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Wednesday, 19 October 2011

अब कहॉं मि‍लेंगें वो साथी

यहॉं आना ठीक वैसा ही लगता है जैसे ऑफि‍स और मीटिंग से नि‍कलकर खेल के उस मैदान पर चले आना जहॉं बचपन में अपने दोस्‍तों के साथ खूब खेला करते थे। ऐसा महसूस होता है जैसे मैं अपने काम में ज्‍यादा ही व्‍यस्‍त हो गया और साथ खेलने वाले लोग अब न जाने क्‍या कर रहे होंगे, कहॉं होंगे।
खुशी होती है उन लोगों को अब तक सक्रि‍य देखकर जो 2-3 साल पहले भी इतने ही सक्रि‍य थे। जो लोग इस रि‍श्‍ते को नि‍भा पाए हैं मैं आश्‍वस्‍त होकर कह सकता हूँ कि‍ नेट के नेटवर्क के बाहर भी उनके रि‍श्‍ते भी इतने ही गहरे होंगे।

कुछ दि‍न पहले मोबाइल गुम होने के बाद मुझे एंड्रायड फीचर वाला मोबाइल फोन (एल जी- ऑप्‍टीमस ब्‍लैक-पी 970) खरीदने का मौका मि‍ला। उसमें मैंने वाइ-फाई से सेट हिंदी का टूल लोड कि‍या जि‍ससे मैं हिंदी ब्‍लाग पढ़ पा रहा हूँ।

शायद ये मुझे फि‍र से ब्‍लॉग की तरफ खींच पाए।

ब्‍लॉगवाणी के चले जाने के बाद ब्‍लॉग पढना-लि‍खना बंद सा हो गया था। अब इसकी जगह कौन सा एग्रीगेटर ज्‍यादा चलन में हैं, उसका लिंक दे तो अच्‍छा रहे।

क्‍या कोई बंधू बता सकता है कि‍ मेरे एड़ायड फोन में हिंदी को पढ पाने का बेहतर तरीका/टूल कौन सा हो सकता है।

जल्‍दी ही मि‍लूँगा

जि‍तेन

Sunday, 19 June 2011

चीटि‍यों की लाश!!

कमरे की दीवारों के तमाम मोड़ों और फर्श पर बारीक गड्ढो से होकर चीटि‍यों की लंबी कतार आवागमन में इस तरह व्‍यस्‍त थीं जैसे कोई त्‍योहार हो इनके यहॉं। सबके हाथों में सफेद रंग की कोई चीज थी।
इन दि‍नों घर के हरेक कोने में, कि‍चन में, यहॉं तक कि‍ फ्रि‍ज में भी चीटि‍यों का कब्‍जा हो गया था। बेड पर सोते हुए काट लेती थी, हैंगर और सर्ट के कॉलर में भी ये छि‍पकर बैठी होती थी। कल बेटे के बाजू में इनके काटने से मैं काफी परेशान था और कि‍सी उपाय की तलाश में था। पर इन्‍हें अपने घर से नि‍कालना मुश्‍कि‍ल ही नहीं, नामुमकि‍न लग रहा था। इसलि‍ए लक्ष्‍मण-रेखा हाथ में लेकर मैं इनकी यात्रा मार्ग में जगह-जगह रेडलाइट बनाने लगा।
सभी यात्री अपनी जगह ऐसे अटक कर खड़े होने लगे थे जैसे पहाड़ी रास्‍तों पर बर्फबारी या चट्टानें खि‍सकने से गाड़ि‍यॉं अटककर खड़ी हो जाती है।

लक्ष्‍मण रेखा काफी प्रभावी लग रहा था। सैकड़ों की संख्‍या में चीटि‍यॉं बेहोश लगने लगी थी। मुझे ऐसा लगा जैसे उसके आसपास की चीटि‍यॉं उसे घेरकर खड़ी हो। समझ नहीं आया मैंने ये सही कि‍या या गलत! मेरे परि‍वार के कुछ सदस्‍य मैंदानों में रोज सुबह चीटि‍यों को आटा/चीनी देकर आते हैं, पर वे भी मेरे इस नृशंस कृत्‍य पर आलोचना करने की बजाए इन्‍हें बाहर करने के दूसरे उपायों पर चर्चा करते पाए गए।
15 मि‍नट बाद सैकड़ों चीटि‍यों की लाश फर्श पर अपनी जगह पड़ी हुई थी,और इन लाशों को ठि‍काने लगाने के लि‍ए झाड़ू-पोछा ढूँढा जा रहा था.....

एक बेतुका-सा ख्‍याल आया कि‍ सरकार और अनशनकारि‍यों के बीच कुछ ऐसा ही तो नहीं चल रहा है.......

Saturday, 9 April 2011

शि‍मला के बहाने ट्रेन का सफर (भाग-3)

माल रोड से हमें गाड़ी समय पर मि‍ल गई और हम शि‍मला स्‍टेशन करीब 15:40 तक पहुँच गए। इशान इस खाली-से स्‍टेशन पर बेखौफ इधर-उधर भाग रहा था। अब हमारे सफर में एक नई कड़ी जुड़ने वाली थी- रेल मोटर।


इशान की खुशी का ठि‍काना नहीं था, उसके लि‍ए यह ट्रेन के इंजन में बैठने जैसा अनुभव था, वह भाग कर उसमें जा बैठा।






आप इसे पटरी पर दौड़नेवाली बस या मोटर-कार मान सकते हैं, जि‍समें मात्र 16 सीटें ही होती हैं। आगे-पीछे, अगल-बगल और ऊपर की तरफ रेल-मोटर की खि‍ड़कि‍यॉं पारदर्शी होती हैं जि‍ससे आसमान के अलावा आप पटरी के दोनों तरफ पेड़-पौधे, पहाड़ और सुरंगों को आसानी से देख सकते हैं।



रेल-मोटर के आगे-पीछे पटरि‍यों का नजर आना एक अच्‍छा अनुभव था। इस अनुभव में खटकनेवाली अगर कोई बात थी तो यही कि‍ यह डी.टी.सी. बस की तरह शोर मचाती हुई और हि‍लती हुई भाग रही थी।




इसके बावजूद इशान और सोनि‍या अपनी सीट पर कुछ देर बाद सोते हुए पाए गए। एक बात तो बताना भूल ही गया कि‍ इस रेल मोटर के ड्राइवर एक सरदार जी थे।





रेल-मोटर में नि‍क और हाइडी श्रीम्‍प्‍टन तथा उनके दोनो बच्‍चे एमीजन और और एलि‍यट से मि‍लना भी एक अच्‍छा इत्‍तफाक रहा। इस तरह करीब दो-ढाई घंटे बाद हम बड़ोग पहुँच गए, जो 33 नंबर टनल के ठीक साथ बना हुआ है।



33 नंबर टनल इस पूरे सफर का सबसे खास पड़ाव है, और सही मायने में मेरी मंजि‍ल तो यही थी। शि‍मला जाते हुए मैंने कई बार यहॉं रूकने का मन बनाया था, लेकि‍न मौका आज मि‍ला, और वह भी सपरि‍वार।
जब मैंने बड़ोग रूकने का कार्यक्रम बनाया तब मुझे पक्‍का नहीं था कि‍ एक छोटे बच्‍चे के साथ वहॉं रूकने और खाने-पीने की क्‍या व्‍यवस्‍था होगी। ट्रेन के ऑन-लाइन रि‍जर्वेशन कराने के दौरान ये पता करने के लि‍ए मैंने बड़ोग स्‍टेशन का फोन नंबर( 01792238814) इंटरनेट से बहुत मुश्‍ि‍कल से ढूँढ नि‍काला। स्‍टेशन मास्‍टर अपेक्षाकृत सभ्‍य भाषा में बोला, जि‍सके हम आदी नहीं हैं। तब उसने बताया था कि‍ यहॉं कि‍सी तरह की कोई दि‍क्‍कत नहीं आएगी।
रेल-मोटर से उतरने के बाद ऐसा लगा जैसे अचानक ही अंधेरा घि‍र आया हो क्‍योंकि‍ यह घने वृक्षों और पहाड़ के ठीक साथ ही था।अब मुझे इस स्‍टेशन पर रहने-खाने की चिंता सता रही थी।

क्रमश:

अन्‍ना हजारे की बात सरकार ने मान ली है और भ्रष्‍टाचार के खि‍लाफ जन लोकपाल का ड़ाफ्ट 30 जून तक तैयार हो जाएगा, और उसके बाद मानसून सत्र में इस बील को पेश कि‍या जाएगा। इस आंदोलन ने गॉंधी के प्रति‍ आस्था और आम जनता के आत्‍मवि‍श्‍वास को पुनर्जीवि‍त कर दि‍या है।
लेकि‍न.......क्‍या यह कह देने मात्र से हमारा कर्तव्‍य पूरा हो जाता है कि‍ हम इस आंदोलन के साथ है- इस सवाल का संबंध सि‍र्फ इस आंदोलन से नहीं है, बल्‍कि‍ यहॉं खुद के भीतर झॉंकने की जरूरत है कि‍ हम कहॉं-कहॉं दूसरों का काम करने के लि‍ए रि‍श्‍वत लेते हैं और अपना काम कराने के लि‍ए रि‍श्‍वत देते हैं।
सतत क्रमश:

Thursday, 7 April 2011

शि‍मला के बहाने ट्रेन का सफर भाग-2

शि‍मला स्‍टेशन बहुत खूबसूरत स्‍टेशन है, जहॉं बैठकर आप बोर नहीं हो सकते। वैसे भी मेरी यही इच्‍छा रहती थी कि‍ मैं शि‍मला आऊँ तो स्‍टेशन से ही वापस लौट जाऊँ।

इसके पीछे कारण है- शि‍मला की बढ़ती आबादी,घटते पेड़ और बढ़ते मकान,व्‍यवसायीकरण, ट्रैफि‍क और अत्‍यधि‍क शोर।




हम यहॉं 12 बजे तक पहुँच गए थे, और शाम को वापस 4 बजे यहीं आकर हमें बड़ोग के लि‍ए रेल मोटर पकड़ना था। सबसे पहले हमने स्‍टेशन पर ही रेस्‍टॉरेंट में खाना खाया। अब 4 घंटे में हमें माल रोड से घुमकर वापस आना था, इसलि‍ए हमने लि‍फ्ट तक जाने के लि‍ए टैक्‍सी ली।



15-20 मि‍नट में हम माल रोड पर आ चुके थे। ऊपर जाने तक के रास्‍ते में कपड़ों की मार्केट लगी हुई थी। मुझे वहॉं कुछ जैकेट काफी पसंद आए, पर समय की कमी की वजह से मैंने सोचा कि‍ दि‍ल्‍ली से खरीद लूँगा।(वापस लौटने पर दि‍ल्‍ली में मैंने वैसे जैकेट ढ़ँढने की कोशि‍श की पर वे पसंद नहीं आई )।
उसी मार्केट में चलते हुए इशान खि‍लौने की जि‍द करने लगा। मैंने उसे 50 रूपये का एक छोटा-सा टेलि‍स्‍कोप दि‍लवाकर पीछा छुटवाया। हमें यहॉं पर दो घंटे बि‍ताने थे, पर ये समय जाते देर न लगी।



लाल रंग के उस टेलि‍स्‍कोप को इशान कैमरा ही समझ रहा था। जैसे मैं उसका फोटो ले रहा था, वह भी मुँह से 'खि‍च-खि‍च' की आवाज नि‍काल लेकर मेरा फोटो ले रहा था।



उसके बाद मैंने आसपास के मनोरम दृश्‍यों का फोटो लि‍या-



और अपने हमसफर का भी-



फि‍र इशान को आइसक्रीम दि‍लाया और स्‍टेशन के लि‍ए चल पड़े।



नीचे की तस्‍वीर में ऊपर की तरफ जाखू पर्वत पर हनुमान जी की सबसे ऊँची मूर्ति‍ नजर आ रही है, जि‍सका अनावरण इसी साल हुआ था और उस अवसर पर अभि‍षेक बच्‍चन भी मौजूद थे।


माल रोड से पश्‍चि‍म की तरफ,जि‍धर बी.एस.एन.एल का ऑफि‍स और वि‍धानसभा है, उधर हर एकाध-घंटे पर टवेरा टाइप की सरकारी गाड़ी चलती है। हम उसका इंतजार करने लगे।






3 बज गए पर तबतक कोई गाड़ी नहीं आई। वहॉं खड़े ट्रैफि‍क पुलि‍स से हम 3-4 बार गाड़ी का समय पूछ चुके थे, पर उसने इंतजार करने को कहा। हमें लगा यदि‍ समय पर हम स्‍टेशन न पहुँचे तो रात हमें शि‍मला में बि‍तानी पड़ेगी और रेल मोटर के मजेदार सफर से भी हम वंचि‍त रह सकते थे।

क्रमश:

शि‍मला के बहाने ट्रेन का सफर भाग-1

6 दि‍सम्‍बर 2010 की रात हमदोनों अपने बेटे इशान के साथ पुरानी दि‍ल्‍ली रेलवे स्‍टेशन पहुँचे। वैसे टि‍कट सब्‍जी मंडी से थी, लेकि‍न ट्रेन लेट थी और सब्‍जी मंडी का रेलवे स्‍टेशन काफी सुनसान रहता है, इसलि‍ए वहॉं इंतजार करना हमें उचि‍त नहीं लगा।
इस सफर का पूरा सि‍ड्यूल इस प्रकार था-
6 दि‍संबर - दि‍ल्‍ली से कालका - 20:45 से 4:40 हावड़ा दि‍ल्‍ली कालका मेल(2311)फर्स्‍ट एसी 900/-प्रति‍ व्‍यक्‍ति‍
7 दि‍संबर - कालका से शि‍मला - 5:30 से 10-15 शि‍वालि‍क डि‍लक्‍स एक्‍सप्रेस(241) 280/- प्रति‍ व्‍यक्‍ति‍
7 दि‍संबर - शि‍मला से बड़ोग - 16:40 से 17:15 रेल मोटर प्रति‍ व्‍यक्‍ति‍
8 दि‍संबर - बड़ोग से कालका - 13:30 से 16:40 हि‍मालयन क्‍वीन(256) 167/- प्रति‍ व्‍यक्‍ति‍
8 दि‍संबर - कालका से दि‍ल्‍ली - 17:45 से 21:50 कालका शताब्‍दी(2012) फर्स्‍ट सीसी 990/- प्रति‍ व्‍यक्‍ति‍

रात का सफर आरामदायक रहा,फर्स्‍ट एसी होने के बावजूद और लेट नाइट ट्रेन होने की वजह से चाय-पानी की सुवि‍धा यहॉं नहीं मि‍ली। खैर, सुबह 6 बजे के करीब हम कालका जी पहुँच गए, सही समय से करीब 2 घंटे लेट। इशान की नींद अभी पूरी नहीं हुई थी।


वास्‍तव में इशान ट्रेन को लेकर काफी क्रेजी रहता है, इसलि‍ए यह पूरा सफर मैंने मुख्‍यत: ट्रेन पर फोकस कि‍या था, कि‍सी टूरि‍स्‍ट आकर्षक के लि‍ए नहीं। इसलि‍ए टॉय ट्रेन, रेल कार, चेयर कार आदि‍ को ध्‍यान में रखकर मैंने टि‍कट कटाया था।
दूसरी बात ये थी कि‍ सोनि‍या को कार से उलटी की शि‍कायत रहती है, इसलि‍ए उसके साथ सफर करने के लि‍ए मेरे पास ट्रेन एक आसान वि‍कल्‍प था।
ट्रेन कोहरे की वजह से हावड़ा से दि‍ल्‍ली लेट पहुँची थी, इसलि‍ए कालका भी लेट पहूँची, लेकि‍न कालका से चलनेवाली शि‍वालि‍क ट्रेन इससे कनेक्‍टेड है, इसलि‍ए वह भी इस ट्रेन के कालका पहुँचने का इंतजार करती है।



धीरे-धीरे भोर हो चला था। बीच में इशान की नींद खुली, पर बोतल से दूध पीने के बाद वह फि‍र सो गया। इशान को मैंने अपने गोद में सुलाया हुआ था, और सीट काफी छोटी होने की वजह से काफी दि‍क्‍कत हो रही थी। कभी दुबारा आना हो तो बच्‍चे के लि‍ए भी सीट बुक कराना समझदारी रहेगी।
पहाड़ों के बीच ट्रेन चली जा रही थी। कालका से शि‍मला के बीच 105 सुरंग है। मैं इंतजार कर रहा था कि‍ कब टनल नंबर 33 आए और हम वहॉं उतर कर नाश्‍ता वगैरह ले सके।

क्रमश:

Tuesday, 1 March 2011

इन दि‍नों !!

जिंदगी के कई रंग होते हैं
कुछ रंग वह खुद दि‍खाती है,
कुछ हमें भरना पड़ता है!

उन्‍हीं रंगो की तलाश में
भटक रहा हूँ मैं इन दि‍नों!

(1)

अनजाने कि‍सी मोड़ पर
पता न पूछ लेना!
हर शख्‍स की नि‍गाह
शक से भरी है इन दि‍नों!

मौसम से करें क्‍या शि‍कवा
हर साल वह तो आता है!
इस बार की बयार है कुछ और
कयामत आई है इन दि‍नों!

फरेबी बन गया हूँ मैं
खाया है जो मैंने धोखा!
अब रोटी से नहीं
भूख मि‍टती है इन दि‍नों!

(2)
सुना है उनकी तस्‍वीर
बदली-बदली सी लग रही है!
सच तो ये है कि‍ वे खुद भी
बदले-बदले-से हैं इन दि‍नों।

पहले इक नजर के इशारे में
हाजि‍र हो जाते थे!
अब तो पुकारने पर भी
नजर नहीं आते हैं इन दि‍नों!


तुम हँसती थी
बेवजह
चहकती थी हर वक्‍त!
आज वजह तो नहीं है मगर
काश हँस देती इन दि‍नों!

(3)

मुझसे न पूछो यारों
है घर कहॉं तुम्‍हारा!
घर बसाने की चाहत में
बेघर-सा हूँ इन दि‍नों!


बहुत दूर आ गया हूँ
पीछे रह गई हैं यादे!
बेगाने शहर में ओ मॉं!
बरबस याद आती हो इन दि‍नो!

यूँ तो जिंदगी है काफी लंबी
और हसरतों की उम्र उससे भी लंबी!
जिंदा रहने की हसरत बनी रहे
इतना भी काफी है इन दि‍नों!!

-जि‍तेन्‍द्र भगत

Monday, 6 December 2010

LUCKnow : by chance (अंति‍म कड़ी)

गाइड हमें लखनऊ के इमामबाड़े से बाहर ले आया क्‍योंकि‍ भुल-भुलैया जाने का रास्‍ता बाहर से था। भूख लग आई थी, पर अब भुलभुलैया और शाही बावली देखने के बाद ही खाने का इरादा बनाया। दोपहर के दो बजे तब धूप का पता ना था और ठंड शाम की तरफ पैर फैला रही थी। भुलभुलैये के पास वही टि‍कट दि‍खाकर हम सीढ़ि‍यों से करीब दो-तीन फ्लोर तक ऊपर चढ़ गए। सामने करीब 6 फुट का गलि‍यारा हर तरफ से नि‍कलता नजर आया।

भुल-भुलैया इमामबाड़े के हॉल के ऊपर ही बना हुआ है जि‍समें अनेक छज्‍जे व 489 द्वारों वाले एक जैसे रास्‍ते हैं।




इस संरचना का उद्देश्‍य मुस्‍लि‍म समाज की धार्मिक आवश्‍यकताओं की पूर्ति व 1784 ई. में हुए वि‍नाशकारी अकाल के दौरान लोगों को सहायता प्रदान करना था।
गाइड ने भुलभुलैये में ले जाते हुए कहा कि‍ ये रास्‍ता याद रखना क्‍योंकि‍ लौटते हुए हमें खुद इसी रास्‍ते से वापस लौटना है। वह उसे ज्‍यादा मुश्‍कि‍ल बता रहा था पर मुझे यह ज्‍यादा मुश्‍कि‍ल नहीं लगा। भुलभुलाये से ऊपर इमामबाड़े की छत से गोमती नदी के तरफ का दृश्‍य काफी सुंदर नजर आ रहा था।




बाहर आने के बाद हम शाही बावली की तरफ चल पड़े। आपको जानकर हैरानी होगी कि‍ ऐसी ही एक बावली दि‍ल्‍ली में कनॉट प्‍लेस के पास भी है-

गाइड ने बताया कि‍ अंग्रेजों से बचने के लि‍ए नवाब ने इसी में खजाने की चाबी गि‍रा दी थी। बाद में अंग्रेज इसका पानी नि‍कालते रहे पर यह बावली खाली ही नहीं होती थी। इसका कारण यह था कि‍ यह साथ बहनेवाली गोमती नदी से सीधे जुड़ी हुई थी।
यहॉ बैठकर बाहर से आनेवाले का रंगीन प्रति‍बिंब देखा जा सकता था, मगर वह खुद दूसरों को नजर नहीं आता।

गाइड को पैसे देकर इमामबाड़े से हम करीब एक घंटे में बाहर नि‍कल आए और बाहर नि‍कलते ही एक सुंदर इमारत रोड के उस पार नजर आई-

वहीं एक टांगेवाला हमें पकड़ लेता है और सुझाव देता है कि‍‍ आप छोटे इमामबाड़े और वहॉं के म्‍यूजि‍यम में जाकर समय खराब करना चाहते हैं तो आपकी मर्जी मगर आप चि‍कन की कढ़ाई की फैक्‍ट्री जाऍं तो ज्‍यादा बेहतर। मैं समझ गया कि‍ यहॉं आगरे के लाल कि‍ले के पास खड़े टांगेवालों का एक जैसा ही हाल है। वैसे इति‍हास के पन्‍नों से बाहर अब हम कला का नमूना देखना चाहते थे। हम तांगे पर बैठकर चल पड़े। सामने ही रूमी दरवाजा था जो इस तरफ से झरोखों से युक्‍त तीन मंजि‍ला दरवाजे के रूप में नजर आ रहा था जबकि‍...

उसपार नि‍कल जाने पर वह एक ऊँचे दरवाजे के रूप में खड़ा दि‍खाई दे रहा था और यही इसकी खासीयत थी-


तांगेवाला हमें बताने लगा कि‍ लखनऊ की‍ छ: चीजें प्रसि‍द्ध हैं-
1.इमामबाड़ा
2. तांगा
3. तहजीब
4. कुंदा कवाब
5.उमरावॅ जान
6. कपड़े पर चि‍कन का काम
आप समझ गए होंगे कि‍ तांगा दूसरे नंबर पर क्‍यों है, बकौल तांगेवाला- यह नवाबों की शाही सवारी थी। कपड़े की दुकान को फैक्‍ट्री बताकर उसने हमें एक जगह उतार दि‍या। दुकान के बाहर खड़े गार्ड ने हमें अंदर आने का आग्रह कि‍या।
हम असमंजस कदमों से अंदर गए और पूछा कि‍ यहॉं चि‍कन कढ़ाई का काम कहॉं चल रहा है। अंदर एक कमरे में एक लड़की बुनाई कढ़ाई का काम कर रही थी। उसके बाद हम दुकान के काउंटर पर गए।
20-25 मि‍नट में हम वापस जाने के लि‍ए ऑटो तलाश रहे थे। या तो हमें इस कला की समझ नहीं थी या ये जगह चि‍कन कढ़ाई की फैक्‍ट्री नहीं थी, या ये लखनऊ नहीं था और सबसे ज्‍यादा हम इस बात से सहमत थे कि‍ अब दि‍ल्‍ली में सबकुछ मि‍लता है और सही कीमत पर।
हजरतगंज लखनऊ का कनाट प्‍लेस है मगर अभी उसकी हालत बि‍गड़ी हुई थी। वहॉं का जनपथ मार्केटिंग के लि‍हाज से ठीक लगी, पर थी बहुत महंगी। शाम हो चुकी थी और ठंड बढ़ने के साथ हम घर पहुँच चुके थे। रात तो लखनऊ मेल से वापस जाने से पहले दोस्‍त के साथ डि‍नर भी करना था। मि‍ला जुलाकर लखनऊ को हम बस इमामबाड़े और दोस्‍त की मेहमानवाजी की वजह से याद रख सकते थे।
कोई ये समझाएगा कि‍ लखनऊ को अंग्रेजी में luck + now = lucknow क्‍यों लि‍खते हैं जबकि‍ होना चाहि‍ए lukhnou या कुछ और....
लगता है लखनऊ में जाते ही luck काम करने लगता है :)

.....क्‍योंकि‍ हमारी ये यात्रा भी रही 'luck' by chance.
पहली कड़ी के लि‍ए यहॉं क्‍लीक करें

आज शाम मैं अपनी पत्‍नी और बेटे के साथ 4 घंटे के लि‍ए शि‍मला-टूर पर जा रहा हूँ। 4 घंटे की टूर से हैरान मत होइए, लौटकर बताउँगा सफर के बारे में।