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Monday, 19 January 2009

घि‍से हुए जूतों की दास्‍तान !!

(I)
मेरी चमड़ी पर कई झुर्रियाँ पड़ गई हैं, कमर भी झुक गई है। मेरे फीते की धज्‍जि‍यॉं भी उड़ गई हैं। मेरी आत्‍मा (सॉल) लगभग घिस चुकी है, उसके परखच्‍चे बस उड़ने ही वाले हैं। अपनी उम्र से ज्‍यादा मैं जी चुका हूँ। सन् 2004 की होली में मैंने मालि‍क के पैरों को आसरा दि‍या था, 2009 की होली अब आनेवाली है, पर मेरा मालि‍क आज भी मेरी अटकी हुई सॉस को रोकने की बेतरह कोशि‍श कर रहा है।
मुझे आज भी याद है, जब मेरा मालि‍क दूल्‍हा बना था, शादी के मंडप से दो कुड़ि‍यॉं मुझे छि‍पा ले गई थीं। और उस दि‍न का तो क्‍या कहना, जब मेरे मालि‍क को लड़का हुआ था, चाहता तो था कि‍ पालने तक जाऊँ, लेकि‍न हम लोगों की तकदीर ही कुछ ऐसी है, शुद्ध और स्‍वच्‍छ स्‍थानों से हमें दूर ही रहना पड़ता है, चाहे मंदि‍र हो या अस्‍पताल।
वैसे तो मेरे पूर्वजों का इति‍हास अत्‍यंत गौरवशाली रहा है। महाराज भरत ने श्रीराम के खड़ाऊ को पूज्‍य बनाकर मेरे पूर्वजों को जि‍तनी इज्‍जत बख्‍शी, ऐसा उदाहरण वि‍श्‍व में कहीं नहीं मि‍लता।
एक बार मेरे मालि‍क सड़क से गुजर रहे थे, मैंने देखा कुछ लोग मेरे सहोदरों को हाथों में लेकर दूसरे आदमी को पीट रहे थे। मुझे ऐसे लोगों से चीढ़ है जो चीजों का गलत इस्‍तमाल करते हैं। जूते की शोभा पैरों में ही है, कहीं और नहीं। कई बार तो मेरी माला बनाकर मुझे भी गधे नामक जंतु की सैर करा दी जाती है। कहीं कि‍सी मंच पर कुछ भी गड़बड़ हो, मेरे सहोदरों को ही उठा-उठाकर फेंका जाता है। अभी बीते महि‍ने की बात है, मेरे वि‍देशी मि‍त्र को कि‍सी ने बुश पर दे मारा।

गर्मी, सर्दी, बरसात - न जाने क्‍या-क्‍या झेले हैं मैंने। नदी, पर्वत, आकाश - न जाने क्‍या-क्‍या नापे हैं मैंने। मुझे नौकरी पर रखनेवाला मेरा मालि‍क बेचारा खुद पक्‍की नौकरी की जुगत में रहा। समय के अभाव के बावजूद उसने बराबर मेरा ख्‍याल रखा, सुबह बड़े चाव से मेरे चेहरे को चमकाता और रात को गहरी थकान के बावजूद मुझे इधर-उधर फेंकने की भूल नहीं करता। सोचा था मालि‍क को पक्‍की नौकरी मि‍लते ही मुझे रि‍टायरमेंट मि‍ल जाएगी, पर मालि‍क पर जि‍म्‍मेदारी दि‍नोंदि‍न बढती गई और मुझे ओवरटाइम तक करना पड़ा।

मजे की बात बताऊँ, मालि‍क मेरे बि‍ना रह नहीं सकते, कहीं आ-जा नहीं सकते, ट्रेन के सफर में मैं उनसे बि‍छुड़कर कि‍सी और के पैरों की शोभा न बढ़ाऊँ, इसलि‍ए अपने पास थैले में डालकर सोते हैं। मेरी चिंता में इन्‍होंने मंदि‍र जाना तक छोड़ दि‍या है, अगर जाते भी हैं तो बाहर से खड़े-खड़े ही नमन कर लेते हैं
कभी-कभी सोचता हूँ दुनि‍या में जि‍तने भी प्रेमी हुए हैं, अक्‍सर रोमि‍यो-जूलि‍यट, शीरी-फरहाद, लैला-मजनू, चंदा और चकोर की कस्‍में खाते देखे गए हैं, लेकि‍न क्‍या कि‍सी ने हमारी जोड़ि‍यों की कसम खाई है ??

(II)
लोग मेरे मालि‍क को कहते हैं यार तेरा जूता तो काफी चल गया!! मैं पूछता हूँ ये तारीफ है या ताना !! एक आदमी ने पक्‍की नौकरी के इंतजार में छ: साल मेरे साथ गुजार दि‍ए जबकि‍ ऐसे भी लोग हैं जो साल-छ:महि‍ने में जूते बदल लेते हैं।

नए जूते खरीदना कोई मुश्‍कि‍ल नहीं है, पर मेरे मालि‍क को आज की रवायतों का ठीक-ठीक अंदाजा नहीं है, वर्ना वे इस भरोसे या भ्रम में न जीते कि‍ पक्‍की नौकरी मि‍लते ही नए जूते ले लूँगा। अलादीन के चि‍राग और मुझमें कुछ तो फर्क होता है न!!

जि‍स तरह पलकें आखों पर बोझ नहीं होती, उसी तरह मेरे मालि‍क ने भी मुझे कभी बोझ नहीं माना, बल्‍कि‍ हमेशा अपने पथ का साथी माना है, मेरी जर्जर काया के बावजूद उनका मोह मुझसे नहीं छुटा है। बस एक ही गुजारि‍श है इनके वि‍भाग के वरि‍ष्‍ठ प्रोफेसरों से, मुझे अपने मालि‍क से नि‍जात दि‍लाने का कुछ जतन करो। पक्‍की नौकरी देकर इसकी एड़ि‍यों को भी नए जूते का सुख भोगने दो। घि‍से हुए जूते को पॉलि‍श से कब तक छि‍पाता रहेगा मेरा मालि‍क !! छ: साल कम नहीं होते हैं..... आदमी घि‍स जाता है, मैं तो अदद एक जूता हूँ।

Monday, 12 January 2009

‘’डॉन्‍ट बी संतुष्‍ट, थोड़ा और वि‍श करो’’

चीजें हासि‍ल होने के बाद धीरे-धीरे उसका सम्‍मोहन टूटने लगता है। दुनि‍या जि‍स तेजी से बदल रही है, स्‍वाद और जरू‍रतें जि‍स तेजी से बदल रही है, उसकी गति‍ का अंदाजा लगाना आसान नहीं है। 1984-85 में हॉस्‍टल के प्रार्चाय के पास टी.वी रि‍मोट देखा था जो दस मीटर की दूरी से उसे बंद कर देते थे, तब इतनी हैरानी हुई थी कि‍ जैसे पी.सी.सरकार का जादू देख लि‍या हो! 2001 में जब मोबाइल हाथ में लि‍या था तो हैरान होता था कि‍ न तार है न कोई एंटीना, आवाज पहुँच कैसे रही है! जैसे कल की ही बात हो, मैं अपनी मॉं को मोबाइल पर डायल करना, कॉल रीसीव करना आदि‍ सीखा रहा था। और पि‍छले दि‍नों, जब एक रि‍श्‍तेदार के घर गया तो पॉच-सात रि‍मोट देखकर घबरा गया कि‍ टी.वी. कि‍स से चलाऊँ! तब 10-12 साल का एक बच्‍चा बताने लगा कि‍ ये ए.सी. का रि‍मोट है, बाकी डी.वी.डी., टी.वी., टाटा स्‍काई, फैन, म्‍यूजि‍क सि‍स्‍टम आदि‍ के रि‍मोट हैं। मैं अपनी मॉं की तरह अवाक् सुनता रहा! और यह सोचता रहा कि‍ अप-टू- डेट न होने की पीड़ा क्‍या होती है। जब 1999 में विंडो 98 कम्‍प्‍यूटर खरीदा था, तब हम सभी खुद को समय के साथ चलने के भ्रम में जीए जा रहे थे। लगता था जैसे बड़े एडवांस हैं, अगले कुछ सालों में विंडो एक्‍स.पी. आ गई, उसे बेचकर ये ले लि‍या, कि‍ तभी वि‍स्‍टा चल पड़ी।
भौति‍क चीजों घि‍राव हम लोगों पर इस कदर हावी हो चुका है कि‍ हम उसके बि‍ना जीवन की संभावनाओं का अंत मानने लगते हैं। इसलि‍ए आजकल ए.एम.सी. कराकर चिंतामुक्‍त रहना चाहते हैं। बेचैनि‍यों के कई उदाहरण हैं, कम्‍प्‍यूटर पर नेट नहीं चलता तो हम सर्विस प्रोवाइडर को बेचैन होकर फोन लगा देते हैं, बि‍जली गुल हो जाती है तो ठंडे पानी में नहाने के नाम से सि‍हर उठते हैं, पेट्रॉल मि‍लना बंद हो जाए तो हमारी नौकरी खतरे में पड़ने लगती है, मोबाइल घर पर छूट जाए तो हम 10 कि‍.मी. वापस लौटकर आते हैं, गुम हो जाए तो तुरंत नए की जुगाड़ में बेचैन हो उठते हैं।
क्‍या हमने अपने आपको इतना व्‍यस्‍त कर लि‍या है या जीवन की जटि‍लताओं की यह अनि‍वार्य मांग है, जि‍से टाला नहीं जा सकता। शांति‍ चीजों को हासि‍ल कर लेने में है या उसके सम्‍मोहन से मुक्‍त रहने में। शांति‍ अपनी जरूरतों को कम करने में है अथवा हर जरूरत को पूरा कर लेने में है।
इन सवालों का जवाब देना आसान नहीं है। जो आज जि‍स मुकाम पर हैं, उन्‍होंने अपने आपको झोंककर उसे हासि‍ल कि‍या है या अभी भी संघर्षरत हैं। यह इति‍हास की गति‍ है, चक्र है, जो अब शायद तेजी से घूम रहा है, उसे रोकने या धीमा करने का प्रयास या वि‍चार नि‍रर्थक है, वह व्‍यक्‍ति‍ के अपने जीवन-चक्र पर ही जाकर समाप्‍त हो सकता है, उसमें पीसते हुए, घि‍सते हुए, रि‍सते हुए........ और यह बात खासकर दुनि‍या के उस तबके पर लागू होती है, जि‍न्‍होंने रोटी के लि‍ए ज्‍यादा संघर्ष कि‍या है।

Saturday, 10 January 2009

याद आती रही......

सर्दियों में कुहासे की चादर ओढ़े सुबह की धूप जैसे रेशम-सी नरम होती है, कि‍रणों के रेशे-रेशे में गरमाहट की जैसे एक आहट होती है, वैसे ही इस गॉंव की याद मन में एक कसक के साथ मौजूद रही। जब भी मैं अकेला हुआ, मुझे महसूस होता रहा कि‍ कुछ छूट रहा है........ रह-रहकर आपलोगों की याद आती रही।
ऐसा लग रहा था, जैसे बि‍न बताए घर से नि‍कल गया हूँ परदेश में, अब घर आते हुए महसूस हो रहा है कि‍ कि‍तने समय से बाहर था। गॉंव कि‍तना बदल गया होगा, कई नये लोग आकर बसे होंगें। कई नए घर बने होंगें। कुछ लोगों ने अपना घर ठीक कि‍या होगा, उसे नई तरह से सजाया होगा, कई तरह से सजाया होगा.... कुछ लोग मेरी तरह घर छोड़कर नि‍कल गए होंगे, कुछ लोग चाहकर भी घर नहीं लौट पाए होंगे,...... पर खतों ने गॉव की याद को भूलने न दि‍या........ और इस तरह मैं बरबस लौट आया।
बीते साल कई चीजें नि‍पटाकर आया हूँ। इससे पहले कि‍ उमर के इस पड़ाव पर कुछ कर गुजरने की चाहत दम तोड़ने लगे, मनमाफि‍क मंजि‍ल को पा लेने की तड़प दि‍ल पर बोझ लगने लगे, जीने का हौसला बरकरार रखना चाहता हूँ। नया साल इसी जोश के साथ शुरू कर रहा हूँ।
कुछ देर से ही सही, आप सभी को नए साल की हार्दिक शुभकामनाऍं। आपके घर धमकने ही वाला हूँ कि‍ नए साल पर आपने अपने घर को कि‍स तरह संवारा है
(आप सबकी दुआओं और मशवरों का तहे दि‍ल से शुक्रगुजार हूँ। दि‍सम्‍बर 08 के मध्‍य में दि‍ल्‍ली स्‍थि‍त इस्‍कोर्ट हर्ट हॉस्‍पीटल में मेरे पापा की इंजि‍योप्‍लास्‍टी हुई थी और अब वे बि‍ल्‍कुल ठीक हैं।)