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Monday, 8 September 2014

DPM का पहला अंक 8 अगस्‍त को प्रकाशि‍त

किसी मैगज़ीन को पढ़ते हुए शायद ही महसूस किया कि एक मासिक पत्रिका निकलने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है। तब हम केवल पाठक होते हैं। उसके content से लेकर Design तक ठीक करने में काफी मशक्कत करनी पड़ती है। भाषा और प्रूफ का काम भी जिम्मेदारी भरा काम है। फिलहाल स्टाफ की कमी के कारण ये सभी कार्य खुद ही कर रहा हूँ!
यह एक NGO की नयी पत्रिका है, जिसके Editor,Publisher और Printer का कार्यभार मुझे सौंपा गया है।
पहला अंक अगस्त में निकल चुका है। अब सितम्बर में दूसरा अंक निकालने की तैयारी कर रहा हूँ।
आपका सुझाव और सामग्री दोनों का स्वागत है।

Monday, 10 March 2014

क्‍या खोया क्‍या पाया.....

अब क्‍या बताऊॅ, ज्‍यादा छि‍पने का नतीजा यही होता है कि‍ आदमी खुद को भी नहीं ढॅूढ पाता। सच तो ये है कि‍ वह कहीं छि‍पा नहीं होता  बल्‍कि‍ खो गया होता है........
काफी दि‍नों बाद अपने ब्‍लॉग नामक घर पर  आना हुआ तो पाया  कि‍ मेरे ब्‍लॉग से सारी तस्‍वीरें गायब हो चुकी हैं। कई लोगों ने बताया है कि‍ अगर घर में ताला लगाकर कई दि‍नों तक बाहर रहोगे तो अंदर का माल चोरी भी हो सकता है।
मैं यह सुनकर घबरा गया कि‍ चार-पॉंच साल की जमा-पूँजी अचानक कैसे उड़ गई। ताऊ जी ने कहा कि‍ बादाम खाकर दि‍माग दौड़ाओ। बादाम का असर ऐसा कि‍ मुझे याद आ गया कि‍ मैंने अपने स्‍मार्टफोन में पि‍कासा पर जाकर ब्‍लॉग के सभी तस्‍वीरों को पब्‍लि‍क से हाइड कर दि‍या था।
चलि‍ए बैठ कर अब इस घर में यदा-कदा चाय तो पी ही सकते हैं। आखि‍र घर भी अपना ही है, कि‍राये का नहीं।

Wednesday, 22 January 2014

ब्‍लॉग से सारे फोटो गायब!! HELP please !!

पि‍छले कई दि‍नों से मैं ब्‍लॉग पर सक्रि‍य नहीं था। लेकि‍न एक दि‍न जब मैं यहॉं लौटा तो सब कुछ लुटा पाया। सारे फोटो गायब थे। टेक्‍स्‍ट तो वहीं था मगर संदर्भ फोटो गायब थे। अब मैं एक ऐसे घर में महसूस कर रहा हूँ जहॉं दीवारें-दरवाजे तो हैं मगर सारा सामान गायब है। मेरी सारी जमा-पूँजी गायब हो गई।
आपसे मेरा प्रश्‍न है कि‍
1) ऐसा हुआ क्‍यों?
2) पहले कि‍सी के साथ ऐसा हुआ है?
3) क्‍या ये फोटो वापस पाए जा सकते हैं?
4) इसके लि‍ए कि‍स इमेल आई डी या लिंक पर शि‍कायत की जा सकती है?

करीब 155 पोस्‍ट में हजारों फोटो थे जो अब गायब हैं। नई पोस्‍ट में मैं फोटो लगाने में सक्षम हूँ पर पुरानों का क्‍या!


(फोटो के स्‍थान पर हर जगह एक वृत में माइनस का साइन मुँह चि‍ढाता हुआ, जैसे कह रहा हो- कैसा महसूस हो रहा है लुटकर!)

यदि‍ यह आज मेरे साथ हुआ है तो कि‍सी के साथ भी हो सकता है!
आपसे अनुरोध्‍ा है कि‍ आप मेरी मदद करें। मैं आपका अत्‍यंत आभारी रहूँगा। 

जि‍तेन्‍द्र भगत

Friday, 10 January 2014

एक मैगजीन का प्रकाशन.....

मि‍त्रों,
काफी दि‍नों बाद ब्‍लॉग पर वापस लौटा हूँ। इसबार एक स्‍वार्थवश। दरअसल मैंने पश्‍चि‍मी दि‍ल्‍ली के लि‍ए एक मैगजीन के अति‍थि‍ सम्‍पादक का जि‍म्‍मा लि‍या है और चाहता हूँ कि‍ उसमें कुछ मौलि‍क अभि‍यक्‍ति‍यों को शामि‍ल कि‍या जाए। इसका पहला अंक फरवरी 2014 में प्रकाशि‍त होगा, इसलि‍ए आपकी रचनाओं को मैं आपकी अनुमति‍ से शामि‍ल करना चाहता हूँ ।
इस मैगजीन का नाम एक एन.जी.ओ. के नाम पर ही रखा गया है- दि‍ल्‍ली पारि‍वारि‍क मंच।
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जि‍तेन्‍द्र कुमार भगत