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Tuesday, 5 August 2008

पेश है शेर !

फितरत ज़माने की, जो ना बदली तो क्या बदला !!
ज़मीं बदली ज़हॉं बदला , ना हम बदले तो क्या बदला!!


(आज शाम तक मेरे सफरनामें में जरुर पढ़ें - मैंने खज्जियार (डलहौजी) में पैराग्लाइडिंग करते हुए मौत को कितने करीब से देखा !)

4 comments:

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया शेर है जितेन्द्र जी।

vineeta said...

हमें आपकी पोस्ट का इन्तजार रहेगा

vipinkizindagi said...

achcha sher

Udan Tashtari said...

बहुत बढिया.