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Sunday, 16 November 2008

मारे गए संकोच में !!

त्‍योहारों पर उपहार/मि‍ठाई बॉंटने की परंपरा है, लेकि‍न मेरे शोध-नि‍र्देशक इस अवसर पर भी उपहार देने के लि‍ए मना करते हैं। पर यदि‍ काफी समय बाद जाओ और मौसम भी त्‍योहारों का हो तो सर के पास खाली हाथ जाना अजीब लगता है।
तो एक बार त्‍योहार के अवसर पर मैं मि‍ठाई का एक डि‍ब्‍बा लेकर सर के घर गया, सर अपने कमरे में काम कर रहे थे और दरवाजा नौकरानी ने खोला। हाथ में मि‍ठाई पकड़ाने पर डॉंट सुनना तय था, इसलि‍ए मैंने यह सोचकर मि‍ठाई का डि‍ब्‍बा मेज पर रख दि‍या कि‍ जाने के बाद सर को पता तो चल जाएगा कि‍ यह डि‍ब्‍बा जि‍तेन दे गया है।
मैं सर के पास कमरे में चला गया। वहीं काफी देर बातें होती रही। तभी डोर-बेल बजी, नौकरानी कि‍चन में व्‍यस्‍त थी, इसलि‍ए मैं दरवाजा खोलने चला गया। आगंतुक मेरे सर का कोई करीबी था और उपहार के तीन-चार पैकेट लेकर आया था। उसने वो पैकेट मेरे मि‍ठाई के डि‍ब्‍बे के बगल में लाकर रख दि‍या।
>तभी सर भी ड्रॉइंग रूम में आ गए और आगंतुक को स्‍नेह से डॉंटने लगे कि‍ उपहार क्‍यों लाए। मेज काफी भरी-भरी सी लगनी लगी, सर ने नौकरानी को आवाज दी कि‍ ये पैकेट कि‍चन में ले जाए। मैं मन ही मन ये सोचकर दुखी हो रहा था कि‍ इतनी अच्‍छी मि‍ठाई खरीदकर लाया, मगर वह आगंतुक के नाम पर कि‍चन में रख दी गई।
सर के हाथ में डि‍ब्‍बा नहीं पकड़ाने का मतलब यह तो नहीं था कि‍ उनको मेरे उपहार का पता भी नहीं चले। मैं चाहता था कि‍ सर आज मुझे डॉंट ही दें कि‍ तुमने डि‍ब्‍बा लाने की गल्‍ती तो नहीं की है, पर सर ने न डॉंटा न ही पूछा.... वहाँ से लौटते हुए मैं बड़ा उदास था। 


U टर्न  :सोचता हूँ त्‍योहारों पर मि‍ठाई का सि‍र्फ डि‍ब्‍बा ले जाऊँ, मि‍ठाई नहीं:)

Monday, 10 November 2008

प्‍ले-स्‍कूल का प्‍ले !!

हम अपने बच्‍चे को बड़ी आस से प्‍ले-स्‍कूल भेजते हैं कि‍ वहाँ वे शहरी परि‍वेश और तरह-तरह की गति‍वि‍धि‍यों से परि‍चि‍त होंगें। हमारे मन में ये भावना होती है कि‍ घर के भीतर घरेलू चर्चा-कुचर्चा से बच्‍चों पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। लेकि‍न क्‍या प्‍ले-स्‍कूल का माहौल दोस्‍ताना होता है, जैसा कि‍ वहॉं की लैडी-प्रिंसीपल जि‍स लल्‍लो-चप्‍पो अंदाज में बात करती है-यहॉं यह आपका बच्‍चा नहीं, मेरा है और मैं इसकी देखभाल कि‍सी माँ से कम नहीं करूँगी।
(MY SON)

देखता हूँ, वहॉं खि‍लौनों से भरा एक कमरा है, साथ ही एक कम्‍प्यूटर रूम भी। मैं सोचता हूँ चलो, मेरा बच्‍चा एक साथ इतने खि‍लौनों से खेल लेगा, और कम्‍प्‍यूटर पर भी खटर-पटर कर लेगा। ट्रायल बेसि‍स पर अपने बच्‍चे को मेड (कामवाली) के साथ छोड़ देता हूँ। वैसे तो नामी-गि‍रामी प्‍ले स्‍कूल में बच्‍चे के साथ ‘मेड’ को नहीं भेजा जाता है, मगर बच्‍चा यदि‍ ज्‍यादा छोटा हो, यानी दो साल से छोटा, तो ट्रायल बेसि‍स पर दो-चार हफ्ते मेड को भी साथ भेजने की छूट मि‍ल जाती है। हफ्ते-भर बाद मेड की बातों से जो हमने नि‍ष्‍कर्ष नि‍काला, वह बेहद नि‍राशाजनक था-
उस प्‍ले स्‍कूल की अपनी सि‍र्फ दो नौकरानि‍यॉं थी, जि‍नका काम था- झाड़ू-पोछे के साथ-साथ बच्‍चों की पोटी-सूसू साफ करना, बच्‍चों को खाना देना व खि‍लाना। तो वे सूसू पोटी करने पर बच्‍चों को पीटा करती थीं, कि‍ मॉंएं अपने घर से ये भी कराकर नहीं भेजती।
एक हफ्ते बाद भी खि‍लौने अपनी जगह पर ही डटे हुए थे, यानी कि‍सी बच्‍चे को उससे खेलने नहीं दि‍या जाता था। बच्‍चे को ब्रेड पकौड़े और ऐसा ही अन्‍य तेलीय भोजन कराया जाता था। हफ्ते में एक-दो बार तो लंच के नाम पर सि‍र्फ आधा केला खि‍लाकर खानापूर्ति कर देते थे। सबसे बुरी बात थी कि‍ 5-7 बच्‍चों को एक ही ग्‍लास से जूठा पानी ही पि‍ला देती थी। यहॉं हाईजीन का कोई ध्‍यान नहीं रखा जाता था। कि‍सी बच्‍चे को खॉसी, कि‍सी को जुकाम, कि‍सी को कुछ और बीमारी होती थी, मगर उन्‍हें साथ ही रखा जाता था। कोई बच्‍चा रोता था तो बाकी बच्‍चे भी उसी सुर में चालू हो जाते थे, तब नौकरानि‍यॉं परेशान होकर पीटने लगती थीं। वहॉं की टीचर और नौकरानि‍यॉ अक्‍सर मेरी मेड को कहती थी कि‍ जरा दूसरे बच्‍चों को भी देख ले, सूसू करा ले। जो लड़कि‍यॉं ग्रेजुएट हैं या शायद सि‍र्फ 12वीं पास, मगर अंग्रेजी में फर्राटेदार, उन्‍हें पढ़ाने(?) के लि‍ए रखा जाता है। हर बच्‍चे से 1500 से 5000 रूपये मासि‍क ऐंठनेवाले ये स्‍कूल 20-25 बच्‍चों के लि‍ए 5 नौकरानी भी नहीं रख सकते तो समझ सकते हैं कि‍ इन्‍हें बच्‍चों के भवि‍ष्‍य की नहीं, अपने भवि‍ष्‍य की अधि‍क चिंता है।
तो मि‍ला-जुलाकर सारी चीजें बाजार में एक डि‍सप्‍ले की तरह आकर्षक रखी जाती है, जि‍से देखकर बुढ़ापे में आप सि‍र्फ इतना संतोष कर सकते हैं कि‍ आपने अपने बच्‍चों को पढ़ाने में कोई कसर नहीं रखी (चाहे स्‍कूल में ही सारी कसर रह गई हो)।

शहरों में प्‍ले-स्‍कूल का चलन बढ़ रहा है, मॉं-बाप इसे फैशन के तौर पर अपना रहें हैं। बच्‍चे को इससे सीधे तौर पर क्‍या लाभ मि‍लता है, मैं साफ-साफ तो नहीं जानता। एक अनुशासन के तहत मि‍लनसार बनाने की मानसि‍कता ने माता-पि‍ता को इन्‍हें उस उम्र में स्‍कूल में डालने के लि‍ए प्रेरि‍त/मजबूर कि‍या है, जि‍स उम्र में वे खुद माटी की सोंधी महक में प्रकृति‍ का आनंद ले रहे थे और अनायास ही सहज जीवन जीने की खुशी और आजादी महसूस कर रहे थे। अफसोस कि‍ भौति‍क दौड़ में आगे रखने की होड़ में हमने अपने बच्‍चों से ये आजादी छीन ली है।

Wednesday, 5 November 2008

शुक्र है, उनके हाथ में पि‍स्‍तौल नहीं थी!!

सर्दि‍यों की रात थी, मैं करीब आठ बजे अपनी मोटर-साईकि‍ल से शक्‍ति‍नगर चौक से गुजर रहा था। मुझे एक जरूरी फोन करना था और मेरे पास मोबाइल नहीं था इसलि‍ए मैं एक टेलीफोन-बूथ के सामने रूका। हैलमेट उतार ही रहा था कि‍ संभ्रांत घरों के कुछ लड़के आसपास से दौड़ते हुए नि‍कले, कुछ लड़के बूथ के सामने ही खड़े होकर परेशान-हैरान-से बातें करने लगे-

‘’भाई, तू घबरा मत, तेरे को कुछ नहीं होगा। राहुल, करण भी तेरे साथ हैं। प्रि‍या का फोन आया था, वह भी साथ देने के लि‍ए तैयार है, बस तू हौसला रख। रोहन का दि‍माग आज ही ठीक कर देंगे, लौटेगा तो इसी रास्‍ते से ना! चार लड़के साथ क्‍या कर लि‍ए उस *** ने, शेर बन रहा है !’’
उन लड़कों की बातचीत और हरकतों से लग रहा था जैसे टपोरी और संभ्रांत लड़कों के बीच पहनावे के सि‍वा और कोई फर्क नहीं है। मैंने गौर से देखा, जि‍स लड़के को हौसला बंधाया जा रहा था, उसका चमन उजड़ा-सा लग रहा था, चेहरे पर चोट के भी नि‍शान नजर आ रहे थे, ठंड के बावजूद वे सभी पसीने से तर-बतर थे। उनके बीच बेचैनी और अफरा-तफरी का माहौल साफ नजर आ रहा था।
‘‘जाकर बाइक ले आ, अभी देखकर आता हूँ कि‍ कहॉं गया है *** ‘’
बात-बात में उनके मुँह से गाली ऐसे झर रहा था, जैसे पतझर में पत्‍ते झरते हैं। इससे पहले कि‍ मैं समझ पाता कि‍ मामला क्‍या है, उसमें से एक लड़का आव देखा न ताव, सीधे मेरी बाइक की तरफ लपकते हुए बोला-

‘’भाई दो मि‍नट के लि‍ए मुझे बाइक देना, मैं अभी आया।‘’
मैं बाइक से तबतक उतरा भी नहीं था, मैंने कहा-

‘’मुझे दूर जाना है और मैं पहले ही लेट हो चुका हूँ।‘’
पर उसे मेरी बात सुनाई कहॉ दे रही थी, उसपर तो मानों जुनून सवार था। लफंगों की इस बौखलाई जमात में मुझे यह कहने की हि‍म्‍मत नहीं पड़ी कि‍ तेरे बाप की बाइक है जो तूझे दूँ। इससे पहले कि‍ मैं स्‍टार्ट कि‍क लगाता, उसने बाइक की चाबी नि‍काल ली।
जब दि‍ल्‍ली ट्रैफि‍क पुलि‍स चालान के लि‍ए बाइक रूकवाती है तो सबसे पहले चाबी कब्‍जे में लेती है क्‍योंकि‍ बाइकवाले पतली गली से नि‍कलने में माहि‍र होते हैं, इस तरह तो मेरी चाबी जब भी जब्‍त हुई है, चालान देकर ही छुटी है। पर आज चालान का मामला नहीं है।

वह लड़का मेरी चाबी लेकर अपने साथि‍यों के साथ तय करने लगा कि‍स तरफ जाऊँ। मेरी जान सांसत में थी, मैंने कहा- ’’भई आपको जहॉं जाना है मैं वहॉं छोड़ देता हूँ।‘’
उन्‍हें फि‍र कुछ सुनाई नहीं पड़ा। वे सुनने के लि‍ए नहीं, सि‍र्फ बकने के लि‍ए जो इकट्ठा हुए थे। मैंने कहा-
‘’अगर चाबी नहीं दोगे तो मैं तुम लोगों की शि‍कायत थाने में कर दूँगा।‘’
उनमें से ये बात कि‍सी को सुनाई पड़ गई, वह तपाक से मेरी तरफ आया और गुर्राते हुए बोला-
’’कर फोन कि‍सको करेगा, डी.सी.पी. को, एस.पी. को या एस.आई. को ? ऊपर से नीचे तक सब मेरे रि‍श्‍तेदार हैं। जा लगा फोन, बैठा क्‍या है! ओय इसकी बाइक की चाबी मुझे दे जरा!’’

एक आम आदमी, जि‍सकी कोई ऊँची जान-पहचान नहीं है, यह सुनकर जैसे सकते में आ जाता है, वैसे मैं भी आ गया। उसने चाबी लेकर अपने जेब में डाल ली, मैं बाइक पर असहाय-सा बैठा यह सोचता रहा कि‍ कि‍सी का गुस्‍सा कि‍सी पर लोग कैसे उतारते हैं। उन नवाबजादों को आपस में बात करते हुए ख्‍याल भी नहीं था कि‍ अपनी लड़ाई में उन्‍होंने मुझे कि‍स तरह, बेवजह शामि‍ल कर लि‍या है।

मैं रह-रहकर उन्‍हें टोकता रहा कि‍ भई मुझे दूर जाना है, चाबी दे दो। मन ही मन खुद को कोसता भी रहा कि‍ क्‍यों फोन करने के लि‍ए यहॉं रूका! पर मुसीबत दस्‍तक देकर नहीं आती, वह न जगह देखती है न समय!

इस बीच मैं यही सोचता रहा कि‍ अमीरजादों की ये नस्‍लें महानगरीय अपसंस्‍कृति‍ की ऊपज है, जि‍नके बाप ने इतना काला धन जोड़ रखा है कि‍ उन्‍हें अपने कपूतों के लि‍ए भी कुछ करने की जरूरत नहीं है। पर कुछ-न-कुछ तो करना जरूरी होता है इसलि‍ए ये मारा-मारी, लड़कीबाजी में ही दि‍न खपातें हैं और इस झगड़े की जड़ में भी शायद वही बात थी। ऐसे अमीरजादों को‍ चोरी-डकैती में जो थ्रील मि‍लता है, वह पढ़ाई में कहॉं मि‍ल सकता है! तो सब तरह के दुराचार में ये भी लि‍प्‍त होते हैं। ऐसे बच्‍चों के बाप इनपर ये सोचकर अंकुश नही लगाते कि‍ उन्‍होंने अपनी जवानी में यही गुल तो खि‍लाए थे!
अचानक वे लड़के आगे चल पड़े। मैंने उन्‍हें याद दि‍लाया कि‍ चाबी उनके पास रह गई है। करीब आधे घंटे की इस तनावपूर्ण मन:स्‍थि‍ति‍ के बाद चाबी लेकर मैं वहॉ से नि‍कल पड़ा। मैं यही सोचता जा रहा था कि‍ उनके हाथ में पि‍स्‍तौल नहीं थी, वर्ना ऐसे मामलों में बेगुनाहों की खैर नहीं होती!

इस तरह की घटना 21वीं सदी के महानगर की एक नई पीढ़ी की दि‍शाहीनता को दर्शाता है। यह भी तय है कि‍ आने वाले समय में यह घटना महानगरों के लि‍ए एक आम शक्‍ल अख्‍ति‍यार कर लेगी। हम ऐसे समाज में ही जीने के लि‍ए अभि‍शप्‍त हैं और इसके समाधान की संभावनाओं का गुम होना दुखद है।