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Wednesday, 29 October 2008

डि‍ब्‍बा-पर्व और जेब में पटाखा !!

इस बार उत्‍तर प्रदेश, हरि‍याणा के चावल के खेतों से कीट-पतंगों की एक प्रजाति‍ दि‍वाली मनाने दि‍ल्‍ली आई थी और लगभग दो-तीन हफ्ते से दि‍ल्‍ली में डेरा डाले हुए थी। शाम को स्‍ट्रीट लाइट के नीचे से नि‍कलना दूभर हो जाता था, क्‍योंकि‍ ये ऑंख-मुँह,सर्ट में चले जाते थे। लोगों ने शाम को टहलना लगभग बंदकर दि‍या था। शम्‍मा पर नि‍सार होनेवाले इन परवानों को सुबह की झाड़ू के दौरान थोक के भाव में इकट्ठे कर बोरे में भर-भरकर फेंका जा रहा था। दुकानदारों को खासी परेशानी का सामना करना पड़ा, क्‍योंकि‍ त्‍योहार के इस मौसम में उन्‍हें हल्‍की रौशनी में सामान बेचना पड़ा। ज्‍यादा रौशनी में कीट-पतंगे ज्‍यादा आ रहे थे, इसलि‍ए ग्राहक या तो अंदर आ नहीं रहे थे या आकर जल्‍दी भाग रहे थे। जि‍नसे भी पूछो, यही कहते पाए गए कि‍ इतनी बड़ी तादाद में इन कीट-पतंगों को पहले कभी नहीं देखा गया।
तो, पि‍छले साल के लिहाज से इस बार बाजार में कीट-पतंगों की रौनक रही, और दुकानदारी फीकी।

ये तो थी कीड़ो की दि‍वाली, अब हम बड़कीड़ों ने दि‍वाली कैसे मनायी, इस पर भी एक नजर डालते हैं। मि‍ठाई की दुकानों पर ऑर्डर गया हुआ है कि‍ ऑफि‍स में इतने स्‍टाफ हैं, इतने डि‍ब्‍बे पैक करने हैं, बॉस का डि‍ब्‍बा अलग, मेमसाब का डि‍ब्‍बा अलग, शर्मा जी का अलग, वर्मा जी का अलग, अजी त्‍योहार न हुआ डि‍ब्‍बा-पर्व हो गया। जैसे हर धर्म में, उपासना गृह में भगवान बसते हैं, वैसे ही हर पर्व में डि‍ब्‍बा बसता है।
पूँजी के बाजार ने पर्व मनाने की नई परम्‍परा का ईजाद कि‍या है। शायद इसलि‍ए अचानक हर पर्व दो-दो दि‍न मनाने की कवायद चल पड़ी है। छोटी दि‍वाली है- क्‍या कि‍या जी, उपहार बॉंटे, आज बड़ी दि‍वाली है, क्‍या कि‍या जी, आज भी उपहार बॉंटे। इस तरह होली, ईद और दूसरे पर्व भी दो-दो दि‍न मनाए जाने लगे हैं। पहले भी ये दो बार मनाए जाते होंगे, मगर बाजार और मीडि‍या ने इसे अपने मतलब से अचानक उछाला है। दि‍क्‍कत तो ये है कि‍ शेयर बाजार में कभी आए उछाल के बाद आज जि‍तनी गि‍रावट दर्ज की गई है, पर्वाश्रि‍त इस बाजार में भी वह गि‍रावट नजर आएगी, यह सोचना बेमानी है। वैलेंटाइन डे, फादर्स डे, मदर्स डे, ये डे, वो डे- हर डे को मीडि‍यावाले अपने लि‍ए खबर का एक नया मसाला मानते हैं और बाजार माल खपाने के लि‍ए मार्केटिंग का एक और अवसर।

दि‍ल्‍ली एक महानगर है, गॉव तो है नहीं कि‍ दरवाजे से बाहर नि‍कले कि‍ पड़ोस में ही रि‍श्‍तेदार या दोस्‍त मि‍ल जाऍगे। यहॉं कि‍सी को उपहार देने नि‍कलो तो पता चलता है एक उत्‍तर में रहता है दूसरा दक्षि‍ण में। बि‍ना फोन कि‍ए जाओ तो पता चलता है कि‍ वह पूरब गया हुआ है उपहार बॉंटने। महानगरों में पर्व मनाने के नाम पर लोगों को सि‍र्फ और सि‍र्फ उपहार का आदान-प्रदान करते देखा है मैंने। सि‍र्फ इस वजह से भारी ट्रैफि‍क जाम और दुकानों में मेला देखने को मि‍लता है। चीजों की खपत पर्व त्‍योहारों पर इतनी बढ़ जाती है कि‍ दाम बेलगाम हो जाते हैं।

उपहार बॉंटने का सि‍लसि‍ला जि‍नका खत्‍म हो जाता है, वे बम-पटाखे नि‍कालते हैं तथा शोर और धुँओं में नोट को जलते देख खुशि‍यॉं मनाते हैं। मि‍.आहूजा एण्‍ड फैमि‍ली इंतजार करती है कि‍ जब उनके पटाखे खत्‍म हो जाऍगे तब ये पटाखे फोड़ना शुरू करेंगे और अगले दि‍न चर्चा का वि‍षय बनेंगे कि‍ इस बार आहूजा जी ने देर रात तक, जमकर दि‍वाली मनायी। इस तरह, पर्व पर अनेक लोग मानो अपनी जेब में बम-पटाखे फोड़ते हैं और उस फटी जेब को अगले कई महि‍नों तक छि‍पकर रफ्फू करवाते फि‍रते हैं।

उम्‍मीद है हम बाजार और मीडि‍या की इस मंशा को समझेंगे और कठि‍न होती महानगरीय जिंदगी के लि‍ए पैसे जोड़ने के साथ-साथ पर्व को मनाने के व्‍यवहारि‍क तरीके की तलाश करेंगे तथा पर्यावरण, परम्‍परा और जेब के बीच सामंजस्‍य और संतुलन बनाने का जतन करेंगे।

21 comments:

COMMON MAN said...

bandhu parv to lala logon ka hota hai jinki jeben har parv par bhar jaati hain.

अनूप शुक्ल said...

पर्व पर अनेक लोग मानो अपनी जेब में बम-पटाखे फोड़ते हैं और उस फटी जेब को अगले कई महि‍नों तक छि‍पकर रफ्फू करवाते फि‍रते हैं। मजेदार और सही बात भी!

मुन्ना पांडेय(कुणाल) said...

सही फ़रमाया आपने

रंजना [रंजू भाटिया] said...

सही कहा आपने ..सब तोहफे इधर से उधर होते रहेंगे अब त्यौहार आने पर जेब ढीली होने का दर्द बहुत समय तक सताता है ..बदलेगा कौन और कैसे ..पहल तो हम लोगों को ही करनी होगी ..

Udan Tashtari said...

वाकई एकदम सही फरमाया. कई दिनों तक जेब पर असर रहता है ...बढ़िया आलेख/

MANVINDER BHIMBER said...

bilkul sahi kaha aapne...achchi post hai

समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...

apke vicharo se sahamat hu. Diwali parv par Noto ki Holi jalaai jati hai fir Diwalaa nikalate der nahi lagta hai. dhanyawad.

Gyan Dutt Pandey said...

जेब का उपयोग नायाब है!
मन लड्डू फोड़ने को होता है और जेब पटाके। दोनो को फिर रफू कराया जाता है! :)

ranjan said...

इन मच्छरों ने तो हमारा भी जीना दुभर किया हुआ है...

और डिब्बा पर्व का तो क्या कहें...

ताऊ रामपुरिया said...

भाई हम हो गए हैं लेट ! सो हमारे पहले के टिपणीकारो ने बिल्कुल सही बात कहदी है ! उससे ज्यादा क्या कहा जा सकता है ? अब हम फालतू की बातें कर लेते हैं ! आज तो बहुत ही कम पोस्ट आई हैं ! सो कहाँ जाकर टिपियाये ? आपसे अच्छा आराम दायक घर और कहाँ मिलेगा ? पहली बात की इस बार हमारे यहाँ शम्‍मा पर नि‍सार होनेवाले इन परवानों ने बिल्कुल भी उत्पात नही किया ! इनको हमने पहले ही दिल्ली में रुक जाने का आर्डर कर दिया था ! :)

दुसरे हमारा उपहार का डिब्बा अभी तक पहुंचा नही शायद कोरियर वाले के पास होगा अभी ! :) कोई बात नही , आ जायेगा एक दो दिन में !

तीसरे हमारे पास में भी एक मि. आहूजा टाईप फेमिली रहती है उनको भी यही शोक था ! रात को १० बजे शुरू, और दो / तीन बजे तक बम पटाखे फोड़ना ! पहला प्रोग्राम दशहरे पर , फ़िर धन तेरस से दीवाली और उसके बाद देव उठनी ग्यारस को ! यानी इसी एक महीने में ५ रात का सत्यानाश ! हमारा बेडरूम सड़क की साईड है और ह्रदय रोगी हम मुफ्त में हैं ! भाई यकीन मानो हम परेशान ! उन सज्जन के यहाँ उनकी मित्र मंडली भी इस पटाखा फोडू उत्सव में शरीक रहती थी ! लक्ष्मी की कृपा भी उन पर उन दिनों ज्यादा ही थी ! सो सारे मोहल्ले को इन ५ दिनों में सर पे उठाये रखते थे ! ३/४ साल होगये ! हमने उनको इशारों में समझाया पर उन पर कोई असर नही ! फ़िर एक पड़ोसी से कहलाया , फ़िर भी नही माने ! बोले - साहब दीवाली है , लक्ष्मी जी को प्रशन्न करना पङता है ये तो रीति रिवाज हैं ! ज्यादा ही परेशान हो तो कहीं जंगल में मकान बना ले !
अब हमने सोचा की एक तो ये पड़ोसी है ऊपर से लक्ष्मी के नशे में चूर है ! इसको भी ठीक करना ही पडेगा ! अब जंगल तो क्या जायेंगे ? दीपावली हो गई ! हमारे ऊपर लक्ष्मी जी की कृपा तो नही है पर उल्लू जी की जरुर है ! सो हम भाई दूज के अगले दिन पटाखे वाले के पास गए ! और भाव पूछे - वो बोला - साहब आप तो लेलो ! अब तो सीजन खत्म हो गया ! जो देना हो देदेना ! कितने निकाल दूँ ?

हमने कहा - उस्ताद जी आप आदमी अच्छे लगते हो और बड़ी कायदे की बात करते हो ! आप तो ऐसा करो की तेज आवाज वाले जितने भी बड़े २ बम हैं वो दे दो ! और इतने दे दो की रात को २ बजे से सुबह ६ बजे तक लगातार चल सके ! और हो तो एक आदमी भी दे दो जो बैठ कर इनको फोड़ता भी रहे ! और ये कार्यक्रम ३ दिन करना है !

रात को २ बजे कार्यक्रम शुरू ! पहले दिन कोई नही बोला ! दुसरे दिन हमने और एक आदमी लगवाया ! आहूजा साहब चुपचाप ! और हम उलझने के चक्कर में थे पर वो समझ गए की अबकी बार मामला कुछ गड़ बड़ है ! मोहल्ले के बच्चो को भी बुला कर फ्री में बम फ़ुडवाये और बच्चो को चाकलेट मुफ्त में ! अब मोहल्ले भर में ख़बर हो गई की ताऊ १५ दिन बम फ़ुडवायेगा ! मोहल्ले के बच्चे तो खुश .. बम के बम फोडो.. चाकलेट मुफ्त में .. !

तीसरे दिन .. सुबह २ आहूजा साहब हमारे घर आ गए खींसे निपोरते हुए ! और आप यकीन मानो ..उस बात को दस साल के करीब हो गए ! उसके बाद उन्होंने आज तक दिवाली के पटाखे रात के ११ बजे बाद नही छुडाये !

तो भाई इन आहुजाओ का तो ऐसे ही इलाज करना पड़े ! हर जगह हैं ये तो !

शायद कुछ लम्बी बात हो गई ! आप इसको टिपणी मत समझना ! ये तो आज कोई काम धंधा नही है सो आपके ड्राइंग रूम में बैठ कर गप्पे लगा ली ! अच्छा भाई इब राम राम !

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

नया साल और दीपावली मुबारक हो --
समाज मेँ रहते हुए
सामँजस्य बिठाना भी जरुरी है

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

उन कीडों की वजह से मेरे खेतो की फसल जीरो हो गई एक बीघा में ७५ किलो धान का ओसत आया है .

Ghost Buster said...

बिल्कुल पैसा फूंक तमाशा देख वाला हिसाब है जी. और ये नयी प्रजाति के कीट पतंगे तो हमारे यहाँ भी उत्पात मचाये हुए हैं.

खैर, दीपावली की शुभकामनाएं स्वीकारें.

राज भाटिय़ा said...

भाई आप का लेख बहुत ही पंसद आया, ओर दिल्ली की ट्रेफ़िका याद दिला दी.
प्रजाति के कीट पतंगे, किसी ने सोचा यह कहा से आये?? अरे भाई जब पक्षी खत्म हो रहै है तो यह आ रहै है,क्योकी पहले पक्षी इन्हे खा जाते थे,
धन्यवाद

ताऊ रामपुरिया said...
This comment has been removed by the author.
भूतनाथ said...

सटीक लेखन ! भाटिया जी की बात से सहमत ! अगर शान्ति से जीना है तो पक्षियों और पेडो को बचाना होगा ! आज महानगरो में सड़क चोडीकरण के नाम पर हरे भरे पेडो की बलि चढाई जा रही है ! जो सड़के छाया से भरपूर थी वहा मरघटी सन्नाटा पसरा पडा है ! उन पेडो पर जो हजारो लाखो पक्षी रैन बसेरा रखते थे वो कहाँ गए ? वो ही रोज हमारे आंगन में आया करते थे ! आज क्यूँ हमारे आँगन में चिडिया का आना बंद हो गया ! ? शहरों में आज पक्षियों के बैठने के लिए पेड़ तक नही बचे ! तो भुगतो नतीजा ! हम तो आज कल ऊपर भी वृक्ष लगवा रहे हैं जिससे आदमी मरने के बाद तो वृक्षों की छाया में बैठ पायेगा ! यहाँ तो अब मुश्किल है !

अभिषेक ओझा said...

बात तो सही है... और डिब्बे भी तो नए आ गए हैं... रेडिमेड डब्बे, मिठाई को चॉकलेट भी तो रिप्लेस कर रहा है. धीरे-धीरे !

seema gupta said...

उम्‍मीद है हम बाजार और मीडि‍या की इस मंशा को समझेंगे और कठि‍न होती महानगरीय जिंदगी के लि‍ए पैसे जोड़ने के साथ-साथ पर्व को मनाने के व्‍यवहारि‍क तरीके की तलाश करेंगे तथा पर्यावरण, परम्‍परा और जेब के बीच सामंजस्‍य और संतुलन बनाने का जतन करेंगे।
" the esence of the whole post lies in these words... very well said and nicely presented.."

Regards

Sachin Malhotra said...

mere new blog pe aapka sawagat hai......
http://numerologer.blogspot.com/

डॉ .अनुराग said...

हाय !हमारी जेब के पैबंद सरे बाजार कर दिये आपने

वर्षा said...

कीड़ों ने इंसानों के ख़िलाफ आंदोलन छेड़ दिया है। सावधान!