही है। वह ऐसा पल था जैसे काटो तो खून नहीं।
ऐसा लगा जैसे आदमी के नवजात शिशु को कुत्ते के जबड़े में दबा हुआ मैंने देख लिया हो, बिल्कुल पास से....। कुछ पल तक उसका देखना ही मेरे लिए गहरा सदमा दे गया।
उसकी इस हालत का मैं जिम्मेदार था। इसके लिए ईश्वर जो सजा तय करेगा उसे सहन कर पाने की ताकत मुझमें नहीं। मैं खिड़की खोलकर बिल्ली की तरफ झपटा, बिल्ली नीचे खड़ी सफारी कार पर कूदकर भाग गई और ले गई उस नवजात बच्चे को......
मैंने दूसरे फ्लैट के चबूतरे पर कबूतरों के जोड़ों को इस तरफ देखते देखा..........मैं उनका गुनाहगार था। अनजाने में मुझसे बहुत बड़ी गल्ती हो गई थी।

दो दिन पहले ए.सी. साफ करते हुए उनके तिनके के घोंसले को मैंने सावधानी से उतारकर चबूतरे के कोने में रख दिया था। दरअसल उनके तिनके ए.सी. के पंखे में फँसकर आवाज करने लगे थे। पहले दिन तो वह नवजात बच्चा सहम-सा कोने में दुबका रहा। अगली सुबह वह चबूतरे पर नन्हें कदमों से चहलकदमी करता नजर आया। अभी उसके पंख नहीं आए थे।
जाली के इस पार खड़ा मैं उसे देखकर भावविभोर हुआ जा रहा था। मैंने अपने ढाई साल के बेटे को यह दृश्य कल ही दिखाया था। शाम को अपनी तोतली बोली में वह मुझे कहता रहा- पापा, पीजन का बच्चा देखना है।
अब मेरे बेटे की नींद खुल गई है। वह उठते ही खिड़की की तरफ गया है और पास खड़ी कुर्सी को उसके पास घसीटकर ला रहा है। थोड़ी देर तक वह कबूतर के बच्चे को चबूतरे पर तलाशता है। उसे जब कुछ नजर नहीं आता तो मुझे आकर कहता है-
पापा, पीजन का बेबी कहॉं गया?
वह अब जीद करने लगा है कि उसे पीजन का बेबी देखना है।
मैं उसे समझाता हूँ कि वह अपने मम्मी-पापा के साथ आकाश में घुम्मी-घुम्मी करने गया है। एक-दो दिन में वापस आ जाएगा।
मेरा मन पूछता है- क्या सचमुच !!
[ ईश्वर इस कृत्य के लिए मुझे माफ करे:(
मैं प्रण लेता हूँ कि पशु-पक्षियों को अहित पहुँचाने वाले कार्यों से दूर रहूँगा। हम मनुष्यों ने खेत-जंगल उजाड़कर कंक्रीट का जाल बिछाया है, उसी का नतीजा है कि ये बेचारे पशु-पक्षी मनुष्यों के चबूतरों पर एक सुरक्षित कोने की तलाश कर रहे हैँ, और वह भी इन्हें नसीब नहीं..... ]





