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Tuesday, 22 September 2009

जाल के उस पार.......

आज की मनहूस सुबह ने मुझे जि‍स पीड़ा और ग्‍लानि‍ से भर दि‍या कि‍ शायद ईश्‍वर भी मुझे माफ न करे। मेरे फ्लैट की खि‍ड़की के साथ करीब आठ फुट लंबा और दो फि‍ट चौड़ा चबूतरा बना हुआ है। इसी खि‍ड़की के ऊपर ए.सी. टंगा हुआ है। ‍आज सुबह छ: बजे उठ कर खि‍ड़की के पास गया ही था कि‍ बाहर कबूतरों के चीखने की आवाज आई। मेरा रोम-रोम सि‍हर उठा।


कबूतर के जि‍स बच्‍चे को मैं पिछले तीन दि‍नों से सुबह-सुबह देखा करता था वह एक बि‍ल्‍ली के जबड़े में दबी पड़ी थी। जालीवाली खि‍ड़की के उस पार से बि‍ल्‍ली मुझे नहीं देख सकती थी। कबूतर के बच्‍चे को मुँह में दबाए वह मुझसे दो फुट की दूरी पर खड़ी होकर उतरने का रास्‍ता ढूँढ रही थी। मैं हैरान हुआ कि‍ यह बि‍ल्‍ली पहली मंजि‍ल के इस चबूतरे तक आई कैसे??

मैंने देखा कबूतर का वह नवजात बच्‍चा नि‍ष्‍क्रि‍य और अचेत- सा बि‍ल्‍ली के जबड़े में झूल रहा है। न जाने मुझे ऐसा क्‍यों लगा कि‍ जाली के उस पार से उसकी खुली ऑंखे मुझे बेबस नि‍गाहों से देख रही है। वह ऐसा पल था जैसे काटो तो खून नहीं।

ऐसा लगा जैसे आदमी के नवजात शि‍शु को कुत्‍ते के जबड़े में दबा हुआ मैंने देख लि‍या हो, बि‍ल्‍कुल पास से....। कुछ पल तक उसका देखना ही मेरे लि‍ए गहरा सदमा दे गया।


उसकी इस हालत का मैं जि‍म्‍मेदार था। इसके लि‍ए ईश्‍वर जो सजा तय करेगा उसे सहन कर पाने की ताकत मुझमें नहीं। मैं खि‍ड़की खोलकर बि‍ल्‍ली की तरफ झपटा, बि‍ल्‍ली नीचे खड़ी सफारी कार पर कूदकर भाग गई और ले गई उस नवजात बच्‍चे को......

मैंने दूसरे फ्लैट के चबूतरे पर कबूतरों के जोड़ों को इस तरफ देखते देखा..........मैं उनका गुनाहगार था। अनजाने में मुझसे बहुत बड़ी गल्‍ती हो गई थी।


दो दि‍न पहले ए.सी. साफ करते हुए उनके ति‍नके के घोंसले को मैंने सावधानी से उतारकर चबूतरे के कोने में रख दि‍या था। दरअसल उनके ति‍नके ए.सी. के पंखे में फँसकर आवाज करने लगे थे। पहले दि‍न तो वह नवजात बच्‍चा सहम-सा कोने में दुबका रहा। अगली सुबह वह चबूतरे पर नन्‍हें कदमों से चहलकदमी करता नजर आया। अभी उसके पंख नहीं आए थे।

जाली के इस पार खड़ा मैं उसे देखकर भाववि‍भोर हुआ जा रहा था। मैंने अपने ढाई साल के बेटे को यह दृश्‍य कल ही दि‍खाया था। शाम को अपनी तोतली बोली में वह मुझे कहता रहा- पापा, पीजन का बच्‍चा देखना है।


अब मेरे बेटे की नींद खुल गई है। वह उठते ही खि‍ड़की की तरफ गया है और पास खड़ी कुर्सी को उसके पास घसीटकर ला रहा है। थोड़ी देर तक वह कबूतर के बच्‍चे को चबूतरे पर तलाशता है। उसे जब कुछ नजर नहीं आता तो मुझे आकर कहता है-
पापा, पीजन का बेबी कहॉं गया?

वह अब जीद करने लगा है कि उसे पीजन का बेबी देखना है।
मैं उसे समझाता हूँ कि‍ वह अपने मम्‍मी-पापा के साथ आकाश में घुम्‍मी-घुम्‍मी करने गया है। एक-दो दि‍न में वापस आ जाएगा।
मेरा मन पूछता है- क्‍या सचमुच !!‍



[ ईश्‍वर इस कृत्‍य के लि‍ए मुझे माफ करे:(
मैं प्रण लेता हूँ कि‍ पशु-पक्षि‍यों को अहि‍त पहुँचाने वाले कार्यों से दूर रहूँगा। हम मनुष्‍यों ने खेत-जंगल उजाड़कर कंक्रीट का जाल बि‍छाया है, उसी का नतीजा है कि‍ ये बेचारे पशु-पक्षी मनुष्‍यों के चबूतरों पर एक सुरक्षि‍त कोने की तलाश कर रहे हैँ, और वह भी इन्‍हें नसीब नहीं..... ]

Wednesday, 9 September 2009

गौर से देखा तो घूम जाओगे!!

सोते हुए को तो उठाया जा सकता है मगर कोई जानबूझकर सोने का अभि‍नय करे तो उसे उठाना कठि‍न है। पत्‍थर भी अपनी जगह बदलता रहता है। वह प्रकृति‍ की शक्‍ति‍ से संचालि‍त होता है। कभी भूकंप उसकी जगह बदलती है, कभी हवा तो कभी पानी। अचल कुछ भी नहीं है, सब चलायमान है। इसलि‍ए मुझे लगता है कि‍ जड़-चेतन जि‍तने भी पदार्थ हैं, उनमें कि‍सी न कि‍सी रूप में गति‍ रहती है। उसमें होनेवाले हलचल को हम तभी पकड़ सकते हैं जब हमारे मन की हलचल शांत हो और तभी हम तटस्‍थ रहकर चीजों को गहरी नजर से देख सकते हैं। कभी-कभी सोचता हूँ पतंग कि‍सकी बदौलत उड़ता है
- जि‍स डोर से बंधा है उसकी वजह से
- जि‍सके हाथ में डोर है उसकी वजह से
- हवा के प्रवाह से
- पतंग के कागज और ति‍ल्‍ली की गुणवत्‍ता की वजह से
- उस पर सही ढ़ंग से कन्‍नी बॉंधने की वजह से
- अन्‍य कोई अदृश्‍य कारण
यह भी संभव है कि‍ इन सबकी मौजूदगी के बाद भी पतंग न उड़े।
और यह भी संभव है कि‍ इनके अभाव में भी पतंग अचानक उड़ने लगे।
मुझे जिंदगी भी ऐसी लगती है पर मैं इसे कटी पतंग नहीं कहना चाहता क्‍योंकि‍ कटी पतंग की दि‍शा भी तय है। दि‍शाहीनता भ्रम है, लक्ष्‍य तो सुनि‍श्‍चि‍त है और हर जीव उसी की तरफ अग्रसर हो रहा है।
जि‍न्‍दगी हमेशा मौत की तरफ ही बढ़ती है। बस हम इसतक जाने वाले रास्‍ते को फूलो से सजाकर खुश होना चाहते हैं।
मैं क्षमा चाहूँगा ऐसे वि‍चार कभी-कभी ही आते हैं, मुझे पलायनवादी,भाग्‍यवादी या कोई वादी, बर्बादी आदि‍ न समझा जाए। हर आदमी के भीतर कुछ न कुछ चल रहा होता है, जि‍समें से कुछ राग से नीर्मि‍त होता है, कुछ वैराग से। आदमी उसी को हासि‍ल करना चाहता है, उसी को काबू करना चाहता है। यह अलग बात है कि‍ आदमी खुद उसके काबू में हो जाता है।

खैर, अब आप यहॉं इस चक्र के बिंदू पर ध्‍यान केंद्रि‍त कीजि‍ए और सम्‍मोहन को झेलि‍ए:)


(बताइए कौन घूम रहा है)

वैधानि‍क चेतावनी:)
कोई शीर्षक बदलने की चेष्‍टा न करे- गौर से पढ़ा तो घूम जाओगे:)

ऐसा साल में एक बार ही होता है कि‍ तारीख लि‍खते हुए आनंद-सा आता है-
09/09/09
इस नौ की ति‍कड़ी को देखना भी एक सकून है।
और पोस्‍ट भेजने का वक्‍त भी अच्‍छा लग ‍रहा है-
12:12

चलि‍ए ये भी बताते जाइए कि‍ ऐसी ति‍कड़ी कि‍स साल से बनाने की छूट नहीं रहेगी ?
और ऐसा अवसर सदी में कि‍तनी बार मि‍ल सकता है ?
सवाल बचकाना है ना, कोई बात नहीं जवाब मत दीजि‍ए :)

Tuesday, 8 September 2009

इचक दाना- इचक दाना, दाने ऊपर दाना- 1

इस तस्‍वीर में सात घोड़े हैं? क्‍या आपकी नजर उन्‍हें देख पा रही है ?




इस जंगल में पॉंच हि‍रण हैं, क्‍या आप उन सभी को ढूँढ सकते हैं ?



(इन दि‍नों मेरे दोस्‍त मुझे रोचक मेल भेज रहे हैं। यह मैं आपलोगों के साथ शेयर कर रहा हूँ।)