मेरे दोस्त ने अपने ऑफिस में साफ-सफाई और पानी वगैरह देने के लिए एक दुबला-पतला लड़का रखा था। उसका नाम चिरंजीलाल था। एक दिन जब मै वहीं बैठा था तो उसे बुलाकर मेरे मित्र ने उसे इशारे से समझाया कि साब् को पानी पिलाओ। उसे इस ऑफिस में आए हुए ये दूसरा ही दिन था। मैंने अपने मित्र से पूछा कि इसका नाम ऐसा क्यों रखा है और क्यां इसे सुनाई नहीं देता है?
मेरे मित्र ने हँसते हुए कहा कि ऐसी बात नहीं है। यह बंगाल के किसी गॉंव से निकलकर पहली बार दिल्ली आया है और हिंदी इसे बिल्कुंल नहीं आती है। वैसे इसका नाम चरणजीत है पर जब वह अपना नाम बताता है तो बँगला टोन की वजह से ‘चिरंजी’ सुनाई पड़ता है बाकि ‘लाल’ तो हमने प्यार से लगा दिया है।
अब कल की ही बात बताऊँ, अपने कमरे से मैंने कॉल बेल बजायी तो अंदर आने की बजाए बाहर देखने चला गया कि बाहर कौन है। मेरे साथ बैठे सज्जन ने जब ये देखा तो हँसते हुए बोले कि उसने कॉल बेल सुनकर शायद ये समझा कि छुट्टी का टाइम हो गया है!
इस शापिंग कॉम्प्लैक्स में मेरे मित्र के ऑफिस के ऊपर भी कई दुकाने हैं। एक दिन उसने चिरंजी को मोबाइल का रिचार्ज कूपन लाने को भेजा। थोड़ी देर बाद आकर वह टूटी-फूटी हिंदी में कहता है-
’बाइर तो शौब दुकान बौंद है, ऊपर वाला भी नाई है।‘
यह सुनकर उसके साथ बैठे सज्जन कहते हैं कि जब मंदी के दौर में भगवान ने ये धंधा शुरू ही कर दिया है तो मैं उनसे बाल कटवा ही आता हूँ :)
नाखुश - हिंदी ग़ज़ल
1 week ago











