
ये वो जमाना था जब स्कूल-कॉलेज के दिनों में रंग, बलमा, कभी हाँ- कभी ना, दीवाना, चॉंदनी, लाल दुपट्टा मलमल का, तेजाब,

आज जब 20-30 रूपये के एक एम.पी.थ्री. में 50 से लेकर 150 गाने तक आ जाते हैं तब वे दिन याद आते हैं जब इसी कीमत पर एक कैसेट मिला करता था- A साइड में 4-5 गाने और B साइड में भी इतने ही गाने। कम ही फिल्मों में 10 गाने होते थे इसलिए एक कैसेट को संपूर्ण बनाने के लिए चार फॉर्मूले आजमाए जाते थे-
1)हिट गाने को एक बार गायक की आवाज में,
2)उसी गाने को गायिका की आवाज में
3) उसी गाने को दोनों की आवाज में
4) उसी गाने का सैड वर्जन।
मेरा ख्याल है यह फॉर्मूला हिट गानों के साथ तो आजमाया जा सकता था लेकिन सभी गानों के साथ नहीं। इसलिए बाद के दिनों में दो चीजें सामने आईं-
पहली बात तो ये थी कि कैसेट की कीमतों में इजाफा हुआ, वे 35 से 50 रूपये में मिलने लगीं। तब भी टी.सीरीज़ की कैसेट सबसे सस्ती हुआ करती थी और एच.एम.वी. सबसे महंगी। बाकियों के नाम तो अब याद करने पड़ेंगे- वीनस,टिप्स, टाइम और न जाने क्या-क्या।
दूसरी बात, एक ही कैसेट में दो फिल्मों के गाने रखे जाने लगे। और बाद में तो 3-4 फिल्मों के गाने भी एक ही कैसेट में नजर आने लगे।
इन कैसेट्स को ज्यादा दिन तक इस्तमाल न करने पर उनमें सीलन आ जाती थी, रील फँसने का डर रहता था। जो कैसेट बर्बाद हो जाते थे, उसकी रील से मैंने पतंग उड़ाने की नाकाम कोशिश भी की थी।
खैर, एम.पी.थ्री. और सीडी, डीवीडी के आने के बाद मनोरंजन संसार में क्रांति-सी आ गई और कैसेट्स इतिहास के पन्नों में दफन होने लगे। हालॉंकि उक्त कंपनियॉं घाटे के बावजूद अब भी चल रही हैं।
एक छोटे से कस्बे की सीडी की दुकान से मैं एम.पी.थ्री. पसंद कर रहा था, और मेरे बगल में एक बुजुर्ग महिला कैसेट खरीद रही थी। उसने मुझसे पूछा कि बेटा देखकर बताना ये कैसेट चल तो जाएगा ना! मैंने कैसेट चेक करते हुए यूँ ही पूछ लिया कि दादी अम्मा, कैसेट पर इतने पैसे खराब क्यों कर रही हो। सीडी प्लेपयर क्यों नहीं ले लेती?
अम्मा मुस्कुराती हुई बोली- बेटा बात कैसेट की नहीं है, यह उस रिकॉर्डर पर चलती है, जिसे मेरे पति ने खास मेरे लिए खरीदा था, सन् 1980 में!