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Friday, 8 August 2008

टखना सिंह चला दफ्तर !

अपने बाप के गम में करमजली उन दि‍नों घर और दवाई-घर के बीच डोर-सी खींचकर रह गई थी। वैसे लोगों को मालूम था कि‍ उसका बाप गुनि‍या काफी बीमार है और उसकी ऑटो रि‍क्‍शा भी जब्‍त हो गई है। करेजा सिंह के साथी कह रहे थे कि‍ साला! ऑटो रि‍क्‍शा को टैक्‍सी बनाकर घूमता था, और पैसे भी टैक्‍सी-सा ऐंठता था। करेजा अफसोस जताने आया और करमजली के ऑंसू जबरदस्‍ती पोंछते हुए बोला- ऑटो रि‍क्‍शा गया तो क्‍या हुआ, मेरे दादा के पास कई रि‍क्‍शे हैं, उनसे कहकर बापू को रि‍क्‍शा कि‍राए पर दि‍लवा दूंगा। इस प्रस्‍ताव पर उसके साथी अंदर ही अंदर हँस रहे थे।
टखना सिंह को पता लगा तो उसने सोचा भागकर करमजली के पास चला जाऊँ! पर उससे भागा नहीं गया। टखना सिंह ने परसो ही शीशे में अपना चेहरा देखा था, और अफसोस से उसकी नि‍गाहें नींची हो गई थी- क्‍या सचमुच मैं बूढ़ा लगने लगा हूँ! क्‍या करमजली इसलि‍ए मुझसे दूर-दूर रहने लगी है! जवानी में कदम रखने से पहले ही क्‍या मैं बदरंग हो गया हूँ!
शायद इसलि‍ए वह थका-हारा-सा उसके घर पहुँचा। उसने करमजली को देखा, करमजली ने उसको। ऑंखों-ऑंखों में दर्द का आवेग फूटा, टखना को पारो की याद आई और करमजली को देवदास की, पर वे दौड़कर एक-दूसरे से गले नहीं मि‍ले। उस छोटी-सी कुटि‍या में दौड़ने की गुजांइश भी कि‍तनी थी! दवा को दारू की तरह पी-पीकर गुनि‍या कुछ दि‍नों में ठीक हो गया।
इधर कई दि‍नों से टखना तैयार होकर कहीं नि‍कल जाता था। कपड़े-जूते सलीके से पहनकर, एक ढंग का बैग लि‍ए जाते देख लोगों को लगा था कि‍ टखना की नौकरी लग गई है। टखना सिंह से कोई पूछता, तो जवाब में वह मुस्‍कुरा-भर देता। दफ्तर तो करेजा सिंह भी जाता था। लोग उससे भी पूछते थे, भाई करेजा! कहॉं जा रहे हो, तो वह ऐसे मुँह बनाता जैसे उसे दस्‍त हो गया हो, और पेट साफ करने के लि‍ए दफ्तर जाना पड़ रहा हो! लेकि‍न टखना को मालूम था कि‍ ये वही करेजा है, जो नौकरी के लि‍ए कंपनी के चेयरमैन की गाड़ी के आगे लेट गया था। और जब उठा, तो नौकरी लेकर उठा। टखना को तो मालूम भी नहीं कि‍ गाड़ी के आगे कैसे लेटना है! लोगों ने उसे यह कहकर धि‍त्‍कारा भी, कि‍ लोग नौकरी के लि‍ए न जाने कहॉं-कहॉं लेट जाते हैं, ये तो बेचारी कार है! टखना को अपनी कि‍स्‍मत पर भरोसा नहीं, उसे लगता है, वह अगर गाड़ी के आगे लेट गया, तो अगले दिन ‘दनदनाती’ में यही खबर आएगी कि‍ चेयरमैन की गाड़ी के नीचे एक कुत्‍ता दबकर मर गया। लोग चेयरमैन को सांत्‍वना के साथ ये सुझाव भी देंगे कि‍ ऐसे खून तो टायर में लगते रहेंगे, अपने रि‍टायरमेंट के बाद ही बदलवाना!
तो लोगों को वि‍श्‍वास हो चला था कि‍ टखना को कहीं काम मि‍ल गया है, और अजीब बात थी कि‍ टखना ने लोगों का ये वि‍श्‍वास बनाए रखा! टखना पहले ऐसा नहीं था, उसकी उम्र भी ऐसी नहीं थी, जैसी आज है। दरअसल, कम उम्र में जज़्बात को नादानी में शुमार कि‍या जाता है, बढ़ती उम्र के साथ वह कमजोरी में तब्‍दील होने लगती है। इसलि‍ए टखना एक सकून महसूस करता था कि‍ लोग उसे दफ्तर जाते हुए देखते हैं। करेजा सिंह के अलावा कि‍सी को पता नहीं चला कि‍ टखना हर दि‍न तैयार होकर उस दफ्तर में काम मांगने जाता था !

6 comments:

Lovely kumari said...

achchha likha aapne.

शोभा said...

भावुक कर देने वाली रचना है। बहुत सुन्दर । बधाई स्वीकारें।

महामंत्री-तस्लीम said...

इस छोटी सी दास्तान में आपने बहुत प्यरी सी बात कह दी है। मैं उस बात को फिर से दुहरान चाहता हूं- "कम उम्र में जज़्बात को नादानी में शुमार कि‍या जाता है, बढ़ती उम्र के साथ वह कमजोरी में तब्‍दील होने लगती है।"

masijeevi said...

हॉं भई अब तो इस उम्र में रोज रोज तैयार होकर फैकल्‍टी जाना हमसे होता नहीं....


चेयरमैनों की कारें वाकई खून से सनी हैं

pallavi trivedi said...

badhiya likha aapne.....

विनीत कुमार said...

to kosis yahi rahe ki rojgar paane ke liyae berojgar na dikhe..