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Friday, 24 April 2009

चलो बुलावा आया है......

धर्म के बहाने यात्रा या यात्रा के बहाने धर्म का नि‍बाह हो जाना अच्छा लगता है। अगर धार्मिक स्थल पर भीड़ अपेक्षा के बि‍ल्कुल वि‍परीत हो, तो इसका भी अपना आनंद है। मैं बात कर रहा हूँ, वैष्णों देवी (जम्मू) की यात्रा की। कल शाम ही लौटा हूँ, शरीर पूरी तरह थकान से उबरा नहीं है। वि‍स्तृत वि‍वरण एक-दो दि‍न में पोस्ट करुँगा, फि‍लहाल आप सबको जय माता दी !!

Tuesday, 14 April 2009

आपने बि‍याह कि‍या है या वि‍वाह !!

बेरोजगारी को आवारगी से जोड़कर देखा जाता है, इसलि‍ए कई मॉं-बाप अपने बच्चे को गॉव के पोखर के पास नीम तले ताश खेलते देख चिंति‍त होते रहते हैं। बूढ़ी काकी लड़के की अम्मा को सजेशन देती है-बेलगाम बैल को खूँटी से बॉधकर रखना है तो उसकी शादी करा दो।
शहर में लोग नोकरी ढूँढने जाते हैं, पर छोकरी ढूँढ लाते हैं। मेरे एक मि‍त्र लंबे समय से किसी नौकरी की तलाश में हैं, उम्र 38 के पार हो चली है, पर उनकी नइय्या मझधार में ही है। स्थायी नौकरी के इंतजार में उनके जीवन का हनीमून उदय होने से पहले ही अस्त हो चला है, जनसंख्या वृद्धि‍ के असहयोग आंदोलन के वे प्रणेता नहीं है, मगर ‘ऑफ दी स्क्रीन’ उनकी भूमि‍का इनसे कम भी नहीं है।
दूसरी तरफ, मेरी एक मि‍त्र है, उनकी नौकरी तब लग गई थी जब हमारे खेलने-खाने के दि‍न थे, यानी बारहवीं पास करते ही वे स्थायी नौकरी संग वि‍दा हो ली थी। अब संकट ये है कि‍ उनके पास नौकरी तो है, मगर नौकर नहीं है, माफ कीजि‍एगा, शौहर नहीं है। वह अक्सर परेशान रहती, मुझसे कहा करती- यार सब-कुछ है, मगर घरवालों को चैन नहीं है, मेरी शादी के लि‍ए एक ढ़ंग का लड़का(?) तक नहीं है। तुम खुशनसीब हो, तुम्हारे पास बीवी है, बच्चा है, मेरे पास क्या है? मैंने कहा- तुम्हारे पास एक स्थायी नौकरी है और सबको पता है कि‍ एक स्थायी नौकरी कि‍सी पति‍ से ज्यादा वफादार साबि‍त होती है।
तो इन्होंने अपनी नौकरी करते हुए मनी नामक ‘हनी’ काफी इकट्ठी कर ली है, पर ‘मून’ से वंचि‍त रह गई हैं। ऐसा नहीं है कि‍ इनकी हनी के पास मधुमक्खि‍यॉं न मंडराती हो, मगर इन्होंने कभी उन्हें पर भी मारने नहीं दि‍या। खैर, हमें भी इंतजार है कि‍ इनकी शादी में दि‍या जानेवाला उपहार कि‍स दि‍न उसके तारनहार तक पहुँचेगा, बेचारे पॉंच-छ: साल से यूँ ही पैक्ड पड़े हैं।
तो मैं अपने उस अवि‍वाहि‍त मि‍त्र से बेरोजगारी पर जि‍क्र कर रहा था कि‍ जैसा हाल चल रहा है, उसमें इंतजार की कोई सीमा नहीं है, मगर उम्र की एक सीमा है, शादी-वादी करके नि‍पट लो, नौकरी देर की गाड़ी पर सवार होकर तुम तक पहुँच ही जाएगी।
मेरे मि‍त्र ने कहा- हमारे यहॉं एक कहावत है- नौकरी से पहले की गई शादी को ‘बि‍याह’ कहते हैं यानी ‘आह’ ! और नौकरी के बाद की गई शादी को ‘वि‍वाह’ कहते हैं यानी ‘वाह’ ! अब तुम ही बताओ मि‍त्र, ‘आह’ में दि‍न गुजारे या ‘वाह’ में।
मैंने कहा- गमले में अकेले पनपने की कोशि‍श कर रहे हो, कुम्हला जाओगे, बगीचे में शामि‍ल हो जाओ तो शायद लह (पनप) जाओगे। आवेदन पर 'मैरि‍ड' लि‍खो या 'सिंगल'- वह तो तकदीर और सि‍फारि‍श से ही मि‍लेगी।
खैर इस उमर में समझना-समझाना सब बेकार होता है। मसला ही ऐसा है। आज न जाने कि‍तने युवक-युवती नौकरी की तलाश और इंतजार में जी रहे हैं और उम्र के चौथे दशक में अकेले चले जा रहे है। मुझे तो डर है कि‍ हम भवि‍ष्य की ऐसी पीढ़ी का नि‍र्माण करने जा रहे हैं, जहॉं बाप एक तरफ अपना 70 वॉं जन्म -दि‍न मना रहा होगा दूसरी तरफ उसके बेटे या बेटी की शादी की बात चल रही होगी। ऐसे ‘वि‍वाह’ से तो ‘बि‍याह’ ही अच्छा !!

(चि‍त्र गूगल दादा से उधारी)

Friday, 3 April 2009

राह से गुजरते हुए.......

अजनबी हो जाने का खौफ
बदनाम हो जाने से ज्यादा खौफनाक है।
अकेले हो जाने का खौफ
भीड़ में खो जाने से ज्यादा खौफनाक है।

कि‍सी रास्ते् का न होना
राह भटक जाने से ज्यादा खौफनाक है।
तनाव में जीना
असमय मर जाने से ज्या‍दा खौफनाक है।

इनसे कहीं ज्यादा खौफनाक है-
आसपास होते हुए भी न होने के अहसास से भर जाना.........

-जि‍तेन्द्र भगत

( चाहा तो था कि‍‍ ब्लॉग पर नि‍रंतरता बनाए रखूँ, पर शायद वक्त कि‍सी चौराहे पर खड़ा था, जहॉं से गुजरनेवाली हर सड़क मुझे चारो तरफ से खींच रही थी, वक्त‍ के साथ मैं भी बँट-सा गया था...... आज इतने अरसे बाद वक्त ने कुछ यादें बटोरने, कुछ यादें ताजा करने की मोहलत दी है, अभी तो यही उम्मीद है कि‍ वक्त की झोली से कुछ पल चुराकर इस गली में आता-जाता रहूँगा। )