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Thursday, 4 December 2008

पापा!

पि‍छले दस दि‍नों में मैंने जिंदगी का एक नया चेहरा देखा। काफी समय से सोच रहा था कि‍ मैं अपने पि‍ता के बारे में कुछ लि‍खूँ, मगर मालूम नहीं था कि‍ ये अवसर इस रूप में सामने आएगा।

मैं उन बदनसीब बेटों में से एक हूँ जि‍न्‍हें अपने पि‍ता के साथ रहने का अवसर कम-से-कम मि‍ला, जि‍सने 31 साल की उम्र में से 21 साल हॉस्‍टल में बि‍ताए, छुटपन के 10 साल इस तरह बीते कि‍ वे मेरे जगने से पहले ड्यूटी पर चले जाते और रात में अक्‍सर मेरे सोने के बाद आते। हॉस्‍टल में आकर मि‍लने के लि‍ए भी उनके पास वक्‍त नहीं था, आज वे रि‍टायर हो गए हैं और अब मेरे पास वक्‍त नहीं है कि‍ मैं 1000 कि‍.मी का सफर तयकर उनसे मि‍लने जाऊँ।
अपनी व्‍यस्‍तताओं के बीच यह अहसास ही काफी लग रहा था कि‍ वे जहॉं हैं ठीक हैं, यह भूलकर कि‍ जि‍स घर में बचपन के कुछ पल गुजारे हैं, जि‍स घर के दरों-दीवार पर मेरे पि‍ता के सपने आज भी जिंदा हैं, जहॉं अपने नाती-पोतों की कि‍लकारी सुनने के लि‍ए उनके कान तड़प रहे हैं, आज उसी मकान में कैद वे अपनी ठंडी आहें सुनने के लि‍ए वि‍वश हैं। बुढापा बेबस कर देता है या वक्‍त, ठीक से उन्‍हें भी पता नहीं।
मेरे दोनों छोटे भाई अवि‍वाहि‍त हैं और माता-पि‍ता के साथ रहते हुए अपने काम-धंधे में अच्‍छे रमे हुए हैं। संजय (मझले भाई) का फोन आया कि‍ पापा को हार्ट-अटैक आया है और कुछ भी हो सकता है। मेरे होश उड़ गए। अबतक इस कहावत ने मुझे रोने नहीं दि‍या है कि‍ मर्द को रोना शोभा नहीं देता है, पर सच कहूँ, मैं इसपर कायम न रह सका।

मैं अकेला जाना चाहता था, मगर पत्‍नी ने साथ चलने की जि‍द की। ट्रेन के सफर के दौरान एक अनजाना-सा डर मन में घुसपैठ कर रहा था, अगली सुबह हॉस्‍पि‍टल में यह देखकर चैन की सॉंस ली कि‍ वे गहरी नींद में लेटे हुए हैं और इ.सी.जी के मोनि‍टर पर सबकुछ नॉर्मल दि‍ख रहा है।


उनके सोने तक वि‍जय (छोटा भाई) से बात होती रही। उसने उदास स्‍वर में बताया कि‍ पापा को शायद कुछ अंदेशा था कि‍ ऐसा कुछ हो सकता है इसलि‍ए उन्‍होंने एक दि‍न कहा कि‍ अगर मुझे कुछ हो जाए तो इस-इस कंपनी में बीमा करवाया है, ध्‍यान रखना। यह कहते हुए वि‍जय की ऑंखों में ऑसू छलक आए। कहने लगा- पापा अगर कोई काम न करें और केवल हमारे काम को देखते रहें तो इतने भर से हमें काफी हौंसला मि‍लता है, और हमारे काम में हाथ बँटाते हुए उन्‍हें कुछ हो गया तो ऐसे काम से क्‍या लाभ!
पापा को पीठ दर्द की शि‍कायत थी, मैंने डॉक्‍टर से पूछा कि‍ अटैक से पीठ दर्द का क्‍या ताल्‍लुक है। उसने बताया कि‍ उन्‍हें ठंड लग गई है और यह संयोग ही है कि‍ दोनों चीजें साथ-साथ घटि‍त हुई। पापा की पीठ दबाते हुए महसूस हुआ कि‍ इनकी हड्डि‍यों पर उम्र हावी होने लगी है, त्‍वचा शि‍थि‍ल पड़ने लगी है, नाती-पोतों को खि‍लाते हुए जरा-सी असावधानी बरती तो हड्डि‍यॉं चटक भी सकती हैं।

यह सब देखते-सोचते हुए मन अवसाद से भरा जा रहा था, पि‍ता के साथ बि‍ताए हुए दि‍न क्‍या अवसान के नि‍कट है! समय का रेत क्‍या मुट्ठी से यूँ ही नि‍कल जाएगा और पि‍ता का फर्ज नि‍भाने के क्रम में मैं भी अपने बेटे से इतनी ही दूरी पर खड़ा मि‍लूँगा। आज ही लौटा हूँ, इस उदासी में न जाने कैसे-कैसे वि‍चार मन में आ रहे हैं......
(पापा का पीठ दर्द ठीक हो रहा है और हार्ट के लि‍ए डॉक्‍टर ने कुछ दि‍न बाद एंजि‍योग्राफी कराने का नि‍र्देश दि‍या है।)

(शेष अगली पोस्‍ट में)

Sunday, 16 November 2008

मारे गए संकोच में !!

त्‍योहारों पर उपहार/मि‍ठाई बॉंटने की परंपरा है, लेकि‍न मेरे शोध-नि‍र्देशक इस अवसर पर भी उपहार देने के लि‍ए मना करते हैं। पर यदि‍ काफी समय बाद जाओ और मौसम भी त्‍योहारों का हो तो सर के पास खाली हाथ जाना अजीब लगता है।
तो एक बार त्‍योहार के अवसर पर मैं मि‍ठाई का एक डि‍ब्‍बा लेकर सर के घर गया, सर अपने कमरे में काम कर रहे थे और दरवाजा नौकरानी ने खोला। हाथ में मि‍ठाई पकड़ाने पर डॉंट सुनना तय था, इसलि‍ए मैंने यह सोचकर मि‍ठाई का डि‍ब्‍बा मेज पर रख दि‍या कि‍ जाने के बाद सर को पता तो चल जाएगा कि‍ यह डि‍ब्‍बा जि‍तेन दे गया है।
मैं सर के पास कमरे में चला गया। वहीं काफी देर बातें होती रही। तभी डोर-बेल बजी, नौकरानी कि‍चन में व्‍यस्‍त थी, इसलि‍ए मैं दरवाजा खोलने चला गया। आगंतुक मेरे सर का कोई करीबी था और उपहार के तीन-चार पैकेट लेकर आया था। उसने वो पैकेट मेरे मि‍ठाई के डि‍ब्‍बे के बगल में लाकर रख दि‍या।
>तभी सर भी ड्रॉइंग रूम में आ गए और आगंतुक को स्‍नेह से डॉंटने लगे कि‍ उपहार क्‍यों लाए। मेज काफी भरी-भरी सी लगनी लगी, सर ने नौकरानी को आवाज दी कि‍ ये पैकेट कि‍चन में ले जाए। मैं मन ही मन ये सोचकर दुखी हो रहा था कि‍ इतनी अच्‍छी मि‍ठाई खरीदकर लाया, मगर वह आगंतुक के नाम पर कि‍चन में रख दी गई।
सर के हाथ में डि‍ब्‍बा नहीं पकड़ाने का मतलब यह तो नहीं था कि‍ उनको मेरे उपहार का पता भी नहीं चले। मैं चाहता था कि‍ सर आज मुझे डॉंट ही दें कि‍ तुमने डि‍ब्‍बा लाने की गल्‍ती तो नहीं की है, पर सर ने न डॉंटा न ही पूछा.... वहाँ से लौटते हुए मैं बड़ा उदास था। 


U टर्न  :सोचता हूँ त्‍योहारों पर मि‍ठाई का सि‍र्फ डि‍ब्‍बा ले जाऊँ, मि‍ठाई नहीं:)

Monday, 10 November 2008

प्‍ले-स्‍कूल का प्‍ले !!

हम अपने बच्‍चे को बड़ी आस से प्‍ले-स्‍कूल भेजते हैं कि‍ वहाँ वे शहरी परि‍वेश और तरह-तरह की गति‍वि‍धि‍यों से परि‍चि‍त होंगें। हमारे मन में ये भावना होती है कि‍ घर के भीतर घरेलू चर्चा-कुचर्चा से बच्‍चों पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। लेकि‍न क्‍या प्‍ले-स्‍कूल का माहौल दोस्‍ताना होता है, जैसा कि‍ वहॉं की लैडी-प्रिंसीपल जि‍स लल्‍लो-चप्‍पो अंदाज में बात करती है-यहॉं यह आपका बच्‍चा नहीं, मेरा है और मैं इसकी देखभाल कि‍सी माँ से कम नहीं करूँगी।
(MY SON)

देखता हूँ, वहॉं खि‍लौनों से भरा एक कमरा है, साथ ही एक कम्‍प्यूटर रूम भी। मैं सोचता हूँ चलो, मेरा बच्‍चा एक साथ इतने खि‍लौनों से खेल लेगा, और कम्‍प्‍यूटर पर भी खटर-पटर कर लेगा। ट्रायल बेसि‍स पर अपने बच्‍चे को मेड (कामवाली) के साथ छोड़ देता हूँ। वैसे तो नामी-गि‍रामी प्‍ले स्‍कूल में बच्‍चे के साथ ‘मेड’ को नहीं भेजा जाता है, मगर बच्‍चा यदि‍ ज्‍यादा छोटा हो, यानी दो साल से छोटा, तो ट्रायल बेसि‍स पर दो-चार हफ्ते मेड को भी साथ भेजने की छूट मि‍ल जाती है। हफ्ते-भर बाद मेड की बातों से जो हमने नि‍ष्‍कर्ष नि‍काला, वह बेहद नि‍राशाजनक था-
उस प्‍ले स्‍कूल की अपनी सि‍र्फ दो नौकरानि‍यॉं थी, जि‍नका काम था- झाड़ू-पोछे के साथ-साथ बच्‍चों की पोटी-सूसू साफ करना, बच्‍चों को खाना देना व खि‍लाना। तो वे सूसू पोटी करने पर बच्‍चों को पीटा करती थीं, कि‍ मॉंएं अपने घर से ये भी कराकर नहीं भेजती।
एक हफ्ते बाद भी खि‍लौने अपनी जगह पर ही डटे हुए थे, यानी कि‍सी बच्‍चे को उससे खेलने नहीं दि‍या जाता था। बच्‍चे को ब्रेड पकौड़े और ऐसा ही अन्‍य तेलीय भोजन कराया जाता था। हफ्ते में एक-दो बार तो लंच के नाम पर सि‍र्फ आधा केला खि‍लाकर खानापूर्ति कर देते थे। सबसे बुरी बात थी कि‍ 5-7 बच्‍चों को एक ही ग्‍लास से जूठा पानी ही पि‍ला देती थी। यहॉं हाईजीन का कोई ध्‍यान नहीं रखा जाता था। कि‍सी बच्‍चे को खॉसी, कि‍सी को जुकाम, कि‍सी को कुछ और बीमारी होती थी, मगर उन्‍हें साथ ही रखा जाता था। कोई बच्‍चा रोता था तो बाकी बच्‍चे भी उसी सुर में चालू हो जाते थे, तब नौकरानि‍यॉं परेशान होकर पीटने लगती थीं। वहॉं की टीचर और नौकरानि‍यॉ अक्‍सर मेरी मेड को कहती थी कि‍ जरा दूसरे बच्‍चों को भी देख ले, सूसू करा ले। जो लड़कि‍यॉं ग्रेजुएट हैं या शायद सि‍र्फ 12वीं पास, मगर अंग्रेजी में फर्राटेदार, उन्‍हें पढ़ाने(?) के लि‍ए रखा जाता है। हर बच्‍चे से 1500 से 5000 रूपये मासि‍क ऐंठनेवाले ये स्‍कूल 20-25 बच्‍चों के लि‍ए 5 नौकरानी भी नहीं रख सकते तो समझ सकते हैं कि‍ इन्‍हें बच्‍चों के भवि‍ष्‍य की नहीं, अपने भवि‍ष्‍य की अधि‍क चिंता है।
तो मि‍ला-जुलाकर सारी चीजें बाजार में एक डि‍सप्‍ले की तरह आकर्षक रखी जाती है, जि‍से देखकर बुढ़ापे में आप सि‍र्फ इतना संतोष कर सकते हैं कि‍ आपने अपने बच्‍चों को पढ़ाने में कोई कसर नहीं रखी (चाहे स्‍कूल में ही सारी कसर रह गई हो)।

शहरों में प्‍ले-स्‍कूल का चलन बढ़ रहा है, मॉं-बाप इसे फैशन के तौर पर अपना रहें हैं। बच्‍चे को इससे सीधे तौर पर क्‍या लाभ मि‍लता है, मैं साफ-साफ तो नहीं जानता। एक अनुशासन के तहत मि‍लनसार बनाने की मानसि‍कता ने माता-पि‍ता को इन्‍हें उस उम्र में स्‍कूल में डालने के लि‍ए प्रेरि‍त/मजबूर कि‍या है, जि‍स उम्र में वे खुद माटी की सोंधी महक में प्रकृति‍ का आनंद ले रहे थे और अनायास ही सहज जीवन जीने की खुशी और आजादी महसूस कर रहे थे। अफसोस कि‍ भौति‍क दौड़ में आगे रखने की होड़ में हमने अपने बच्‍चों से ये आजादी छीन ली है।

Wednesday, 5 November 2008

शुक्र है, उनके हाथ में पि‍स्‍तौल नहीं थी!!

सर्दि‍यों की रात थी, मैं करीब आठ बजे अपनी मोटर-साईकि‍ल से शक्‍ति‍नगर चौक से गुजर रहा था। मुझे एक जरूरी फोन करना था और मेरे पास मोबाइल नहीं था इसलि‍ए मैं एक टेलीफोन-बूथ के सामने रूका। हैलमेट उतार ही रहा था कि‍ संभ्रांत घरों के कुछ लड़के आसपास से दौड़ते हुए नि‍कले, कुछ लड़के बूथ के सामने ही खड़े होकर परेशान-हैरान-से बातें करने लगे-

‘’भाई, तू घबरा मत, तेरे को कुछ नहीं होगा। राहुल, करण भी तेरे साथ हैं। प्रि‍या का फोन आया था, वह भी साथ देने के लि‍ए तैयार है, बस तू हौसला रख। रोहन का दि‍माग आज ही ठीक कर देंगे, लौटेगा तो इसी रास्‍ते से ना! चार लड़के साथ क्‍या कर लि‍ए उस *** ने, शेर बन रहा है !’’
उन लड़कों की बातचीत और हरकतों से लग रहा था जैसे टपोरी और संभ्रांत लड़कों के बीच पहनावे के सि‍वा और कोई फर्क नहीं है। मैंने गौर से देखा, जि‍स लड़के को हौसला बंधाया जा रहा था, उसका चमन उजड़ा-सा लग रहा था, चेहरे पर चोट के भी नि‍शान नजर आ रहे थे, ठंड के बावजूद वे सभी पसीने से तर-बतर थे। उनके बीच बेचैनी और अफरा-तफरी का माहौल साफ नजर आ रहा था।
‘‘जाकर बाइक ले आ, अभी देखकर आता हूँ कि‍ कहॉं गया है *** ‘’
बात-बात में उनके मुँह से गाली ऐसे झर रहा था, जैसे पतझर में पत्‍ते झरते हैं। इससे पहले कि‍ मैं समझ पाता कि‍ मामला क्‍या है, उसमें से एक लड़का आव देखा न ताव, सीधे मेरी बाइक की तरफ लपकते हुए बोला-

‘’भाई दो मि‍नट के लि‍ए मुझे बाइक देना, मैं अभी आया।‘’
मैं बाइक से तबतक उतरा भी नहीं था, मैंने कहा-

‘’मुझे दूर जाना है और मैं पहले ही लेट हो चुका हूँ।‘’
पर उसे मेरी बात सुनाई कहॉ दे रही थी, उसपर तो मानों जुनून सवार था। लफंगों की इस बौखलाई जमात में मुझे यह कहने की हि‍म्‍मत नहीं पड़ी कि‍ तेरे बाप की बाइक है जो तूझे दूँ। इससे पहले कि‍ मैं स्‍टार्ट कि‍क लगाता, उसने बाइक की चाबी नि‍काल ली।
जब दि‍ल्‍ली ट्रैफि‍क पुलि‍स चालान के लि‍ए बाइक रूकवाती है तो सबसे पहले चाबी कब्‍जे में लेती है क्‍योंकि‍ बाइकवाले पतली गली से नि‍कलने में माहि‍र होते हैं, इस तरह तो मेरी चाबी जब भी जब्‍त हुई है, चालान देकर ही छुटी है। पर आज चालान का मामला नहीं है।

वह लड़का मेरी चाबी लेकर अपने साथि‍यों के साथ तय करने लगा कि‍स तरफ जाऊँ। मेरी जान सांसत में थी, मैंने कहा- ’’भई आपको जहॉं जाना है मैं वहॉं छोड़ देता हूँ।‘’
उन्‍हें फि‍र कुछ सुनाई नहीं पड़ा। वे सुनने के लि‍ए नहीं, सि‍र्फ बकने के लि‍ए जो इकट्ठा हुए थे। मैंने कहा-
‘’अगर चाबी नहीं दोगे तो मैं तुम लोगों की शि‍कायत थाने में कर दूँगा।‘’
उनमें से ये बात कि‍सी को सुनाई पड़ गई, वह तपाक से मेरी तरफ आया और गुर्राते हुए बोला-
’’कर फोन कि‍सको करेगा, डी.सी.पी. को, एस.पी. को या एस.आई. को ? ऊपर से नीचे तक सब मेरे रि‍श्‍तेदार हैं। जा लगा फोन, बैठा क्‍या है! ओय इसकी बाइक की चाबी मुझे दे जरा!’’

एक आम आदमी, जि‍सकी कोई ऊँची जान-पहचान नहीं है, यह सुनकर जैसे सकते में आ जाता है, वैसे मैं भी आ गया। उसने चाबी लेकर अपने जेब में डाल ली, मैं बाइक पर असहाय-सा बैठा यह सोचता रहा कि‍ कि‍सी का गुस्‍सा कि‍सी पर लोग कैसे उतारते हैं। उन नवाबजादों को आपस में बात करते हुए ख्‍याल भी नहीं था कि‍ अपनी लड़ाई में उन्‍होंने मुझे कि‍स तरह, बेवजह शामि‍ल कर लि‍या है।

मैं रह-रहकर उन्‍हें टोकता रहा कि‍ भई मुझे दूर जाना है, चाबी दे दो। मन ही मन खुद को कोसता भी रहा कि‍ क्‍यों फोन करने के लि‍ए यहॉं रूका! पर मुसीबत दस्‍तक देकर नहीं आती, वह न जगह देखती है न समय!

इस बीच मैं यही सोचता रहा कि‍ अमीरजादों की ये नस्‍लें महानगरीय अपसंस्‍कृति‍ की ऊपज है, जि‍नके बाप ने इतना काला धन जोड़ रखा है कि‍ उन्‍हें अपने कपूतों के लि‍ए भी कुछ करने की जरूरत नहीं है। पर कुछ-न-कुछ तो करना जरूरी होता है इसलि‍ए ये मारा-मारी, लड़कीबाजी में ही दि‍न खपातें हैं और इस झगड़े की जड़ में भी शायद वही बात थी। ऐसे अमीरजादों को‍ चोरी-डकैती में जो थ्रील मि‍लता है, वह पढ़ाई में कहॉं मि‍ल सकता है! तो सब तरह के दुराचार में ये भी लि‍प्‍त होते हैं। ऐसे बच्‍चों के बाप इनपर ये सोचकर अंकुश नही लगाते कि‍ उन्‍होंने अपनी जवानी में यही गुल तो खि‍लाए थे!
अचानक वे लड़के आगे चल पड़े। मैंने उन्‍हें याद दि‍लाया कि‍ चाबी उनके पास रह गई है। करीब आधे घंटे की इस तनावपूर्ण मन:स्‍थि‍ति‍ के बाद चाबी लेकर मैं वहॉ से नि‍कल पड़ा। मैं यही सोचता जा रहा था कि‍ उनके हाथ में पि‍स्‍तौल नहीं थी, वर्ना ऐसे मामलों में बेगुनाहों की खैर नहीं होती!

इस तरह की घटना 21वीं सदी के महानगर की एक नई पीढ़ी की दि‍शाहीनता को दर्शाता है। यह भी तय है कि‍ आने वाले समय में यह घटना महानगरों के लि‍ए एक आम शक्‍ल अख्‍ति‍यार कर लेगी। हम ऐसे समाज में ही जीने के लि‍ए अभि‍शप्‍त हैं और इसके समाधान की संभावनाओं का गुम होना दुखद है।

Friday, 31 October 2008

आदर्श की स्‍थापना का ठेका

कभी अपने बचपन की डायरी पढ़ता हूँ और तब की कुछ कवि‍ताऍं सामने आ जाती हैं तो ये सोचकर अजीब लगता है कि‍ तब मन में क्‍या-क्‍या चला करता था। कवि‍ता को मैं सपनों की सेज पर लेटी हुई दास्‍तॉं मानता था, संभावनाओं के आकाश में उछाला हुआ पत्‍थर मानता था और सबसे ज्‍यादा ये मानता था कि‍ राहगीरों के लि‍ए मील का पत्‍थर है।

इसी धोखे में मैं आदर्श की ऐसी कल्‍पनाऍ करता था, जि‍से आज मैं सि‍र्फ थोथी कल्‍पना ही कह सकता हूँ और पढ़ते हुए जि‍से हँसी आती है। मैंने ऐसी कल्‍पना क्‍यों की, क्‍या मुझे मेरे शि‍क्षकों ने आदर्श की स्‍थापना का ठेका दे रखा था। आश्‍चर्य है कि‍ उन्‍होंने मुझे सि‍र्फ अच्‍छी बातें सि‍खाई, मैंने उनकी बातों को कुछ ज्‍यादा ही तवज्‍जो दी, जबकि‍ दुनि‍या इससे कहीं अलग थी, बल्‍कि‍ उल्टी थी।

ऐसा क्‍यों लगता था कि‍ संसार में अच्‍छाइयॉं मौजूद हैं बस उसे याद दि‍लाने की जरूरत है, लोग भटक गए हैं, उन्‍हें रास्‍ता दि‍खाने की जरूरत है। इति‍हास पढ़ानेवाले मेरे सर मुझे छठी क्‍लास में खलीफा कहकर मेरा मजाक उड़ाते थे। अब लगता है कि‍ खलीफई का ख्‍याल सचमुच बेवकूफाना था, जि‍से मैं कवि‍ता में उतारा करता था, सोचता था कि‍ 1857 की स्‍थि‍ति‍ पैदा हो तो मैं भी क्रांति‍ कर डालूँगा। लेकि‍न खाड़ी युद्ध(1990-91) के दौरान तेल की कमी को लेकर स्‍कूल में पोस्‍टर बनाते हुए मुझे महसूस कराया गया कि‍ युद्ध का आधार तेजी से बदलने लगा है। (तब चन्‍द्रशेखर प्रधानमंत्री थे, उनकी दाढी की तस्‍वीर पर सफेद पोस्‍टल कलर लगाते हुए मैंने ऊपर से एक ति‍नका चि‍पका दि‍या था)।

आज कबाड़ से एक कवि‍ता सामने आ गई, मैंने पाया कि‍ असंभावि‍त पर बात करना एक बकवास से ज्‍यादा कुछ नहीं है। ऐसी दुनि‍या की कल्‍पना करना बकवास ही लगती है कि‍ जहॉ मतभेद और दंगे-फसाद से दूर रहकर लोग आपस में सुख-शांति‍ से रहते हों और समता का सम्‍मान हो। बचपन में लि‍खी ये कवि‍ता आज मुझे यूँ ही बता जाती है कि‍ खुशफहमी में जीना लड़ते हुए हार जाने से ज्‍यादा खतरनाक है-


मुझे लेकर ऐसे जहान में तू ले चल चंचल मन
जहॉं पल-पल की पलकों में ऑसू हो खुशि‍या बन

अमावस की जहॉं हो न काली रात
आपस में करते हों मानस केवल प्‍यार की बात
फूलों की खूश्‍बू से महके जहाँ का हर चमन
मुझे लेकर ऐसे जहान में......................

जहॉं मेहनत के जोश से रक्‍त बनता हो स्‍वेद
और लोगों में होता न हो आपस में मतभेद।
जहॉं पलती हो साथ-साथ, सुख-चैन औ चमन
मुझे लेकर ऐसे जहान में......................

जहॉं इंसा ही पूजे जाऍं और नर नारी का हो सम्‍मान।
बात-बात में जहॉं न नि‍कले, बरछी या तीर कमान।
जहाँ की धरती नीची न हो, न ऊँचा हो नील गगन
मुझे लेकर ऐसे जहान में......................

-जि‍तेन्‍द्र भगत( 1992)

Wednesday, 29 October 2008

डि‍ब्‍बा-पर्व और जेब में पटाखा !!

इस बार उत्‍तर प्रदेश, हरि‍याणा के चावल के खेतों से कीट-पतंगों की एक प्रजाति‍ दि‍वाली मनाने दि‍ल्‍ली आई थी और लगभग दो-तीन हफ्ते से दि‍ल्‍ली में डेरा डाले हुए थी। शाम को स्‍ट्रीट लाइट के नीचे से नि‍कलना दूभर हो जाता था, क्‍योंकि‍ ये ऑंख-मुँह,सर्ट में चले जाते थे। लोगों ने शाम को टहलना लगभग बंदकर दि‍या था। शम्‍मा पर नि‍सार होनेवाले इन परवानों को सुबह की झाड़ू के दौरान थोक के भाव में इकट्ठे कर बोरे में भर-भरकर फेंका जा रहा था। दुकानदारों को खासी परेशानी का सामना करना पड़ा, क्‍योंकि‍ त्‍योहार के इस मौसम में उन्‍हें हल्‍की रौशनी में सामान बेचना पड़ा। ज्‍यादा रौशनी में कीट-पतंगे ज्‍यादा आ रहे थे, इसलि‍ए ग्राहक या तो अंदर आ नहीं रहे थे या आकर जल्‍दी भाग रहे थे। जि‍नसे भी पूछो, यही कहते पाए गए कि‍ इतनी बड़ी तादाद में इन कीट-पतंगों को पहले कभी नहीं देखा गया।
तो, पि‍छले साल के लिहाज से इस बार बाजार में कीट-पतंगों की रौनक रही, और दुकानदारी फीकी।

ये तो थी कीड़ो की दि‍वाली, अब हम बड़कीड़ों ने दि‍वाली कैसे मनायी, इस पर भी एक नजर डालते हैं। मि‍ठाई की दुकानों पर ऑर्डर गया हुआ है कि‍ ऑफि‍स में इतने स्‍टाफ हैं, इतने डि‍ब्‍बे पैक करने हैं, बॉस का डि‍ब्‍बा अलग, मेमसाब का डि‍ब्‍बा अलग, शर्मा जी का अलग, वर्मा जी का अलग, अजी त्‍योहार न हुआ डि‍ब्‍बा-पर्व हो गया। जैसे हर धर्म में, उपासना गृह में भगवान बसते हैं, वैसे ही हर पर्व में डि‍ब्‍बा बसता है।
पूँजी के बाजार ने पर्व मनाने की नई परम्‍परा का ईजाद कि‍या है। शायद इसलि‍ए अचानक हर पर्व दो-दो दि‍न मनाने की कवायद चल पड़ी है। छोटी दि‍वाली है- क्‍या कि‍या जी, उपहार बॉंटे, आज बड़ी दि‍वाली है, क्‍या कि‍या जी, आज भी उपहार बॉंटे। इस तरह होली, ईद और दूसरे पर्व भी दो-दो दि‍न मनाए जाने लगे हैं। पहले भी ये दो बार मनाए जाते होंगे, मगर बाजार और मीडि‍या ने इसे अपने मतलब से अचानक उछाला है। दि‍क्‍कत तो ये है कि‍ शेयर बाजार में कभी आए उछाल के बाद आज जि‍तनी गि‍रावट दर्ज की गई है, पर्वाश्रि‍त इस बाजार में भी वह गि‍रावट नजर आएगी, यह सोचना बेमानी है। वैलेंटाइन डे, फादर्स डे, मदर्स डे, ये डे, वो डे- हर डे को मीडि‍यावाले अपने लि‍ए खबर का एक नया मसाला मानते हैं और बाजार माल खपाने के लि‍ए मार्केटिंग का एक और अवसर।

दि‍ल्‍ली एक महानगर है, गॉव तो है नहीं कि‍ दरवाजे से बाहर नि‍कले कि‍ पड़ोस में ही रि‍श्‍तेदार या दोस्‍त मि‍ल जाऍगे। यहॉं कि‍सी को उपहार देने नि‍कलो तो पता चलता है एक उत्‍तर में रहता है दूसरा दक्षि‍ण में। बि‍ना फोन कि‍ए जाओ तो पता चलता है कि‍ वह पूरब गया हुआ है उपहार बॉंटने। महानगरों में पर्व मनाने के नाम पर लोगों को सि‍र्फ और सि‍र्फ उपहार का आदान-प्रदान करते देखा है मैंने। सि‍र्फ इस वजह से भारी ट्रैफि‍क जाम और दुकानों में मेला देखने को मि‍लता है। चीजों की खपत पर्व त्‍योहारों पर इतनी बढ़ जाती है कि‍ दाम बेलगाम हो जाते हैं।

उपहार बॉंटने का सि‍लसि‍ला जि‍नका खत्‍म हो जाता है, वे बम-पटाखे नि‍कालते हैं तथा शोर और धुँओं में नोट को जलते देख खुशि‍यॉं मनाते हैं। मि‍.आहूजा एण्‍ड फैमि‍ली इंतजार करती है कि‍ जब उनके पटाखे खत्‍म हो जाऍगे तब ये पटाखे फोड़ना शुरू करेंगे और अगले दि‍न चर्चा का वि‍षय बनेंगे कि‍ इस बार आहूजा जी ने देर रात तक, जमकर दि‍वाली मनायी। इस तरह, पर्व पर अनेक लोग मानो अपनी जेब में बम-पटाखे फोड़ते हैं और उस फटी जेब को अगले कई महि‍नों तक छि‍पकर रफ्फू करवाते फि‍रते हैं।

उम्‍मीद है हम बाजार और मीडि‍या की इस मंशा को समझेंगे और कठि‍न होती महानगरीय जिंदगी के लि‍ए पैसे जोड़ने के साथ-साथ पर्व को मनाने के व्‍यवहारि‍क तरीके की तलाश करेंगे तथा पर्यावरण, परम्‍परा और जेब के बीच सामंजस्‍य और संतुलन बनाने का जतन करेंगे।

Sunday, 26 October 2008

सावधान !! यहॉं जेबरा क्रौसिंग नहीं होता !!

दृश्‍य 1
गाड़ी सडक पर अपनी रफ्तार से दौड़ी जा रही है, आगे मार्केट की भीड़ है। वहॉं कहीं भी जेबरा क्रौसिंग नहीं है, इसलि‍ए माना जाए कि‍ हर जगह जेबरा-क्रौसिंग है। एक संभ्रांत-सी दि‍खनेवाली महि‍ला अचानक कार के आगे आ जाती है, अचानक ब्रेक लेना पड़ता है, वह अपनी गल्‍ती छि‍पाने के लि‍ए मुझे देखकर मुस्‍कुराती है, और सड़क-पार चली जाती है। आगे चलकर एक गरीब महि‍ला सर पर टोकरी लि‍ए सड़क पार कर रही है। उसे कोई परवाह नहीं है कि‍ सामने से कार आ रही है। अचानक ब्रेक लेना पड़ता है, वह मेरी तरफ न देखती है, न ही मुस्‍कुराती है, उसमें न कोई खौफ है न कोई हि‍चकि‍चाहट और वह सड़क-पार चली जाती है।



दृश्‍य 2
सीढ़ि‍यॉं चढ़ते या उतरते हुए जब एक जवान के आगे कोई वृद्ध/वृद्धा सुस्‍त चाल से चढ़ते या उतरते हैं तब उसके मन में क्‍या चल रहा होता है- उफ्, जब तक सीढि‍यॉं खत्‍म नहीं हो जाती,अब इनके पीछे-पीछे चलते रहो। उसे खीज होती है कि‍ ये देखते भी नहीं कि‍ कोई जल्‍दी में है।

वृद्ध/वृद्धा के मन में क्‍या चल रहा होता है- हे भगवान, ये जवान मेरे पीछे-पीछे चलने के लि‍ए मजबूर हो गया है, अनजाने ही सही, कहीं जल्‍दी में ठोकर मारता हुआ नि‍कल गया तो संभलना मुश्‍कि‍ल हो जाएगा। और अगर पॉव लड़खड़ा ही गए तो दुबारा उठ न सकेंगें।



दृश्‍य 3
कनाट प्‍लेस का व्‍यस्‍ततम चौराहा। मैं पैदल जा रहा हूँ। फुटपाथ पर खुराफाती-से लगने वाले दो लड़के बैठे हुए हैं। सामने से दो वृद्ध वि‍देशी दम्‍पत्‍ति‍ आ रहे हैं। उनमें से एक लड़का गोबरनुमा कोई चीज़ उठाकर वृद्ध के जूते पर लगा देता है। दम्‍पत्‍ति‍ को या तो पता नहीं चलता या वे उसकी हरकतों की उपेक्षा कर देते हैं। वे लड़के उनके जाने के बाद आपस में बंदरों की तरह खि‍खयाते हैं, ये देखता हुआ मैं आगे बढ़ जाता हूँ।

Thursday, 23 October 2008

और रोटी तो नहीं चाहि‍ए ?

इंसान के पास दो चीजें ऐसी है जि‍से अच्‍छे खुराक की सख्‍त जरूरत होती है- पेट और दि‍माग। आदि‍म युग का इति‍हास बताता है कि‍ वह पेट की आग ही थी, जि‍से बुझाने के लि‍ए तरह-तरह से दि‍माग लगाए गए। अब आदि‍म युग तो समाप्‍त हो चुका है,आज लोग दि‍माग लगाने में ज्‍यादा व्‍यस्‍त हैं, जि‍ससे पेट की तरफ ध्‍यान ही नहीं जा रहा है, पर यहॉं मेरा मकसद मोटापे पर चर्चा करना नहीं है।
मुझे याद है- मैं गर्मियों की छुट्टि‍यों में हॉस्‍टल से घर आता था, घर कर बड़ा लड़का होने के नाते मेरी मां मेरे आराम का, खाने-पीने का हमेशा ध्‍यान रखती थी और अक्‍सर कहती रहती थी कि‍ बेटा ये खा ले, वो खा ले; ऑखें धॅस रही हैं, हड्डि‍यॉं नजर आने लगी हैं, वगैरह-वगैरह। मैं पन्‍द्रह साल का रहा हूंगा। पसीने से तरबतर, मुझसे दो साल छोटी मेरी बहन, मेरे लि‍ए रोटी बनाती थी। मेरे लि‍ए मां की इतनी जी-हुजउव्‍वत उसे चि‍ढ़ा-सी देती थी- कहती-मैं भी तो तीन भाइयों के बीच इकलौती हूँ , माँ मेरे लि‍ए इतना क्‍यों नहीं मरती ! फि‍र पलटकर मुझसे गुस्‍से में कहती- और रोटी तो नहीं लोगे ? मैं हॅसकर शि‍कायत करता-बहन, तू मुझसे ये नहीं पूछ सकती कि‍ और रोटी दूँ क्‍या? हमेशा उलटे सवाल क्‍यों करती है ?
मेरी पत्‍नी मुझसे ऐसे सवाल नहीं करती, क्‍योंकि मैं गि‍न कर रोटि‍यॉं खाता हूँ। घर के बड़े-बूढ़े कहते हैं- गि‍नकर खाने से शरीर को खाना नहीं लगता। मेरा मानना है कि‍ बि‍ना गि‍ने खाने से शरीर को खाना कुछ ज्‍यादा ही लग जाता है। कुछ जागरूक लोगों का मानना है कि‍ भूख से एक रोटी कम खानी चाहि‍ए। कुछ कहते हैं कि‍ हर तीन घंटे पर कुछ-न-कुछ लेते रहना चाहि‍ए।

एक जमाना था, जब डायनिंग टेबल का कॉन्‍सेप्‍ट नहीं था, लोग जमीन पर चादर बि‍छाकर,(या पीढ़ा पर) पालथी मारकर खाना खाते थे। तब संयुक्‍त परि‍वार हुआ करता था या एकल परि‍वार में सगे रि‍श्‍तेदारों का लंबे समय तक मजमा लगा रहता था और उनका चले जाना काफी तकलीफदेह लगा करता था।
इस माहौल में खाने का अपना मजा था, कि‍सी को कोई खास जल्‍दी नहीं रहती थी, जैसा कि‍ आज रहती है। आज हर दूसरा आदमी कहता है, भई, खाने तक को वक्‍त नहीं मि‍लता। जो खाने के लि‍ए समय नि‍काल लेते हैं, वे भी खाने की मेज पर ऐसे हड़बड़ाए रहते हैं जैसे नौकरी छूट रही हो।

मै सोचता हूँ कि‍ क्‍या कमाया यदि‍ ढ़ंग से नहीं खाया। मेरा मतलब ये नहीं है कि‍ आप फाइव-स्‍टार होटल में खाऍगे तभी आपका कमाना सार्थक होगा। आपके सामने थाली हो तो आप अपना ताम-झाम भुलाकर, सारा ध्‍यान खाने पर लगाऍं, तब जाकर खाने का मकसद पूरा होता है।
वैसे मेरे लि‍ए भी ये कहना आसान है, करना मुश्‍कि‍ल। जि‍स तरह से नगरों-महानगरों में व्‍यस्‍तताऍं बढ़ रही हैं, उस तरह दि‍माग भी लगातार दौड़ रहा है। उसकी दौड़ नींद को भी खराब करती रही है। कई लोग बत्‍ति‍यॉं बुझाकर सोने के लि‍ए लेट तो जाते हैं, पर नींद कई करवटों के बाद आती है। दुनि‍या में उन्‍हें खुशनसीब माना जाता है जि‍न्‍हें चैन की नींद और भोजन के साथ उसे खाने का वक्‍त मि‍लता है। वे बदनसीब हैं जि‍नके पास खाना है, पर खाने का वक्‍त नहीं। उनकी बदनसीबी पर तो क्‍या कहना जि‍नके पास खाना ही नहीं !

Sunday, 19 October 2008

प्‍लेटोनि‍क प्रेम ही असल प्रेम है, बाकी सड़कछाप !!

एक प्रसंग है- नायक अपनी प्रेमि‍का से पूछता है- क्‍या तुम मुझसे नफरत करती हो? नायि‍का कहती है- इतना प्रेम नहीं करती कि‍ तुमसे नफरत करुँ! यानी सच्‍चे दि‍ल से नफरत करनेवाला दरअसल उस चीज़ से कहीं भीतर तक जुड़ा होता है या आहत होता है पि‍छली पोस्‍ट में श्री अरविंद मि‍श्र एवं लवली जी ने प्‍लेटोनि‍क प्रेम के आयाम से रूबरू कराने की बात कही। वहॉं इश्‍क की कवि‍ता को सड़कछाप और हताश कवि‍ता के रूप में भी समझा गया। प्‍लेटोनि‍क प्रेम ही असल प्रेम है, बाकी सड़कछाप, यह नफरत ठीक नहीं। (मैं यह भी ध्‍यान दि‍लाना चाहूँगा कि‍ वह कवि‍ता 1996 में लि‍खी गई थी, जब मेरी उम्र 18-19 साल रही होगी।)

मेरा मानना है कि‍ आदर्श अक्‍सर अकेलेपन से जूझता है और यथार्थ हमेशा भीड़ से। जब मैं आदर्श की बात करता हूँ तो मुझे वास्‍वि‍कता में जीने की सलाह दी जाती है, जब यथार्थ का दामन पकड़ता हूँ तो आदर्श की सीख दी जाती है।

तब मुझे लगता है कि‍ ज्‍यादातर लोग अपने दि‍ल की बात को, अपने अतीत के सत्‍य को स्‍वीकार करने में संकोच करते हैं, अपनी उम्र के एक पड़ाव पर उसे स्‍वीकार करने में हि‍चकि‍चाते हैं अथवा अपने सामाजि‍क हैसि‍यत के माकूल नहीं समझते हैं। वे कई बार दि‍ल से तो स्‍वीकार तो करते हैं मगर दि‍माग से अस्‍वीकार। क्‍या यह सच से कतराना नही है अथवा उससे दूर भागना?

अनि‍ल पुसेडकर जी की स्‍वीकारोक्‍ति‍ में यह सत्‍य छि‍पा है कि‍ हर आदमी कभी-न-कभी प्रेम नाम की चीज़ से टकराता जरूर है, भ्रमि‍त जरूर होता है, आज उसका स्‍टेटस उसे स्‍वीकार करने में बाधक बन जाए, यह अलग बात है। आज आप बड़े हो गए तो बचपन में की गई उन नादान बहसों, प्रेम प्रसंगो को गैरजरूरी करार दे रहे हैं, इससे उसका अस्‍ति‍त्‍व खत्‍म तो नहीं हो जाता।
क्‍या वि‍रह-मि‍लन की शायरी को आप प्‍लेटोनि‍क प्रेम समझकर वाह-वाही देते हैं? प्रकारांतर से उसमें भी देह की मांग होती है, असफल हो जाने पर वह नि‍राशा और तड़प बनकर रह जाती है। उर्दू शायरी की यह खास पहचान रही है।

टीन-एज से गुजरने के बाद मैंने महसूस कि‍या है कि‍ प्रेम करने की भावना सबके मन में रहती है, उसकी परि‍णति‍ कहॉं होती है, यह शोध का वि‍षय है। सूत्र ये दे सकता हूँ कि‍ प्रेम का आधार कुछ प्रेमि‍यों के लि‍ए शरीर होता है कुछ के लि‍ए आत्‍मा। तो दो बातें हुई- शरीर की सुंदरता और आत्‍मा की सुंदरता।
एक बार की बात है- परदेश में एक बार कि‍सी भले ट्रक-ड्राइवर ने मुझे लि‍फ्ट दि‍या। रास्‍ते में घर-परि‍वार पर बातें होने लगी। उसने सादगी से बताया कि‍ उसकी पत्‍नी इतनी खूबसूरत है कि‍ वह हमेशा उसकी यादों में खोया रहता है, काम कुछ ऐसा है कि‍ हफ्ते में शायद एकाध दि‍न साथ रहने का अवसर मि‍ल पाता है। इसके बाद उस ड्राइवर ने अपनी बीवी की इतनी तारि‍फ की कि‍ मेरे मन में उसे देखने की इच्‍छा हो आई। रास्‍ते में उसका घर पड़ता था। उसने नाश्‍ते के लि‍ए अनुरोध कि‍या। दरवाजा खोलने पर सामने सॉवली-सी एक महि‍ला बाहर आई जो एकदम सामान्‍य वेशभूषा की थी। मुझे आश्‍चर्यमि‍श्रि‍त खुशी हुई थी।
जाहि‍र है, सुंदरता शरीर में नहीं, देखनेवाले के ऑंखों में होती है।

अलौकि‍क प्रेम एक आकर्षक वि‍चार है, जो आदर्श के समान सम्‍मोहन पैदा करता है, लेकि‍न अलौकि‍क प्रेम को अंत तक नि‍भा पानेवाले बि‍रले ही होते हैं, इसका उदाहरण मीरा और मोहन ही बन सकते हैं, राधा और मोहन नही। सगुण और नि‍र्गुण भक्‍त कवि‍यों के बारे में आपने सुना होगा। सगुणवादि‍यों के लि‍ए ईश्‍वर सगुण और साकार होता है, जबकि‍ नि‍र्गुण उपासक के लि‍ए ईश्‍वर नि‍राकार हैं, नि‍र्गुण का मतलब यहॉं गुणरहि‍त नहीं, गुणाति‍त है। दोनों का लक्ष्‍य अंतत: ईश्‍वर प्राप्‍ति‍ है। साध्‍य को प्राप्‍त करने के लि‍ए लोग अपने अनुरूप साधन अपनाते हैं, इसलि‍ए कि‍सी की उपासना-पद्धति‍ पर शक करना यहॉं अनुचि‍त होगा।
सच्‍चे प्रेम के संदर्भ में शरीर आत्‍मा का पूरक है, आत्‍मा शरीर का। इसलि‍ए कोई कहीं से भी आरंभ करे, लक्ष्‍य तो प्रेम ही है। मेरी समझ से, प्लेटोनि‍क प्रेम को वासनाहीन माना जाता है, ,यहॉ यौनेच्‍छा को पूरी तरह नकारकर अलौकि‍क/आध्‍यात्‍मि‍क प्रेम को अपनाया जाता है।

मेरा ये मानना है कि‍ शरीर की मांग को यदि‍ शमि‍त किया जाए तो उसका प्रेम अलौकि‍क हो जाता है, पर यदि‍ दमि‍त कि‍या जाए तो वह अलौकि‍क प्रेम का ढ़ोंग बनकर रह जाता है। इस लि‍हाज से मैंने कि‍सी को प्‍लोटोनि‍क प्रेम करते नहीं पाया है, अगर आपके पास ऐसे अनुभव हैं, उदाहरण हैं, साथ में पुख्‍ता सबूत भी, तब ये अनुभव हम लोगों के साथ भी बॉंटे।

वास्‍तव में ऐसी चीजों का कभी पुख्‍ता सबूत नहीं होता, संदेह हमेशा बना रहेगा, श्रद्धा या आस्‍था की नि‍गाह से देखने पर व्‍यवहारि‍कता कई बार दरकि‍नार भी हो जाती है। जाते-जाते कुछ सवालों का जवाब चाहूँगा- आपलोग ऐसे कि‍तने लोगों को जानते हैं, जि‍सने प्‍लेटोनि‍क प्रेम कि‍या, क्‍या वह प्रेम सफल रहा? अगर सफल हुआ भी तो क्‍या वह प्‍लेटोनि‍क प्रेम रह पाया?

Friday, 17 October 2008

इश्‍क-वि‍श्‍क, प्‍‍यार- व्‍यार, मैं क्‍या जानूँ रे !!

कॉलेज को अधि‍कतर लोग इश्‍क फरमाने की सही जगह मानते हैं। हालॉकि‍ जो कॉलेज नहीं जा पाते, वे ऑफि‍स और पड़ोस में ही कि‍स्‍मत आजमाते हैं। इश्‍क करना कोई गुनाह नहीं है, बशर्ते उसमें बेवफाई ना हो। जब मैं कॉलेज में ‘एडमि‍ट’ हुआ तो पाया, वहॉं इस मर्ज से कई मरीज तड़प रहे थे। कुछ तो घायल अवस्‍था में यहॉ पहुँचे थे और सही दवा की तलाश कर रहे थे। कुछ को सि‍र्फ मामूली बुखार था, मगर उन्‍होंने उसे डेंगू-मलेरि‍या बताया, डॉक्‍टर को उनके खुराफात की खबर हो गई, उनकी दवा ने ऐसा रि‍ऐक्‍ट कि‍या कि उन्‍होंने तो आगे इस मर्ज के नाम से ही तौबा कर ली। इसके बावजूद कई लोग तो कई बीमारि‍यों को गले लगाए बैठे थे, और कहते थे कि‍ अब तो बीमारी के साथ जीने की आदत-सी पड़ गई है। कुछ खास मरीज ऐसे भी थे, जो कार से आकर यहॉं एडमि‍ट हुए थे, इसलि‍ए उनका तुरंत इलाज हो गया। इन्‍हें देखा-देखी कुछ गरीबों को भी अमीरों की ये बीमारी लग रही थी। इस बीमारी का खर्चा-पानी गरीबों के बस की बात नहीं थी; उन्‍हें क्‍या मालूम था कि‍ गरीब रोगी को समाज का कोढ समझकर मार दि‍या जाता है। गरीब समाज में माना जाता है कि‍ बीमार को मार दो, बीमारी अपने आप मर जाएगी।

खैर, मैं तो इस मर्ज से काफी घबराता था और मानता था कि‍ precaution is better than cure. लक्षण के आधार पर मर्ज की पहचान को डायग्‍नोसि‍स (Diagnosis ) कहा जाता है। उमर की खुमारी में जि‍न लोगों को ये रोग लग गया था, मैंने उनका डायग्‍नोसि‍स 1996 में कि‍या था, और इसकी फाइल आपके सामने (एक लाइन छोड़कर) ज्‍यों का त्‍यों रख रहा हूँ-


ऐसी है एक चीज़ जि‍सपे,
लुट जाते हैं लोग,
जि‍सकी कोई दवा नहीं,
इश्‍क है ऐसा रोग।




दर्पण देख-देख मुस्‍काना
अंधों में है राजा काना
खोने पर तो जी घबराना
पाने पर जी-भर इतराना



जुगत लगाते कटते दि‍न
व बेचैनी में कटती रात।
धीर,अधीर या हो गंभीर
बनते-बनते बनती बात।


दि‍न लगती है रात
पतझड़ लगता बहार।
छवि‍ बनाने के चक्‍कर में
देना पड़ता उपहार।



चूड़ी-कंगन की फरमाइश
सब कुछ लुटने की गुँजाइश
एक-दूजे की है अजमाइश
जीने-मरने की भी ख्‍वाइश


नेल,शूज और फेस की पॉलि‍श
कुछ बॉडी-शॉडी की भी मालि‍श
शेव, फेशि‍यल, फैशन व जीम
कार सफारी हो या क्‍वालि‍स।



ड्रेस को हरदम प्रेस कि‍या,
गीफ्ट दे-देके इम्‍प्रेस कि‍या
ऑंखों ही ऑंखों में
भावों को इक्‍सपैस कि‍या।


बात फि‍र भी नहीं बनी,
घरवालों से भी खूब ठनी,
प्रति‍योगी भी कम थे नहीं,
जेब से नि‍कली खूब मनी।


दस लोगों के बीच से छँटके
रह गए थे सबसे कटके
खामोशी का आलम होता
सह न पाये इश्‍क के झटके।


ऑखें सपनो में जो खोई
कब जागी व कब-कब सोई
लाईलाज है मान भी लो जी
इस मर्ज की दवा न कोई।




-जि‍तेन्‍द्र भगत(1996)
(सभी चि‍त्रों के लि‍ए गूगल का आभार)

Monday, 13 October 2008

ओ.के.सेब !!

एक स्‍टॉल पर लाल-लाल सेब रखे हैं। दुकानदार उसे चाइनीज़ सेब बता रहा है। पास में भारतीय सेब भी रखा है, उस पर कहीं-कहीं हल्‍के-काले धब्‍बे हैं, मगर साथ में ओ.के. लि‍खा हुआ स्‍टीकर चि‍पका हुआ है। चाइनीज़ इलेक्‍ट्रौनि‍क सामान के ऊपर भी ओ.के. चि‍पका होता है, पर वह कि‍तना ओ.के. होता है, यह सबको पता है। सोचता हूँ इस पर आई.एस.आई का मार्का चि‍पका होता तो बेहि‍चक खरीद लेता! फि‍र भी एक कि‍लो ओ.के.सेब खरीद लि‍या है। खाने से पहले ओ.के. का स्‍टीकर हटा रहा हूँ। स्‍टीकर के नीचे एक सुराख नजर आ रही है। हैरान होकर दूसरा सेब उठाता हूँ,फि‍र तीसरा,चौथा....., कुछ को छोड़कर सभी स्‍टीकर के नीचे सुराख है।



सवाल: क्‍या यह स्‍टीकर हम लोगों के वि‍चारों पर भी नहीं चि‍पका हुआ है?



(क्‍या यह पोस्‍ट माइक्रो टाइटि‍ल और माइक्रो पोस्‍ट के खॉंचे में आता है?)

Sunday, 12 October 2008

पुरानी जींस और गि‍टार.......

अमेरि‍का में 19वीं सदी के मध्‍य में जब मजदूर वर्ग ने जींस को पहले-पहल अपनाया, तब मार्क्‍स भी यह नहीं जानते होंगे कि‍ आनेवाले दि‍नों में यह अमीरों के बीच भी खासा लोकप्रि‍य हो जाएगा। 1930 के दौर में हॉलीवुड में काऊ-बॉय ने जींस के फैशन को और लोकप्रि‍य बनाया। द्वि‍तीय वि‍श्‍व-युद्ध के दौरान अमेरि‍कन सैनि‍क ऑफ-ड्यूटी में जींस पहनना ही पसंद करते थे। 1950 के बाद यह अमेरि‍का में नौजवानों के बगावत का प्रतीक बन गया और वहॉं के कुछ स्‍कूलों में इसे पहनने पर प्रति‍बंध भी लगा दि‍या गया। आगे चलकर यही जींस भारत में मस्‍ती और मौज का पहनावा बन गया। 1990 के दशक से बॉलीवुड में भी इसको लोकप्रि‍यता मि‍लने लगी।


सलमान खान ने तो जींस की नीक्‍कर और फटी जींस को नौजवानों के बीच लोकप्रि‍य बनाया। टी.वी. पर एक ऐड भी आपने जरूर देखा होगा-एक जींस पहनी हुई लड़की चहकती हुई आती है,फटी जींस बि‍स्‍तर पर छोड़कर बाथरूम की तरफ चली जाती है,इस बीच मॉं आती है, फटी जींस देखकर मुँह बनाती है और‍ बड़ी मासूमीयत के साथ सि‍लाई-मशीन चलाकर खुद उस जींस की सि‍लाई कर देती है।
बहरहाल, फर्ज कीजि‍ए,कोई छात्र धोती-कुर्ता पहनकर महानगरीय कॉलेज में आ जाए,तब क्‍या होगा। वैसे कुर्ता-पाजामा के दि‍न अभी नहीं लदे हैं, नेताओं का संरक्षण भी इसे प्राप्‍त है और कुछ छात्र-छात्राओं में भी जींस के ऊपर कुर्ता पहनने का फैशन है।ऐसा माना जाता है कि‍ कॉलेज में जि‍सने जींस पहना है वह लड़का या लड़की मॉड है। हालॉकि‍ मॉड बनने के लि‍ए जींस को पैमाना मानना सही नहीं है। गर्मी हो या सर्दी, जींस पहनने में फैशनपरस्‍तों को तकलीफदेह नहीं लगती। जींस की कुछ खूबि‍यों का मैं कायल हूँ-
1)उसे प्रैस नहीं करना पड़ता, अब तो रिंकल्‍ड जींस भी चलन में आ गया है।
2)जब तक बदबू न आने लगे, उसे धोने की भी जरुरत नहीं पड़ती, कुछ लोग 15-20 बार पहनने के बाद भी उसे धोने से कतराते हैं। उनका कहना है कि‍ इसका मैलापन भी एक फैशन है।
3) ज्‍यादा पहनने पर जींस कहीं से फट जाए(मूल स्‍थान को छोड़कर), तो उसे भगवान की नि‍यामत समझी जाती है, उसकी सि‍लाई करना फैशन के अदालत में गुनाह है। और अगर न फटे तो उसे पत्‍थर से रगड़ा जाता है, साथ ही सुई लेकर सावधानी से उसे जगह-जगह से उधेड़ी जाती है।


हालॉकि‍ मैंने जींस ज्‍यादा नहीं पहना है और पुरानी होने से पहले ही पहनना छोड़ दि‍या था। पर हैदर अली के इस गीत में जींस के साथ कॉलेज के दि‍नों को फि‍र से जीता हुआ देखता हूँ। सि‍गरेट कभी नहीं पी क्‍योंकि‍ खेतों के ऊपर जमी हुई धुंध सि‍गरेट की धुओं से ज्यादा आकर्षक लगती रही है। खेत देखे अरसा हो गया है, अब सर्दियों की धुंध का इंतजार है।

हैदर अली की आवाज में ये मस्‍त गीत सुनने के लि‍ए हम्‍टी-डम्‍टी के पैर के पास क्‍लीक कीजि‍ए, मजा न आए तो समझि‍एगा कि‍ आपका जवॉं दि‍ल इस अहसास में ड़ूबने से चुक गया। इस हालत में आपको आपके जमाने की गीत भी सुनाउँगा- चुप-चुप बैठे हो जरुर कोई बात है.....

Ali Haider - Puran...


जो सुन ना सके, उनकी सहूलि‍यत के लि‍ए इस गीत के बोल लि‍ख देता हूँ-


पुरानी जींस और गि‍टार
मोहल्‍ले की वो छत और मेरे यार
वो रातों को जागना
सुबह घर जाना कूद के दीवार

वो सि‍गरेट पीना गली में जाके।
वो दॉतों को घड़ी-घड़ी साफ
पहुँचना कॉलेज हमेशा लेट
वो कहना सर का- ‘गेट आउट फ्रॉम दी क्‍लास!

वो बाहर जाके हमेशा कहना-
यहॉं का सि‍स्‍टम ही है खराब।
वो जाके कैंटि‍न में टेबल बजाके
वो गाने गाना यारों के साथ
बस यादें, यादें रह जाती हैं
कुछ छोटी,छोटी बातें रह जाती हैं।
बस यादें............

वो पापा का डॉटना
वो कहना मम्‍मी का- छोड़ि‍ए जी आप!
तुम्‍हें तो नजर आता है
जहॉं में बेटा मेरा ही खराब!

वो दि‍ल में सोचना करके कुछ दि‍खा दें
वो करना प्‍लैनिंग रोज़ नयी यार।
लड़कपन का वो पहला प्‍यार
वो लि‍खना हाथों पे ए प्‍लस आर.

वो खि‍ड़की से झॉंकना
वो लि‍खना लेटर तुम्‍हें बार-बार
वो देना तोहफे में सोने की बालि‍यॉं
वो लेना दोस्‍तों से पैसे उधार
बस यादें, यादें रह जाती हैं
कुछ छोटी,छोटी बातें रह जाती हैं।
बस यादें............

ऐसी यादों का मौसम चला
भूलता ही नहीं दि‍ल मेरा
पुरानी जींस और गि‍टार.....

(पोस्‍ट में संगीत लोड करने की प्रक्रि‍या से मैं अनभि‍ज्ञ था। प्रशांत प्रि‍यदर्शी जी का आभारी हूँ, जि‍न्‍होंने मेल के माध्‍यम से मुझे इसकी वि‍धि‍ से अवगत कराया। शुक्रि‍या प्रशांत जी।)
(सभी चि‍त्रों के लि‍ए गूगल का आभार)

Friday, 10 October 2008

जहॉं मैं घंटे-भर बेहोश रहा....

मैं स्‍ट्रेचर पर लेटा हुआ था। गहरी नींद के बीच कुछ परि‍चि‍त-सी आवाज सुनाई पड़ रही थी। बोझि‍ल पलकों को उठाने की कोशि‍श की, इतना ही देख सका कि‍ कुछ रि‍श्‍तेदार आए हुए हैं। मैं कुछ पूछना चाह रहा था, पर जुबान धाराशायी-सी लग रही थी। मैंने लटपटायी आवाज में अपनी पत्‍नी से पूछा- इनलोगों को बुलाने के लि‍ए मैंने मना कि‍या था, ये क्‍यों आ गए? आना भी था तो आपरेशन के बाद आते!

पत्‍नी ने कुछ कहा पर वह मुझे साफ-साफ समझ नहीं आया। मैंने कहा कि‍ मुझे बाथरूम ले चलो। नर्स ने कहा कि‍ आपसे ‘यूरीन बैग’ जुड़ा हुआ है, आपको बाथरूम जाने की जरूरत नहीं है। मैं नींद में डूबा हुआ-सा था, मुझे झल्‍लाहट हुई कि‍ मैं बि‍स्‍तर पर लेटे हुए ऐसा कैसे करूँ!

कमरे में एक दीवार घड़ी थी, पर उसकी सुइयॉं मुझे नजर नहीं आ रही थी। मैं हैरान हुआ कि‍ मैं इतनी नींद में क्‍यूँ हूँ! समय पूछने पर मुझे बताया गया- साढ़े छह! मैंने रौशनदान की तरफ देखने की कोशि‍श की कि‍ यह सुबह है या शाम, पर समझ नहीं आया। मुझे बताया गया कि‍ शाम है। मैं हैरान हो गया कि‍ शाम सवा पॉच बजे मुझे ऑपरेशन थि‍येटर ले जाया गया था फि‍र यहॉं कब आया! बीच का एक घंटा कहॉं गायब हो गया। मैंने जोर देकर सोचा- तब डॉक्‍टर ने दो बड़े इंजेक्‍शन मुझे लगाए थे। मैंने उससे सि‍र्फ इतना ही पूछा था कि‍ ज्‍यादा तकलीफ तो नहीं होगी? जवाब सुनने से पहले ही एनेस्‍थेसि‍या का असर हो चुका था............ एक कसक-सी उठी, यानी ऑपरेशन हो चुका है! मुझे खुशी हुई कि‍ वह घड़ी नि‍कल चुकी है और यहॉं से मुझे बस रि‍कवर करना है। तब मुझे ध्‍यान आया कि‍ मैं स्‍ट्रेचर पर नहीं, वार्ड न.5 के बि‍स्‍तर पर लेटा हुआ हूँ।

रात होने तक सभी चले गए। एटेंडेंट के रूप में पत्‍नी का साथ मेरे लि‍ए दवा से कम न था। रात का खाना आ गया। ‘सब्‍जी’ तेल और मि‍र्च में डूबी हुई थी,उसके साथ रोटी खाते हुए सोचने लगा कि‍ डॉक्‍टर वैसे तो तमाम सलाह देगा कि‍ ये खाना है ये नहीं खाना, पर क्‍लीनि‍क में पेसेंट को खाने में क्‍या दि‍या जा रहा है, ये वो नहीं देखता!

पहली रात बेहोशी और नींद के दरम्‍यान मैं गोते लगाता रहा। कभी ऐसा लगता जैसे मैं बि‍स्‍तर पर नहीं, सागर की लहरों पर लेटा हुआ हूँ, एक बेड़े की तरह डगमगाता हुआ दि‍शाहीन भटका जा रहा हूँ। तो कभी ऐसा लगता जैसे कागज की तरह ऑंधी में उड़ा जा रहा हूँ, एक अजीब-सी बेचैनी थी, जि‍से शब्‍दों में बयान कर पाना आसान नहीं। बस इतना ही कह सकता हूँ कि‍ ये वो क्षण था जहॉं न जिंदगी के बारे में कुछ सोच सकता था न मौत के बारे में।
एक भटकती आत्‍मा-सी बेजान जि‍न्‍दगी लग रही थी।

रात को बाथरूम की लाइट ऑन रहती थी, उस भीनी रोशनी में नर्स आती और आकर एंटीबायटीक/ग्‍लूकोज़ की नई बोतल चढ़ा जाती। साथ ही कैनुला के जरि‍ए दो इंजेक्‍शन भी लगा जाती, मैं आग्रह करता कि‍ लाइट ऑन कर लीजि‍ए और धीरे-धीरे इंजेक्‍ट कीजि‍ए, नस में अचानक तेज प्रवाह आने से दर्द की चुभन बनी रहती है। कोई फर्क नहीं पड़ेगा- यह कह कर नर्स चली जाती। उसके जाने के बाद एकाध घंटे तक मुझे फर्क पड़ता रहता।


एक बार तो हद हो गई। उस क्‍लीनि‍क में यह मेरी दूसरी रात थी। नर्स आई और एंटीबॉयटीक की बोतल बदलने के बाद कैनुला के जरि‍ए इंजेक्‍शन लगाने लगी। तभी उसका मोबाइल बजा, उसने मोबाइल नि‍कालकर कान और कंधे के नीचे दबाया और हाय-हैल्लो करने लगी। इंजेक्‍शन आधा ही लगा था। मैं कहता रहा- आ..धीरे-धीरे!! वह गर्दन हि‍लाकर मुझे जवाब देती रही या फोनवाले को, पता ही नहीं चला। वह इंजेक्‍शन ठूँसकर चलती बनी। मुझे फि‍र एक घंटे तक फर्क पड़ता रहा।


खैर, यह तो अच्‍छी और जानी-मानी क्‍लीनि‍क थी, मामूली जगह इलाज कराता तो न जाने और भी कई कहानी बन गई होती; तब वह कहानी न रहती, हादसा बन जाता........।

(uretic stone नि‍कालने के लि‍ए endo incision की प्रक्रि‍या अपनाई जाती है, इस वि‍डि‍यो को आप यहॉ देख सकते हैं।)

(सभी चि‍त्रों के लि‍ए गूगल का आभार)

कि‍डनी स्‍टोन के ऑपरेशन का एक वि‍डि‍यो!



कि‍डनी स्‍टोन के ऑपरेशन में कोई मुश्‍कि‍ल नहीं आई, क्‍योंकि‍ इसमें कोई सर्जरी नहीं की गई थी। लेकि‍न पूरी तरह ठीक होने में हफ्ता-दस दि‍न तो लग ही जाता है। आपलोगों की नेक सलाह को अमल में भी ला रहा हूँ। आप सबका तहे-दि‍ल से शुक्रगुजार हूँ। आप लोगों की शुभकामानाओं से मैं अब ठीक हो चुका हूँ और नार्मल रूटीन में आने लगा हूँ। 10 दि‍नों से जो काम पेंडिंग पड़ा हुआ था, उसे धीरे-धीरे नि‍पटा रहा हूँ। आप लोगों से पुन: जुड़ते हुए काफी खुशी हो रही है।

डि‍सचार्ज करने से पहले क्‍लीनि‍क में मेरे uretic stone नि‍कालने का वि‍डि‍यो दि‍खाया गया था। वो तो मुझे उपलब्‍ध नहीं हो सकता था, इसलि‍ए यू-ट्यूब से प्राप्‍त इस endo incision की एक वि‍डि‍यो आप यहॉ देख सकते हैं।
(इसमें दर्शाया गया nikitha hospital से मेरे क्‍लीनि‍क का कोई संबंध नहीं है।)

Monday, 6 October 2008

एक छोटा पत्‍थर आदमी को पंगु बना देता है!!

दो अक्‍तूबर की सुबह! पेट में भयंकर दर्द उठा। ज्‍यादा सच बोलने की ताकत बटोरते-बटोरते पेट में दर्द तो उठना ही था। जब दर्द उठा तो न कोई डाक्‍टर मि‍ला, न ही एक्‍स-रे या अल्‍ट्रासाउण्‍ड कराने की क्‍लीनि‍क। सब छुट्टी पर थे।
हमने भी इसे गैस की मामूली समस्‍या समझकर ज्‍यादा प्रयास नहीं कि‍या। अगले दि‍न जब दर्द असहनीय होने लगा, तब चेक-अप कराया। 4mm के तीन स्‍टोन राइट कि‍डनी में पाए गए और लेफ्ट कि‍डनी में दो। ये ज्‍यादा बड़े नहीं थे।


दरअसल 6mm का ureteric stone दाऍ कि‍डनी के रास्‍ते में रोड़ा अटका रहा था। बाहर की दुनि‍या से तो हम लड़ सकते है, अंदर से लड़ना बहुत मुश्‍कि‍ल होता है। 3 अक्‍तूबर की शाम एनेस्‍थेसि‍या देकर endo incision के जरि‍ए मेरा ऑपरेशन कि‍या गया।

क्‍लीनि‍क से कल शाम (5 अक्‍तूबर) ही डि‍सचार्ज हुआ हुआ हूँ, कमजोरी और सर घुमने की शि‍कायत बनी हुई है। इस ऑपरेशन में सर्जरी नहीं होती, मगर 65 cm बेहद पतली तार कि‍डनी तक छोड़ी गई थी, जि‍से करीब 40 घंटे बाद बेहद बेदर्दी से खींचकर नि‍काला गया था।
खैर अब अंदर कुछ भी नहीं है। दि‍ल्‍ली के स्‍पेस्‍लि‍स्‍ट स्‍टोन क्लीनि‍क में 29 हजार रूपये के पैकेज ईलाज में पेट के अंदर कुछ छूटने का डर बि‍ल्‍कुल नहीं था। थकान और सर दर्द बना हुआ है, इसलि‍ए इस सूचना के साथ मैं एक हफ्ते के आराम के बाद जल्‍दी ही लौटूँगा। और हॉं, तब तक आप लोगों को बहुत मि‍स करूंगा।
( डि‍सचार्ज करने से पहले क्‍लीनि‍क में मेरे uretic stone नि‍कालने का वि‍डि‍यो दि‍खाया गया। इस endo incision की एक वि‍डि‍यो आपको अगली बार दि‍खाउँगा।)

Wednesday, 1 October 2008

पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा.........

स्‍कूल के उन्‍हीं दि‍नों में कई फि‍ल्‍में कॉलेज-बॉय की छवि‍ बना रहे थे- आमि‍र खान की कयामत से कयामत तक, जो जीता वही सि‍कंदर; दि‍ल का क्‍या कसूर; दि‍ल आदि‍। इन फि‍ल्‍मों में देखता था कि‍ कॉलेज में कि‍तनी आजादी है! कि‍सी तरह की कोई बंदि‍श नजर नहीं आती थी। मन कि‍या तो कॉलेज गए, बंक मारा, क्‍लास में गप्‍पे मारी, हूटिंग और रैगिंग में दि‍न बि‍ताकर घर की चारपाई पर पस्‍त हो लि‍ए।

‍ पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा......... जैसे गीत कॉलेज का थीम सॉंग बन चुका था। खैर, सभी कॉलेज में पढ़ने की ख्‍वाईश रखते हैं। जब वे कॉलेज आते हैं तो धीरे-धीरे यहॉं के रि‍वाज से परि‍चि‍त होने लगते हैं। एक छात्र की नजर से कॉलेज की तस्‍वीर क्‍या हो सकती है, यह इस कवि‍ता के माध्‍यम से प्रस्‍तुत कर रहा हूँ, जो 1996 में लि‍खी थी।



बड़े-बड़े दि‍ग्‍गज जहॉं जाकर,
पाते हैं हर नॉलेज,
सुनो बात ये कान लगाकर,
क्‍या है रि‍वाज-ए-कॉलेज।


पढ़ने वाले बाहर होते
टीचर क्‍लास के अंदर,
धमाचौकड़ी देखके इनकी
शरमाए भी बंदर।

जि‍धर भी देखो, दि‍ख जाएगा,
देशी मुर्गी चाल वि‍लायती,
रैगिंग, फैशन, फि‍ल्‍में, कॉफी,
इसके हैं सभी हि‍मायती।

गि‍टि‍र-पि‍टि‍र अंगरेजी बोले,
हि‍न्‍द देश में गजब तमाशा,
जेबों में बज रही है घंटी
भीख मॉगकर बोले भाषा।



कोई दूर से हाथ हि‍लाए
तो कोई आकर हाथ मि‍लाए,
सुबह-शाम बस कॉलेज में तो
बाय-टाटा-हैल्लो-हाय।

धन के मौजी, मन के मौजी
कायदे बड़े ही साफ हैं-
दब्‍बू भी बस में अकड़ के कहते
’स्‍टाफ हैं जी स्‍टाफ हैं।‘

इस सूखी अकड़ के पीछे,
कॉलेज का है जोर,
हल्‍की,छोटी बातों पर भी
मच जाता यहाँ शोर।

एक तरफ हॉकी-खँजर है,
एक तरफ चुनाव,
लड़नेवाले लगा रहे हैं
अपना सबकुछ दॉंव।



राजनीति‍ की वही नीति‍ है
वोट लो हाथ जोड़के
दलबल गर जीत गए तो
रख दें सबकुछ फोड़के।

वोट-दि‍लासा-दावे-वादे,
यही चुनावी भाषा।
होता नहीं भला कि‍सी का
वही है फि‍र भी आशा।


चुनाव की वो बला टली
जो आती थी हर साल में,
बाकी वक्‍त कैंटि‍न में बीता,
बाकी गया हड़ताल में।

कॉलेज का दस्‍तूर कहो या
पश्‍चि‍म का प्रभाव,
सबकुछ है पर कपड़े व
शि‍क्षा का बहुत अभाव।


ऑंख पर चश्‍मा, हाथ में बाइक,
चुस्‍त जींस है पैरों में,
चि‍डि‍यॉंघर से भागा बंदा,
है तो अपना गैरों में।




अपनी नजर में बन बैठे हैं,
कॉलेज के मेहमान,
कॉलेज के ज़ीनों पर जि‍नकी
जीने का रहता अरमान।

वैसे कॉलेज के दि‍न होते हैं,
छोटे पर काफी रंगीले,
साथ जो था मेरी संगी का
क्‍यों करता मैं शि‍कवे-गीले।

खैर अच्‍छा टाइम पास हुआ,
पर बाद में ये अहसास हुआ-
वो समय गया, वो पैसे गए,
फि‍र भी मैं न पास हुआ।

ये नया साल का तीसरा महि‍ना,
और चौथे में इक्‍ज़ैम,
घास चर के लौटी अक्‍ल तब
सुबह से हो गई शाम।

घरवाले थे बीन बजाते
काला अक्षर चरने को।
गया भैंस पानी में देखा,
गुड़-गोबर कर मरने को।

देर को दुरुस्‍त करने का,
अब था केवल यही उपाय,
वक्‍त जब बचा नहीं तो
एक रि‍स्‍क लेकर देखी जाए..

कई रातों तक जग-जगकर,
मैंने खूब पढ़ाई की,
कैसे कहूँ कि‍ छोड़ कलम
कैंची से पर्ची कढ़ाई की।

अब ये मेरा बर्ष पंचम है,
सबकुछ है पहले जैसा,
अब अपने मुँह से क्‍या कहूँ,
कॉलेज होता है कैसा!

-जि‍तेन्‍द्र भगत, 1996

(सभी चि‍त्रों के लि‍ए गुगल का आभार)

Sunday, 28 September 2008

ब्‍लॉग: रि‍श्‍तों की समानांतर दुनि‍या और दोहरी छवि‍!!

दोहरी जि‍न्‍दगी जीने का इतना सुखद अर्थ मैंने कभी नहीं सोचा था। ब्‍लॉग पर जो आभासी रि‍श्‍ते बनते हैं या बि‍गड़ते हैं, कि‍सी टी.वी. धारावाहि‍क की कहानी की तरह ही वे आगे बढ़ते हैं। एक सूत्र से कथा दूसरे सूत्र तक जाती है, दूसरे से तीसरे और इस तरह कभी न खत्‍म होनेवाले इस सीरि‍यल से हम जुड़ते चले जाते हैं। यहॉ हम ही नायक, हम ही खलनायक और हम ही नि‍र्देशक।

कभी-कभी अवसाद मन में भर जाता है कि‍ इससे बाहर चला जाऊँ, अपनी जिंदगी संभालने का वक्‍त नहीं नि‍कल पाता, परि‍वार-रि‍श्‍तेदार भी वक्‍त देने के लि‍ए ताने मारते रहते हैं। इसके बाद, एक साथ इतने लोगों से ब्‍लॉग पर मि‍लने-जुलने की ताकत चाहि‍ए, प्रबल इच्‍छा-शक्‍ति‍ चाहि‍ए। और यह ताकत कई लोगों के पास है, जि‍नके जज्बे की मैं कद्र करता हूँ।

इस छद्म भरी दुनि‍या में व्‍यक्‍ति‍ अपनेआप को जि‍स तरह प्रोजेक्‍ट करता है, क्‍या यही उसका असली चरि‍त्र है? बहरूपि‍या बनकर लोगों की भावनाओं को भुनाना क्‍या सही है? परदे पर आए बि‍ना स्‍वांग करना आसान नहीं है। कभी शीशा देखते हुए आपने राक्षसी चेहरा बनाया है, (आज बनाकर देखि‍एगा) कि‍तना भयावह रूप होता है वह! फोटो खिंचवाते हुए हम अपने चेहरे पर मुस्‍कान लाने की कोशि‍श क्यों करते हैं? हम अपनी लेखनी से जो छवि‍ नि‍र्मि‍त करते हैं, क्‍या उसी उत्‍कंठा से हम उसे जी पाते हैं?

हर आदमी की अपने बारे में एक राय होती है, कई बार अपने बारे में बनी राय दूसरों के राय से भि‍न्‍न और कई बार वि‍परीत भी होती है। बहुत चुप रहनेवाले व्‍यक्‍ति‍ को आप ब्‍लॉग पर बतरस के बादशाह के रूप में स्‍थापि‍त पा सकते हैं। बहुत मजाकि‍या आदमी गंभीर लेखन के लि‍ए जाना जाता हो, गंभीर आदमी ब्‍लॉग पर सतही बातें करते हुए मि‍ल सकते हैं। बहुत मि‍लनसार लगनेवाला आदमी शायद मि‍लने पर झल्‍लाते हुए नजर आ सकता है। अहंकारी लगनेवाला आदमी क्‍या पता खाति‍रदारी में कोई कसर न रहने दे। सुंदर लगने वाला आदमी बदसूरत और बदसूरत लगनेवाला आदमी सुंदर नजर आ सकता है। जरुरी नहीं कि‍ यह वि‍रोधाभास मि‍लता ही हो। अपनी छवि‍ को टूटता या बनता देख अफसोस या संतोष होना आम बात है।

एक सहज मानवीय अवगुण के तहत खास लोगों के साथ आम लोग जल्‍दी रि‍श्‍ता बनाने के फि‍राक में रहते हैं। वे सोचते हैं कि‍ इस दोहरी जिंदगी के भेद को धीरे-धीरे खत्‍म कर देंगे और व्‍यक्‍ति‍गत रि‍श्‍ता कायम कर उनसे अपना स्‍वहि‍त सि‍द्ध करेंगे। इसमें सफल होंगे या नहीं यह वे भी नहीं जानते। इसलि‍ए कहा जा सकता है कि‍ ब्‍लॉग को ब्‍लॉग ही रहने दो, इस रि‍श्‍ते को कोई नाम न दो। अधि‍कांश ब्‍लॉगर एक-दूसरे से न कभी मि‍लें हैं और न ही मि‍लना चाहेंगे। शायद मैं भी इन्हीं में से एक हूँ। यह एक रोमांटि‍क वि‍चार है। ब्‍लॉगर्स-मि‍ट इस वि‍चार में मि‍सफि‍ट बैठता है, पर रोमांटि‍क वि‍चार अक्‍सर क्षण-भंगुर होते हैं। अनुराग जी ने मेरी एक पोस्‍ट पर एक बड़ी अर्थपूर्ण टि‍प्‍पणी की थी, जि‍सपर मैं सोचता ही रह गया था-

‘कभी किसी ने ये भी कहा था की लिखने वालो से मत मिलो वरना उनकी रचनायों से शायद उतना मोह नही रहेगा।‘

मैं एक नामी रचनाकार से बड़े अनौपचारि‍क माहौल में कि‍सी के फ्लैट पर मि‍ला था, उनका नामोल्‍लेख करना इसलि‍ए यहॉं जरूरी नहीं समझता क्‍यूँकि‍ इस खॉचें में अपना भी नाम डालने की सहूलि‍यत बचाए रखूँ और आपका भी। शराब के नशे में उसकी ऑंखें अंगारे की तरह दहक रही थी, और वो कुछ बड़े लोगों के नाम के साथ गालि‍यॉं लगाकर संबोधि‍त कर रहा था। मैं जि‍नके साथ गया था, इशारे से उनको जल्‍दी चल नि‍कलने के लि‍ए कहा। उसकी अन्‍य रचनाऍ भी मैंने पढ़ी थी, घर जाकर दुबारा पढ़ी कि‍ कोई इतनी अच्‍छी बातें कैसे लि‍ख सकता है!

सि‍गरेट पीने वाले एंटीस्‍मोकिंग कैम्‍पेन चला रहे हैं। नि‍शस्‍त्रीकरण के पैरोकार बेहि‍चक शस्‍त्र उठा रहे हैं। बाबा जी वैराग का प्रवचन दे रहे है, पर स्‍वयं घोर वासना में डूबे हैं। घर के पुरुष अपनी स्‍त्रि‍यों को पर्दे में रखने की कोशि‍श कर रहे हैं और दूसरों की स्‍त्रि‍यों को बेपर्दा कर रहे हैं। इस दोहरी जिंदगी से मुझे कोफ्त होती है। आपको भी जरुर होती होगी!

(इस पोस्‍ट को कि‍सी के संदर्भ में नही लि‍खा गया है, सप्रयास अन्यथा न लें)

Thursday, 25 September 2008

सर(दार)! आपकी क्‍लास है!

सर्दियों की गुनगुनी धूप में कॉलेज का मैदान मेले में तब्‍दील हो जाता था। लोग रंग-बि‍रंगे गर्म कपड़ों में चहलकदमी करते रहते थे। क्‍लास में बैठकर भी लोग बाहर की धूप में जाने के लि‍ए बेचैन लगते थे। सर को स्‍टाफ-रूम में जाकर याद दि‍लाना पड़ता था कि‍ सर(दार) आपकी क्‍लास है। वे पूछते थे-

हूँ..., कि‍तने बच्‍चे हैं?
सरदार दो बच्‍चे हैं।
हूँ..., दो बच्‍चे,
(चीखकर) सर के बच्‍चे!! तुम दो हो, बाकी 20 कहॉं हैं?
सरदार बाकी 20 तो धूप खा रहे हैं।

फि‍र भी क्‍लास के लि‍ए बुलाने आ गए, वो भी खाली हाथ(न कलम न कॉपी)
क्‍या समझकर आए थे कि‍ सरदार बहुत खुश होगा, शब्‍बासी देगा, क्‍यों!
धि‍क्‍कार है!!
[सरदार जेब से चश्‍मा नि‍कालता है और उसका शीशा रूमाल से साफ करने लगता है।]

अरे ओ शंभू (सफाईकर्मी)! कि‍तने पैसे देती है सरकार हमें पढाने को?
शंभू सीढ़ि‍यों पर चढ़कर पंखा साफ कर रहा है-
-पूरे 30 हजार!
-सुना! [सरदार चश्‍मा ऑखों पर चढ़ाते हुए कहता है]
पूरे 30 हजार!
और ये पैसे इसलि‍ए मि‍लते हैं कि‍ हम कॉलेज आँए और यहॉं स्‍टाफ-रूम की शोभा बढ़ायें, यहॉं की चाय पीकर प्‍यालों पर अहसान जताऍं।

यहॉं से पचास-पचास कोस दूर गॉव से जब बच्‍चा कॉलेज के लि‍ए नि‍कलता है तो मॉं कहती है बेटे मत जा, मत जा क्‍योंकि‍ सर(दार) क्‍लास लेने नहीं आएगा।
सरदार फि‍र चीख पड़ता है-
और ये दो शहजादे, इस कॉलेज का नाम पूरा मि‍ट्टी में मि‍लाए दि‍ए।
इसकी सजा मि‍लेगी,बराबर मि‍लेगी।
क्‍या रॉल-नम्‍बर है,
-आयें
सरदार चीखकर पूछता है- रॉल नम्‍बर बताओ!
छ: सर(दार)!
छ: रॉल-नम्‍बर है तुम्‍हारा!!
बहुत नाइंसाफी है ये! रजीस्‍टर लाओ!

सरदार रजीस्‍टर में दोनों के ऐटेंडेंस लगा देता है। एक बच्‍चा सरदार का मुँह देखने लगता है।
सरदार पूछता है अब क्‍या हुआ?
सर(दार) हम दरअसल तीन हैं, बसंती का भी एटेंडेंस लगा दो, वो बगीचे में आम तोड़ रही है।

सरदार नाराज हो जाता है, बसंती बगीचे में है और तुम कहते हो एटेंडेंस लगा दूँ। बच्‍चे कहॉं है, कहॉं नहीं, हमको नहीं पता! हमको कुछ नहीं पता!
इस रजीस्‍टर में 22 बच्‍चों की उपस्‍थि‍ति‍ और अनुपस्‍थि‍ति‍ दर्ज है। देखें कि‍से क्‍या मि‍लता है!
सरदार वीरु का नाम देखकर कहता है- बच गया साला।
फि‍र जय का नाम देखता है- ये भी बच गया।
तभी झोले में आम लि‍ए बसंती भी वहॉं आ जाती है।
सरदार उससे पूछता है- तेरा क्‍या होगा बसंती?

बसंती कहती है- सरदार! मैंने आपको अपना टीफि‍न खि‍लाया है सरदार।
अब आम खि‍ला।
कमाल हो गया, सबके ऐटेंडेंस लग गए- यह कहकर सरदार पागलों की तरह हॅसने लगता है, शंभु और बाकी बच्‍चे भी सरदार के सुर में सुर मि‍लाकर हँसने लगते हैं। हॅसते-हॅसते दि‍न कट जाता है और फि‍र सभी घोड़े पर सवार होकर घर के लि‍ए रवाना हो जाते हैं। सरदार पहले ऑफि‍स जाता है और अपना चेक लेकर तब कॉलेज से चेक-आउट करता है।