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Thursday, 21 August 2008

आओ भक्‍तजनों ! भगवान को बेचकर खाऍं !

जब कि‍सी दम्‍पत्ति‍ को औलाद नहीं होती तो वे दो-तीन जगह जाते हैं- डाक्‍टर के पास, ओझा-तांत्रि‍क के पास या अपने इष्‍ट देव की शरण में। मैं भी नौकरी के लि‍ए कई जगह भटका, पर बात नहीं बनी। मुझे अशांत देख मॉं ने कहा- पुत्र! आखरी उपाय है- भगवान की शरण में जाओ, मन शांत हो जाएगा। मेरे अंदर (देववाणी नहीं) दानववाणी प्रस्‍फुटि‍त हुई -
खाली जेब लि‍ए हाथ में माला।
भूखे भजन न होए गोपाला।

वैसे भी, मंदि‍र वगैरह को मैं शांति‍-स्‍थल नहीं मानता, क्‍योंकि‍ धार्मि‍क स्‍थलों को प्रभु-दर्शन के लि‍ए मैने युद्ध-स्‍थल बनते देखा है, भक्‍तों को गाली-गलौज करते देखा है। भगदड़ में लोगों को मरते देखा है। पंडि‍त-पुजारि‍यों को दान-पेटी से अपना पेट भरते देखा है। भक्‍त की शक्‍ल में छि‍पे उन भेड़ि‍यों को देखा है जो भीड़ के बहाने स्‍त्री-देह कुचलते हैं, चप्‍पल-जूते चुराकर बेचते हैं, जेबतराशी का काम करते हैं। कहीं सुना है, जहॉं वि‍श्‍वास होता है, वहीं वि‍ष का वास होता है और वहीं वि‍श्‍वासघात होता है। इस तरह मंदि‍र के सामने सारे पाप होते देखे हैं। गरीब और भीखमंगे सचमुच बेचारे होते हैं, यानी जि‍नके पास खाने को चारा तक नहीं होता। वे बोरा-चट्टी पर लाइन में बैठे होते हैं और अमीर अपनी कार से एक पैर बाहर नि‍कालकर गाय, बकरी, बंदर ढ़ूंढ रहे होते हैं। भूखे-नंगों की जमात इन जानवरों को हलवा-पूरी, केले आदि‍ खाते देखकर यही सोचती होगी कि‍ हमारा चारा तो कोई जानवर चर गया !
मंदि‍र अब भीड़ की पूंजी को भुनाने के एक सफल व्‍यवसाय के रुप में उभर रहे हैं। आपने देखा होगा, पंडित तभी ति‍लक लगाने की जहमत उठाएंगे जब दानपेटी की तरफ आपके हाथ उठेंगे। (जम्‍मू-कश्‍मीर में स्‍थि‍त) अमरनाथ में न पि‍घलनेवाली नकली शि‍वलिंग लगाना आस्‍था का नहीं, आयोजन का प्रतीक है, जहॉं चढ़ावे के लि‍ए भव्‍य मंच तैयार कि‍या जाता है। सुना है, अमरनाथ के तर्ज पर चेन्‍नई में एक नकली गुफा उन लोगों के लि‍ए तैयार की गई है, जो लंबी यात्रा से घबराते हैं, और घर बैठे अपने शहर में ही भोले भंडारी को देखना चाहते हैं। ये भाव वि‍ह्वल भक्‍त इस प्रकार ट्रस्‍ट का भंडार भरते हैं। वाह रे भोले के भक्‍तों ! भरते रहो इनका भंडार। इन डुप्‍लीकेट मंदि‍रों का धंधा वैसे ही चमक रि‍या है जैसे हीरो के डुप्‍लीकेट, हीरो के नाम पर चमक रहे हैं। लोग भी खुशी से दान-दक्षि‍णा करते हैं। कि‍सी व्‍यवसायी ने साई बाबा मंदि‍र के लि‍ए एक अरब रूपये दान कर दि‍ए। वैसे ज्‍यादातर लोग एक-दूसरे को लूटने-खसूटने के बाद भगवान को रि‍श्‍वत दे आते हैं- ताकि‍ स्‍वर्ग में उनकी एक सीट बुक हो जाए।
मेरे दोस्‍त मुझसे कहते हैं- भगत होकर ऐसे नास्‍ति‍क वि‍चार! क्‍या गजनी और गौरी की परंपरा पाई है ? अपने नाम का तो ख्‍याल कि‍या होता ! मैं सोचता हूँ नाम यदि‍ सार्थक हुआ करते तब ‘अमर’ नाम का व्‍यक्‍ति‍ कभी नहीं मरता, ‘सूरज’ नाम का व्‍यक्‍ति‍ कभी अंधेरे में जीने के लि‍ए मजबूर नहीं होता। खैर, नाम पर कभी अगली पत्री में लि‍खूंगा। मेरी पत्‍नी मुझे मंदि‍र साथ चलने के लि‍ए कहती है तब मैं खौफजदा हो जाता हूँ। वह मुझे घोर नास्‍ति‍क मानने लगी है। वह भगवद् भक्‍ति‍ में मंदि‍र जाती है, मैं पत्‍नी भक्‍ति‍ में। समझ नहीं आता क्‍या करुं! हे भगवान ! या तो ऐसे लोगों को सद् बुद्धि‍ दो या मेरी बुद्धि‍ भ्रष्‍ट कर दो!
हैरत होती है लोगों की आस्‍था से। पर कहते हैं न, कि‍सी की आस्‍था से नहीं खेलना चाहि‍ए, ये बड़ी मारक होती है, हाय लग जाती है। अगर भगवान मंदि‍र में बसते हों तो खुदा खैर करे, भक्‍तों को मंदि‍रवाले भगवान से दूर करने का पाप मैं अपने सर नहीं लेना चाहता !

(अगली पोस्‍ट में बताउंगा कि‍ शांति‍ की तलाश में पि‍छला एक हफ्ता मैं कहॉं रहा! )

4 comments:

Udan Tashtari said...

हम भी वही पूछ लेते हैं: भगत होकर ऐसे नास्‍ति‍क वि‍चार!!

राज भाटिय़ा said...

भगत जी, नमस्कार भाई मुझे पहली बार एक आदमी ऎसा मिला जो मेरी तरह से सोचता हे, वरना तो मुझे शक हो रहा था सभी दिन रात मंदिर जाते हे, ओर मे..
मेने आज तक बीबी को नही रोका, कई बार उस के साथ चला भी गया, लेकिन सिर्फ़ तन से मन से नही,हरिदुवार गया लेकिन गगां मे नही नहाया, नास्तिक नही हु
मजा आ गया आप की पोस्ट पढ कर, एक एक शवद मेरा लिखा हे आप ने, मेरे दिल की बात
धन्यवाद

Anil said...

आस्था भगवान में रखें, न की उसके प्रतीकों में.

जितेन्द़ भगत said...

अनि‍ल जी, इस लेख में मेरा प्रहार प्रतीकों पर ही है, मैं सदभावना और सदाचार को ही भगवान का रूप मानता हूँ और इसपर मेरी पूरी आस्‍था है।