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Friday, 23 April 2010

टक-टक.............

मोबाइल पर मुझे होल्‍ड पर रखकर वो कि‍सी से कह रही थी-
'रख लो बाबा, कोई बात नहीं।'
पीछे सब्‍जी-मंडी का शोर मुझे सैलाब-सा लग रहा था-
टमाटर तीस-टमाटर तीस-टमाटर तीस
गोभी बीस-प्‍याज बीस
धड़ी सौ-धड़ी सौ..........
मैंने चि‍ल्‍लाकर कहा-
-मेरा बी.पी. लो हो गया है, वहॉं से जल्‍दी नि‍कलो!!
यह कहकर मैंने फोन काट दि‍या।

स्‍ट्रीट लाइट के नीचे मैंने कार के लि‍ए कि‍सी तरह जगह बनाई। बंद कार में मेरा दम घुट रहा था और बाहर शोर, प्‍याजनुमा बदबू के साथ मि‍लकर वातावरण में पूरी तरह फैला हुआ था। एकदम भड़भडाता-सा बाजार अपने लौ में बहा जा रहा था। वहॉं सभी लोग कि‍सी-न-कि‍सी काम में व्‍यस्‍त थे-कहीं लोग गोल-गप्‍पे खा रहे थे, कहीं लोग मोल-भाव में जुटे थे,कोई खाली नहीं था..... सि‍वाये मेरे।
' सब्‍जी अकेले जाकर लाया करो, न मुझे भीड़ अच्‍छी लगती है न इंतजार!'
'कॉफी पि‍ओगे'- उसने मुस्‍कुराकर पूछा।
-'इस मंडी में तुम मुझे कॉफी पि‍लाओगी'
सी.सी.डी.* भी चल सकते हैं।
-माफ करो, वहॉं की महंगी काफी से घर की दाल भली। तुम फि‍जूलखर्ची बंद करो, अब मैं पैसे का हि‍साब लेना शुरू करूँगा।
मेरे पति‍देव,कॉफी 'लो बी.पी.' को कंट्रोल करती है, इसलि‍ए कह रही हूँ'
-उसने अपने रूमाल से मेरे सर का पसीना पोंछ दि‍या।

मैंने ड्राइव करते हुए पूछा-
फोन पर कि‍सी बाबा से बात करते सुना, कोई भीखारी था क्‍या?


-नहीं, एक बूढ़ा बाबा था। मैं आम खरीद रही थी तो देखा कि‍ वह बूढ़ा बाबा एक आम हाथ में लि‍ए दुकानदार से पूछ रहा है ये एक आम कि‍तने का है?
दस रूपये!
यह कहकर दुकानदार दूसरी तरफ व्‍यस्‍त हो गया।
उसने दबी हुई आवाज से कहा-
पॉंच रूपये में दोगे?
दुकानदार ने सुना नहीं तब उसने दुबारा कहा, तब भी दुकानदार तक उसकी आवाज पहुँची नहीं या उसने जानबूझकर अनसुना कर दि‍या। वह थोड़ी देर तक हाथ में आम को देखता रहा और वापस आम के ढेर पर रखकर आगे चल पड़ा।
गाड़ी रेडलाइट पर आकर खड़ी हो गई। कार के शीशे पर सि‍क्‍के से कि‍सी ने जोर से टक-टक की आवाज की। मैंने घूरकर उस लड़की की तरफ देखा जि‍सकी गोद में एक मरि‍यल-सा बच्‍चा टंगा पड़ा था। मेरी बेरूखी देखकर वह दूसरी कार की तरफ बढ़ गई।
कार चलते ही मैंने पूछा-
बूढ़े बाबा की बात पूरी हो गई?
नहीं, जब मैंने देखा कि‍ वह बाबा बड़ा मायूस होकर आगे चला गया तो मुझे बहुत तकलीफ हुई।
मैंने दुकानदार से कहा कि‍ उस बाबा को बुलाओ और दो कि‍लो आम तौलकर दे दो। पैसे मुझसे ले लेना।
दुकानदार तपाक से उसे बुला लाया। बाबा ने मुझसे कहा कि‍ मुझे इनमें से सि‍र्फ दो ही आम चाहि‍ए, मेरे पोते को आम बहुत पसंद है पर मेरे पास सि‍र्फ पॉंच रूपये ही थे।
मैंने कहा- बाबा आप सारे आम ले जाओ। बाबा ने जैसे अहसान से दबकर आभार जताया। तभी तुम्‍हारा फोन आया और तुम बड़बड़ कर रहे थे।
मुझे क्‍या पता था कि‍ तुम आम बॉट रही हो!
मैंने उसके चेहरे की तरफ देखा, उसके चेहरे पर सकून की एक आभा चमक रही थी।

अगली रेडलाइट पर कार की खि‍ड़की पर फि‍र टक-टक की आवाज हुई........
लेकि‍न तबतक ग्रीन लाइट हो चुकी थी।

* सी.सी.डी.= cafe coffee day
(चि‍त्र गूगल से साभार)

15 comments:

anjule shyam said...

पोते की चाहत दो आम बड़े बड़े अहसान लेने पे मजबूर कर गई,उस बाबा को...
आँखे भीग गई सर मत लिखा करे एसी पोस्ट...मशीन बन चुके हम लोगों को आदमीं बनने पे मजबूर करती है एसे आर्टिकल...

डॉ .अनुराग said...

इत्तिफाक से कुछ दिन पहले गुलज़ार साहब की एक नज़्म पढ़ी थी ट्रेफिक सिग्नल ......आपने एक कैनवस खीचा है उथली उथली जिंदगी का ....

सुशील कुमार छौक्कर said...

अक्सर ऐसे वाक्या से मुलाकात हो जाती है। और ये सोचने के लिए मजबूर करते है। पढकर ऐसा लगा जैसे ये वाक्या अभी सामने ही घटा हो। मजबूरी और गरीबी आदमी को अंदर से तोड़ देती है।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

न जाने कितने ऐसे बाबा और पोते हैं इस देश में जिनकी तमन्ना अधूरी ही रह जाती है.

Udan Tashtari said...

इतनी असमानताओं और जद्दो जहेद की बीच जीते यदि इसी तरह कुछ संवेदनशीलता बच रहे तो ही बहुत बड़ा सुकून है..भीगा गई पोस्ट!

राज भाटिय़ा said...

मुझे यह बहुत अच्छा लगा, किसी का ख्याल करना एक पुजा से ज्यादा अच्छा है, वो बाबा पता नही कितना खुश हुआ होगा.... मेरी तरफ़ से आप दोनो का धन्यवाद

ताऊ रामपुरिया said...

अत्यंत ही मार्मिक पोस्ट.

रामराम.

विनीत कुमार said...

ये एक अच्छी लघुकथा है।..

विनीत कुमार said...

ये एक अच्छी लघुकथा है।..

कुश said...

यही तो वो बात है आपमें कि जिस पर फ़िदा हु मै.. आप रेगुलर रहो जीतू भाई

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

वो सुबह कभी तो आयेगी... जब आम भी ख़ास होगा और आम आम हो पायेगा.
बहुत सुन्दर!

JHAROKHA said...

na jaaane kitne aise log bhre pade hai jinko majburivash apni ichchhao ka gala ghontana padta hai. yah de kh kar dukh hota hai,par khushi is baat ki mili ki aapne un baba ji ki ichchha ko pura kiya vo bhipunah unhe fir se bulakar .sach puchhiye to aapke is nek kaam se mujhe badi khushi mili hai .aap sach me komal dil ke hai varna kitne log aise hai jo jaan buujh kar ise andekha kar jaate hai .mujhe aisa lag raha hai ki duvayen aapko jaroor lagengi baba ki . sachhi seva kabhi vyarth nahi jaati. aapko dil se dhanyvaad
poonam

दिगम्बर नासवा said...

कोई चाह या इंसान के ज़ज्बात कभी कभी क्या क्या करा देते हैं .... पर ये भी सच है की कुछ करने से असीम शांति मिलती है ....बहुत संवेदन शील लिखा है आपने ...

आशीष/ ASHISH said...

Dukh hua padh kar.....
Bas aur kuchh nahin kehna mujhe!

अनूप शुक्ल said...

बेहतरीन संस्मरण/पोस्ट!