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Tuesday, 27 April 2010

लैंसडाउन! मैं आ रहा हूँ...........

सफर के नाम पर ही मैं रोमांच से भर जाता हूँ! अभी-अभी नीरज जी मुंबई के पास का एक हि‍ल स्‍टेशन 'माथेरान' घूमकर आए हैं। पि‍छली बार मसूरी यात्रा वाली पोस्‍ट पर अनुराग जी ने लैंसडाउन का जि‍क्र कि‍या था। उसके बाद से मैं अपने एकमात्र यायावर दोस्‍त वि‍जय की हामी का इंतजार कर रहा था जि‍से साल में सि‍र्फ एक बार मई में ही फुर्सत मि‍लती है। फुर्सत इसलि‍ए कि‍ उसकी बीवी, यानी मेरी भाभी जी बच्‍चे को लेकर मायके (अजमेर) चली जाती है:)
डि‍जलवाली इंडि‍का का इंतजाम हो चुका है। उसकी लाइट, ब्रेक,टायर आदि‍ चेक करवाई जा रही है। वि‍जय ने साफ-साफ कह दि‍या है कि‍ खर्चा ज्‍यादा नहीं होना चाहि‍ए! और ये भी कि‍ पास के हि‍ल स्‍टेशन पर जाना है और दो दि‍न में लौट आना है। मैंने कहा दो दि‍न में कुछ भी देखा नहीं जाएगा और इस बार नई जगह जाना है तो रहने-खाने का कुछ सि‍स्‍टम पता भी नहीं है। इसलि‍ए न खर्चे की लि‍मि‍ट बता सकता हूँ और न ही दि‍न की!
मि‍ला-जुलाकर मैंने वि‍जय और बाकी तीन और सहयात्रि‍यों को सहमत करा लि‍या है कि‍ सफर में दो नहीं चार-पॉंच दि‍न लग सकते हैं। 1 मई की सुबह चलेंगे और 5 मई की शाम तक दि‍ल्‍ली वापस। वि‍जय ने तीन सहयात्री इसलि‍ए लि‍या है कि‍ सफर का मजा चार गुना कि‍या जा सके, साथ ही खर्चे पॉच हि‍स्‍से में बॉंटा जा सके। अब मैं ये नहीं बता सकता कि‍ वि‍जय के लि‍ए इसमें पहला कारण महत्‍वपूर्ण है या दूसरा:)

डलहौजी,खज्‍जि‍यार, धर्मशाला , मैक्‍लॉडगंज, मनाली की दूरी की वजह से और मसूरी शि‍मला, नैनीताल से बोर होने के बाद, और अनुराग जी के सुझाव पर इसबार लैंसडाउन जाने का रि‍स्‍क ले रहा हूँ:)
जब ऐसी जगह जाना होता है तो मैं सबसे पहले गूगल मैप (लिंक के लि‍ए क्‍लि‍क करें) से रास्‍ते और दूरि‍याँ पता करता हूँ।

सफर का रूट:
क) दि‍ल्‍ली-पानीपत-शामली-मुजफ्फरनगर- रूड़की- हरिद्वार
ऋषि‍केश- देवप्रयाग- श्रीनगर
ख) श्रीनगर- खि‍रसू-पौड़ी-लैंसडाउन
ग) लैंसडाउन- दुगादा- कोटद्वारा-नजीबाबाद -बि‍जनौर- मवाना- मेरठ- दि‍ल्‍ली

खाना खाते हुए मैं हमेशा ध्‍यान रखता हूँ कि‍ सबसे स्‍वादि‍ष्‍ट चीज अंत में खाउँ ताकि‍ उसका स्‍वाद खाने के बाद भी बना रहे। इसी आधार पर अब मेरे मन में उलझन ये है कि‍ मैं दि‍ल्‍ली की ओर लौटते हुए ऋषि‍केश-पानीपत की तरफ से आउँ या लैंसडाउन-मेरठ की तरफ से। मैंने अपने दोस्‍तों से पूछा कि‍ वे पहले नदी की घाटि‍यों से गुजरकर हि‍ल स्‍टेशन जाना चाहेंगे या इससे ठीक उलटा रास्‍ता तय करेंगे। उन्‍होंने मेरे ऊपर छोड़ दि‍या है और अब यह जि‍म्मेदारी ही मेरी समस्‍या है। यदि‍ सफर का रास्‍ता मजेदार नहीं रहा तो सब दि‍ल्‍ली लौटकर मुझे गालि‍यॉं देंगे:(

पौड़ी से एक रास्‍ता श्रीनगर की तरफ जाता है, पर मैंने एक और हॉल्‍ट तय कि‍या है- खि‍रसू। सुना है वह भी एक सुंदर हि‍ल स्‍टेशन है। अब वहॉं जाकर ही पता चलेगा कि‍ वह जगह कैसी है?
लैंसडाउन की तरफ से खि‍रसू आना हो तो-
क) लैंसडाउन- गुमखल- सतपुली-बानाघाट-मोहर-पौड़ी
ख) पौड़ी- बाबूखल-फरकल-चौबाटा- खि‍रसू

(मैप को बड़ा करने के लि‍ए कृप्‍या उसपर क्‍लि‍क करें)


गूगल अर्थ से मैंने पौड़ी- खि‍रसू-श्रीनगर का रूट-मैप तैयार करने और रास्‍ता तलाशने की कोशि‍श की, पता नहीं ये सही भी है या नहीं -
खि‍रसू-कोठसी-मारकोला-बुधानी
बुधानी से दो रूट नजर आया-
क) श्रीनगर हाइवे 58 पर
ख) सुमारी- खल्‍लू- चमरडा- खंडा- श्रीनगर


अभी ये सफर का ड्राफ्ट भर है। इसमें दर्शाए गए मार्ग की सत्‍यता मेरे द्वारा प्रमाणि‍त नहीं है क्‍योंकि‍ मैं एक तरफ ऋषि‍केश तक गया हूँ, दूसरी तरफ मेरठ तक। मेरठ से लैंसडाउन तक और ऋषि‍केश से श्रीनगर-पौड़ी-खि‍रसू तक के रास्‍ते के बारे में मुझे कुछ पता नहीं है। अगर इस रूट के बारे में आपको कुछ पता हो तो जरूर बताएँ- जैसे, सही रास्‍ता क्‍या है/ सड़कें कैसी हैं/ आसपास देखने की और कोई जगह/ रूकने और खाने की सही जगह। बाकी जब मैं उधर से लौटुँगा तब इस सफर के अनुभव और रास्‍ते की स्‍थि‍ति‍ का ब्‍योरा दूँगा।
तो बोलि‍ए हैप्‍पी जर्नी:)

Friday, 23 April 2010

टक-टक.............

मोबाइल पर मुझे होल्‍ड पर रखकर वो कि‍सी से कह रही थी-
'रख लो बाबा, कोई बात नहीं।'
पीछे सब्‍जी-मंडी का शोर मुझे सैलाब-सा लग रहा था-
टमाटर तीस-टमाटर तीस-टमाटर तीस
गोभी बीस-प्‍याज बीस
धड़ी सौ-धड़ी सौ..........
मैंने चि‍ल्‍लाकर कहा-
-मेरा बी.पी. लो हो गया है, वहॉं से जल्‍दी नि‍कलो!!
यह कहकर मैंने फोन काट दि‍या।

स्‍ट्रीट लाइट के नीचे मैंने कार के लि‍ए कि‍सी तरह जगह बनाई। बंद कार में मेरा दम घुट रहा था और बाहर शोर, प्‍याजनुमा बदबू के साथ मि‍लकर वातावरण में पूरी तरह फैला हुआ था। एकदम भड़भडाता-सा बाजार अपने लौ में बहा जा रहा था। वहॉं सभी लोग कि‍सी-न-कि‍सी काम में व्‍यस्‍त थे-कहीं लोग गोल-गप्‍पे खा रहे थे, कहीं लोग मोल-भाव में जुटे थे,कोई खाली नहीं था..... सि‍वाये मेरे।
' सब्‍जी अकेले जाकर लाया करो, न मुझे भीड़ अच्‍छी लगती है न इंतजार!'
'कॉफी पि‍ओगे'- उसने मुस्‍कुराकर पूछा।
-'इस मंडी में तुम मुझे कॉफी पि‍लाओगी'
सी.सी.डी.* भी चल सकते हैं।
-माफ करो, वहॉं की महंगी काफी से घर की दाल भली। तुम फि‍जूलखर्ची बंद करो, अब मैं पैसे का हि‍साब लेना शुरू करूँगा।
मेरे पति‍देव,कॉफी 'लो बी.पी.' को कंट्रोल करती है, इसलि‍ए कह रही हूँ'
-उसने अपने रूमाल से मेरे सर का पसीना पोंछ दि‍या।

मैंने ड्राइव करते हुए पूछा-
फोन पर कि‍सी बाबा से बात करते सुना, कोई भीखारी था क्‍या?


-नहीं, एक बूढ़ा बाबा था। मैं आम खरीद रही थी तो देखा कि‍ वह बूढ़ा बाबा एक आम हाथ में लि‍ए दुकानदार से पूछ रहा है ये एक आम कि‍तने का है?
दस रूपये!
यह कहकर दुकानदार दूसरी तरफ व्‍यस्‍त हो गया।
उसने दबी हुई आवाज से कहा-
पॉंच रूपये में दोगे?
दुकानदार ने सुना नहीं तब उसने दुबारा कहा, तब भी दुकानदार तक उसकी आवाज पहुँची नहीं या उसने जानबूझकर अनसुना कर दि‍या। वह थोड़ी देर तक हाथ में आम को देखता रहा और वापस आम के ढेर पर रखकर आगे चल पड़ा।
गाड़ी रेडलाइट पर आकर खड़ी हो गई। कार के शीशे पर सि‍क्‍के से कि‍सी ने जोर से टक-टक की आवाज की। मैंने घूरकर उस लड़की की तरफ देखा जि‍सकी गोद में एक मरि‍यल-सा बच्‍चा टंगा पड़ा था। मेरी बेरूखी देखकर वह दूसरी कार की तरफ बढ़ गई।
कार चलते ही मैंने पूछा-
बूढ़े बाबा की बात पूरी हो गई?
नहीं, जब मैंने देखा कि‍ वह बाबा बड़ा मायूस होकर आगे चला गया तो मुझे बहुत तकलीफ हुई।
मैंने दुकानदार से कहा कि‍ उस बाबा को बुलाओ और दो कि‍लो आम तौलकर दे दो। पैसे मुझसे ले लेना।
दुकानदार तपाक से उसे बुला लाया। बाबा ने मुझसे कहा कि‍ मुझे इनमें से सि‍र्फ दो ही आम चाहि‍ए, मेरे पोते को आम बहुत पसंद है पर मेरे पास सि‍र्फ पॉंच रूपये ही थे।
मैंने कहा- बाबा आप सारे आम ले जाओ। बाबा ने जैसे अहसान से दबकर आभार जताया। तभी तुम्‍हारा फोन आया और तुम बड़बड़ कर रहे थे।
मुझे क्‍या पता था कि‍ तुम आम बॉट रही हो!
मैंने उसके चेहरे की तरफ देखा, उसके चेहरे पर सकून की एक आभा चमक रही थी।

अगली रेडलाइट पर कार की खि‍ड़की पर फि‍र टक-टक की आवाज हुई........
लेकि‍न तबतक ग्रीन लाइट हो चुकी थी।

* सी.सी.डी.= cafe coffee day
(चि‍त्र गूगल से साभार)

Saturday, 3 April 2010

शहर के चौक पर टखना सिंह

टखना सिंह ने अपने दोस्‍त करेजा से पूछा-
मुझे शहर जाना है हर संडे!
करेजा सिंह लगभग हर संडे हास्‍टल से भागकर फि‍ल्‍म देखने शहर जाता था और कभी पकड़ा भी नहीं गया।
क्‍या फि‍ल्‍म देखनी है?
नहीं!
किसी रि‍श्‍तेदार के घर जाना है?
नहीं!
कि‍सी लड़की से मि‍लना है क्‍या?
अरे नहीं भाई!!
उसे कोई बहाना भी नहीं सूझ रहा था कि‍ क्‍या कहे! उसने ये कहकर टाल दि‍या कि‍ बाद में बताऊँगा।
उस हॉस्‍टल का कानून हॉस्‍टल-परि‍सर से बाहर जाने की इजाजत नहीं देता था। टखना सिंह तब दसवीं क्‍लास का छात्र था और उसके उपर इसका भी काफी दबाव था।

शहर के चौक पर टखना का यह पहला संडे था। वह एक लाचार बुढि‍या को तलाश रहा था जि‍से वह रास्‍ता पार करा सके। वह एक ऐसे भूखे-गरीब को तलाश रहा था जि‍सने दस दि‍न से कुछ न खाया हो। दो-चार भीखारी उसे मि‍ले पर टखना को उनपर वि‍श्‍वास नहीं हुआ।
सुबह का एक घंटा इसी तलाश में नि‍कल गया। फि‍र उसने सोचा कि‍ कि‍सी रि‍क्‍शेवाले की मदद कर दे। दो चार रि‍क्‍शेवाले गुजरे भी लेकि‍न उनके रि‍क्‍शे पर कोई वजनदार सामान भी नहीं रखा था। दोपहर होते-होते वह नि‍राश हो चला था कि‍ तभी एक रि‍क्‍शे पर उसे भारी-भरकम सामान नजर आया। वह भागकर उसके पीछे पहुँचा और धक्‍का लगाने लगा। रि‍क्‍शेवाले ने रि‍क्‍शे का ब्रेक लगा दि‍या और पीछे मुड़कर चि‍ल्‍लाया-
अबे कौन है बे, क्‍या नि‍काल रहा है कट्टे से??
टखना ने सकपकाकर कहा
- कुछ नि‍काल.. नहीं रहा.., मैं तो वजन देखकर.. आपकी मदद के लि‍ए... आया था।
-भाग जा यहॉं से, मदद के नाम पे चले हैं चोरी करने!

चौक पर आते-जाते दो-चार लोगों ने चोरी की बात सुनी। आज संडे था और सब लोग कि‍सी शगूफे की तलाश में थे।
तभी उस चौक का एक दुकानदार आकर बोला-
-यह लड़का सुबह से मेरी दुकान के आगे न जाने कि‍स मतलब से खड़ा था। मुझे भी शक है इस पर।

बात हो ही रही थी कि‍ कि‍सी ने उसे एक थप्‍पड़ जड़ दि‍या। कि‍सी ने बढकर कॉलर पकड़ लि‍या।
तभी एक आदमी भीड़ चीरकर उस तक पहुँचा और बोला-
-अरे टखना, तू यहॉं क्‍या कर रहा है?
-मास्‍टर जी मुझे बचाइए!!
मास्‍टर जी ने सबको समझा-बुझाकर वहॉं से भेजा और टखना का कान पकड़कर स्‍कूल ले आए।
उसके बाद टखना ने उस कि‍ताब को जला दि‍या जि‍समें लि‍खा था-
कि‍सी की नि‍:स्‍वार्थ भाव से मदद करो तो जो आत्‍मि‍क खुशी मि‍लती है- उसे बयॉं करना आसान नहीं!!
टखना को लगा कि‍ इस अनुभूति‍ को भी बयॉं करना आसान नहीं है। उसने समझ लि‍या कि‍ हर दि‍न या कम से कम हर संडे कि‍सी लाचार की मदद करने का ख्‍याल दि‍मागी दि‍वालि‍येपन की नि‍शानी है।
करेजा सिंह शाम को सि‍नेमा देखकर लौटा और पूछा-
कैसा रहा संडे?

Saturday, 27 March 2010

कलर्ड बनाम ब्‍लैक एण्‍ड वाइट

'थोड़ा और सटकर खड़े हो जाइए!'
'थोड़ा और.......'
कैमरे का फ्लैश अब तक शांत था।
'भाई साब् बस थोड़ा-सा और। अपना सि‍र भाभी जी की तरफ झुकाइए, भाभी जी आप भी।'
अब भी फ्लैश नहीं चमका।
'अब मुस्‍कुराइए, एक इंच और, हॉ.......'
पर अब भी फ्लैश नहीं चमका।
मैं खीज गया, कहा-
'ये फोटो कि‍सी ऑफि‍स में देना है भाई, तुम तो फोटो इतना रोमांटि‍क बना रहे हो जैसे बेडरूम में लगाना हो!'

कैमरामैन के दॉंत चमके , पर फ्लैश अब भी नहीं चमका। मेरे सामने स्‍टैंड पर दो-तीन लैंप जगमगा रहे थे, वह उसका फोकस ठीक करने लगा। श्रीमती ने छेड़ा- कमर पर हाथ रखा हुआ है, फोटो में ये भी आएगा क्‍या?
मैंने बनावटी गुस्‍से में कहा-

-'कैमरा आगे है, पीछे नहीं!!'

क्‍या होता है न कि‍ शादी के कुछ सालों या कुछ महि‍नों तक ऐसा खुमार छाया रहता है जैसे सारे फोटो इस पोजीशन में लि‍ए जाएँ जि‍ससे लगे कि‍ हम एक-दूसरे के लि‍ए ही बने हैं और हमारी हर अदा और हर पोज में जबरदस्‍त प्‍यार छलक रहा हो! पर अब, जब हमारा तीन साल का बेटा अपनी नानी के साथ घर में हम दोनों के आने का इंतजार कर रहा हो, तो ऐसा लगता है कि‍ चि‍पककर खड़े रहने की अच्‍छी जबरदस्‍ती है यार!
अचानक फ्लैश चमका। फोटो खिंच चुकी थी। आज श्रीमती को गर्लफ्रेंड होने का सा आभास हो रहा था पर मैं अपने ब्‍यॉय-फ्रेंडीय छवि‍ को जाहि‍र नहीं करना चाहता था। मैं चाहता था कि‍ लोग मुझे इसका पति‍ ही समझे, कुछ और नहीं।
समाज भी कि‍तने ड्रामे करवाता है पता नहीं!!

कैमरामैन ने मायूसी से मुझे टोका-
'जी आपकी ऑंखे बंद हो गई है, फोटो दुबारा लेना पड़ेगा।'

लो, फि‍र से वही घटनाक्रम दुहराया जाएगा- चि‍पको जी, फि‍र झुको जी, फि‍र मुस्‍कुराओ जी!

अंदर से तो मैं भी इसका आनंद ले रहा था मगर पत्‍नी को खुशी दि‍खा दी तो समझो मार्केट में दो-तीन घंटे और घूमना पड़ सकता है!
शादी के बाद ये पहला मौका था तब हम इस तरह फोटो खिंचवाने आए थे। फोटो तैयार होकर 15 मि‍नट में मि‍ल गई। मेरे हाथ में जब ये कलर्ड फोटो आया तो अचानक ही मेरे जेहन में एक ब्‍लैक एण्‍ड वाइट तस्‍वीर कौंध गई! उस तस्‍वीर में मेरे मम्‍मी-पापा यूँ ही सटकर खड़े हैं और यूँ ही वे (एक-दूसरे की तरफ? ) झुके हैं और हॉं.. मंद-मंद मुस्‍कुरा भी रहें है!



1975-80 के आसपास ली गई ये तस्‍वीर न जाने कि‍स स्‍टूडि‍यो से ली गई होगी, कभी पूछूँगा। ये भी पूछूँगा कि‍ वे कि‍स तरह तैयार होकर स्‍टूडि‍यो तक गए होंगे। इति‍हास इस तरह सजीव हो जाता है मानो कल-परसो की ही बात हो! सभी लोगों के पास यादों की ऐसी सौगाद तस्‍वीरों में जरूर मौजूद होती है। आप लोगों के पास भी ऐसी कोई तस्‍वीर जरूर मि‍ल जाएगी। अगर आपको अपना एलबम नि‍काले करीब साल भर हो गया है तो छुट्टी के दि‍न सब मि‍लकर एलबम नि‍कालकर जरूर देखें।
ब्‍लैक एण्‍ड वाइट फोटो में इस तरह कलर भरकर आप भी खुश हो जाऍगें, मेरा वादा है ये!



(ये तस्‍वीर मेरे छोटे भाई वि‍जय के पास एलबम में थी, जो दूसरे शहर में रहता है। मैंने उससे कहा कि‍ ये तस्‍वीर स्‍कैन करवा के भि‍जवा दो। वैसे तो वह मेरा कोई काम दो-चार दि‍न लेकर आराम से करता है मगर इस काम के लि‍ए वह उसी शाम बाजार गया। उसे अमि‍ताभ की 'बागवॉं' फि‍ल्‍म बहुत पसंद जो है !!)

Sunday, 31 January 2010

‘बीप-बीप’ के बीच इमोशनल अत्याचार !!

साल में ऐसे मौके कम ही होते हैं जब आपको टीवी देखने का अवसर कुछ ज्यादा ही प्राप्त होता है। अभी मेरा दौर ऐसा ही चल रहा है। कुछ-कुछ खाली भी हू या यूँ कहि‍ए कुछ खाली महसूस करने के लि‍ए टीवी देखने लगा हूँ। लंबे सफर की थकान तब थोड़ी-बहुत उतर ही जाती है जब आधी रात को, आधे रास्ते के बाद, भोजन पानी के लि‍ए बस कि‍सी ढाबे पर रूकती है। व्यस्तता की इस लंबी सडक पर मुझे ये तो नहीं पता कि‍ रास्ता आधा तय हो गया है या रात आधी हो गई है, पर कहीं ठहरकर इस बारे में सोचना अच्छा लगता है।
‘यू टीवी बिं‍दास’ पर ‘इमोशनल अत्याचार’ के दो एपि‍सोड को देखकर सोच में पड़ गया कि‍ पुरूष प्रेमि‍यों का इम्ति‍हान जि‍स तरह लि‍या जा रहा है, उससे कि‍तने मर्द बच सकते हैं? इस सीरि‍यल में पूर्वनि‍योजि‍त योजना के तहत एक सुंदर-सी लड़की को कि‍सी के प्रेमी के पास भेजकर ऐसा माहौल तैयार कि‍या जाता है कि‍ उसकी आपत्ति‍जनक वि‍डि‍यो तैयार की जा सके। साथ ही ऐसे संवाद उगलवाये जाते हैं जो उस पुरूष के व्यभि‍चार को उभारता है। पुरूषों की मूलभूत कमजोरि‍यों को इस सीरि‍यल का आधार बनाकर उसकी प्रेमि‍का या पत्नी के सामने उसके आपति‍जनक दृश्यों को दि‍खाकर पूछा जाता है कि‍ देखो, आपके प्रेमी ने आपके साथ कि‍तना बड़ा वि‍श्वासघात कि‍या है! फि‍र उसे रंगे हाथों पकड़वाकर नाटकीय दृश्य पैदा कि‍या जाता है। गालि‍यों की बौछार को बीप-बीप में छि‍पाया जाता है। झगड़े की इन्टेनसि‍टी (तीव्रता) को नापना हो तो कि‍तनी बार बीप-बीप बजा, उसे नोट करते जाओ।
दूसरे एंगि‍ल से सोचूँ तो ये मसाला सीरि‍यल तैयार करने के लि‍ए प्रेमी-युगल को सहमति‍ में लेकर भी तैयार कि‍या जा सकता है। अगर ऐसा है फि‍र भी यह एक प्रश्न मन में तो छोड़ ही जाता है कि‍ आप अपनी पत्नी या प्रेमि‍का के साथ कि‍तने वफादार हैं। क्या् आपका वि‍श्वामि‍त्रीय मन मेनका टाइप लड़की को आपकी तरफ आकर्षि‍त होते देख अपनी वफादारी कायम रख सकते हैं? इस आपातकाल में इन चार-पॉंच वि‍कल्पों में से आपका नि‍र्णय क्या होता-
1 आप घरवाली-बाहरवाली की जि‍म्मेदारी एक साथ उठाते।
2 आप अपनी प्रेमि‍का या पत्नी‍ को इस घटना/दुर्घटना से अवगत कराते।
3 आप उस स्त्री को धि‍क्कारते जो जबरदस्ती आपके जीवन में प्रवेश करना चाहती है।
4 आप ‘क्या करूँ या ना करूँ’ की स्थित‍ि‍ ‍से पगलाए रहते।
5 आप कुछ और ही रास्ता अपनाते तो क्या अपनाते।

दि‍माग तो ये कहता है कि‍ मैं नम्बर टू वि‍कल्प अपनाता, मगर दि‍ल का भरोसा कैसे करूँ :)


Wednesday, 27 January 2010

न मि‍ले सुर मेरा तुम्हारा.........

ऐसा लगने लगा है जैसे हमारे आज के सुपर स्टार मंच और घर के ऑंगन का फर्क भूलते जा रहे हैं।

‘मि‍ले सुर मेरा तुम्हारा’ का नया संस्क‍रण आ गया है। हैरानी होती है कि‍ इस गीत के आधुनि‍क संस्करण में आम आदमी की मौजूदगी नदारत है। और तो और, आमि‍र खान या सलमान खान अपने बनाये हुए खॉंचें से बाहर आने का कोई प्रयास नहीं करते। आमिर खान की क्लीपि‍ग में ‘ऐ क्या बोलती तू’ का सड़कछाप धुन मि‍श्रि‍त है।

‘मि‍ले सुर मेरा तुम्हारा’ के पुराने संस्करण में प्रादेशि‍क भाषा, वेषभूषा के साथ-साथ वहॉं की जातीय छवि‍ भी नजर आई थी। आम आदमी की मौजूदगी वहॉं ज्यादा थी, बॉलीवुड के अभि‍नेता और अभि‍नेत्रि‍यॉं भी थे, पर अपने नाम से ज्यादा वे अपने प्रादेशि‍क चरि‍त्र को उभार रहे थे । पं भीम सेन जोशी के सुर से आरंभ होकर राष्ट्र गान पर समापन वास्तव में सुर को मि‍लाने का वह एक बेहतरीन प्रयास था।
पुराने संस्करण में बरखा है, बादल है,नदी है पर्वत है, खेत और ट्रैक्टर है, उँट और हाथी है, सागर है लहरें है, वहॉं गॉंव और शहर का एक अपना सुर है, महानगर का एक अपना सुर है । यानी यहॉं प्रकृति‍ और मनुष्य का आदि‍म रि‍श्ता भारतीय वि‍वि‍धता में जैसे समाहि‍त-सी नजर आती है।‍
पुराने संस्करण की सबसे बेजोड़ बात है कि‍ उसमें बंगला पंजाबी, मलयालम, कन्नड़ जैसे सभी प्रमुख प्रादेशि‍क भाषाओं में इस सुर को पि‍रोने का प्रयास कि‍या गया है। इस प्रयास से दर्शक या श्रोता का भारतीय मन वास्तव में सुरों के संगम का अहसास करता है, वह अलग अलग भाषाओं में नीहि‍त संदेश की एकरूपता को न केवल महसूस करता है बल्कि ‍ उसे स्वीकार भी करने लगता है। पुराने संस्करण के दृश्य संयोजन का यही जादू है।
पर नये संस्करण में न कोई भाषा है न संगीत की मधुरता। मि‍ला-जुलाकर यह भारतीय परंपरा और संस्कृति‍ को बयान करने के बजाए बॉलीवुड के स्टार्स को प्रमोट करती नजर आती है। अपने आपको इति‍हास में दर्ज कराने के इस प्रयास में यहॉं एक हास्यास्पाद दृश्य पैदा हो जाता है। संगीत में जो सार है, अर्थ है वो गुम हो जाता है और अंत में ऐसा प्रतीत होता है जैसे बेसुरों ने सुर मि‍लाने की कोशि‍श की हो। प्राथमि‍कता बदल जाने के कारण ऐसा बेसुरा प्रदर्शन हमें हैरान नहीं करता बल्कि ‍ दुखी करता है।

Friday, 11 December 2009

प्रि‍ये! तुम्हारे लि‍ए.......

सच कहूँ तो फुर्सत मि‍ली नहीं
कि‍ याद तुम्हें कर पाऊँ
पर जो कुछ भी कर रहा हूँ
ये सब तुम्हारे लि‍ए है।

मैंने कभी नहीं कहा था
तुम्हारे लि‍ए तोड़ लाऊँगा चॉंद-तारे।
सच तो ये है कि‍
तुम तक पहुँचने के लि‍ए
अपने हाथों से मुझे
बनानी पड़ रही है सड़क
..........तोड़ने पड़ रहे हैं पत्थर।

मुझे मालूम है
बर्तन-बासन मॉंजते
तुम्हारे हाथ पत्थ़र हो गए हैं
मुझे माफ करना मेरी प्रि‍ये!
मैं नहीं तोड़ पाया ये पत्थर .......

मैंने नहीं कहा था कि‍
मैं लौटकर आऊँगा
पर चाहा था कि‍ इंतजार करना.........।
माना कि‍ सरहद पर नहीं जा रहा था
पर अपनी दहलीज पर
हरेक को लड़ना पड़ता है जिंदगी से
एक फौजी की तरह।
और वैसे भी
जो लड़ नहीं पाता
वो बेमौत मारा जाता है.......

फि‍लहाल मच्छरों के बीच
थककर उचाट सोया हूँ,
नींद है भी और नहीं भी
हि‍चकता हूँ याद तुम्हें करते हुए....

अब तो मेरी मुन्नी भी
पप्पा -पप्पा करने लगी होगी
अरमानों का चूल्हा-चौका
भरने लगी होगी।



मैं आऊँगा मि‍लने उससे
भर लाऊँगा कपड़े लत्ते।
मेरी बन्नो तेरी बिंदि‍या-चूड़ी
लेकर नहीं आ पाऊँगा।
जानता हूँ
तुम्हे इसका अरमान रहा भी कब
मेरा आना ही तुम्हारे लि‍ए
हर कारज सि‍द्ध होना है....

आने का वादा अभी कर नहीं सकता
क्योंकि‍ कल फि‍र काम पर जाना है।
और सच कहूँ प्रि‍ये
ये सब तुम्हा्रे लि‍ए है..........

-जि‍तेन्‍द्र भगत
(चि‍त्र गूगल से)