मेरे दोस्त ने अपने ऑफिस में साफ-सफाई और पानी वगैरह देने के लिए एक दुबला-पतला लड़का रखा था। उसका नाम चिरंजीलाल था। एक दिन जब मै वहीं बैठा था तो उसे बुलाकर मेरे मित्र ने उसे इशारे से समझाया कि साब् को पानी पिलाओ। उसे इस ऑफिस में आए हुए ये दूसरा ही दिन था। मैंने अपने मित्र से पूछा कि इसका नाम ऐसा क्यों रखा है और क्यां इसे सुनाई नहीं देता है?
मेरे मित्र ने हँसते हुए कहा कि ऐसी बात नहीं है। यह बंगाल के किसी गॉंव से निकलकर पहली बार दिल्ली आया है और हिंदी इसे बिल्कुंल नहीं आती है। वैसे इसका नाम चरणजीत है पर जब वह अपना नाम बताता है तो बँगला टोन की वजह से ‘चिरंजी’ सुनाई पड़ता है बाकि ‘लाल’ तो हमने प्यार से लगा दिया है।
अब कल की ही बात बताऊँ, अपने कमरे से मैंने कॉल बेल बजायी तो अंदर आने की बजाए बाहर देखने चला गया कि बाहर कौन है। मेरे साथ बैठे सज्जन ने जब ये देखा तो हँसते हुए बोले कि उसने कॉल बेल सुनकर शायद ये समझा कि छुट्टी का टाइम हो गया है!
इस शापिंग कॉम्प्लैक्स में मेरे मित्र के ऑफिस के ऊपर भी कई दुकाने हैं। एक दिन उसने चिरंजी को मोबाइल का रिचार्ज कूपन लाने को भेजा। थोड़ी देर बाद आकर वह टूटी-फूटी हिंदी में कहता है-
’बाइर तो शौब दुकान बौंद है, ऊपर वाला भी नाई है।‘
यह सुनकर उसके साथ बैठे सज्जन कहते हैं कि जब मंदी के दौर में भगवान ने ये धंधा शुरू ही कर दिया है तो मैं उनसे बाल कटवा ही आता हूँ :)
Tuesday, 18 August 2009
Wednesday, 5 August 2009
याद जो तेरी आई बहना !!
कितने सावन बीते,
कुछ याद नहीं,
मिला नहीं अबतक,
अवसाद यही!
बरबस ऑंखे भर आई है,
बहना जो तू याद आई है!
ठीक है कि
जिंदगी लंबी नहीं,
बड़ी होनी चाहिए!
पर जीने के लिए उनमें
रिश्तों की कड़ी होनी चाहिए।
.........ये कड़ी तू थी बहना!
जब तू नन्हीं थी, न्यारी थी
गोद लिए फिरता-इठलाता था
मेरी बहना-मेरी बहना!
कहकर तूझे बहलाता था।
फिर जाने कब बड़ी हुई
’पराय घर’ कहकर
जाने को खड़ी हुई।
छुपकर तब......
......मैं रोया था बहना!
याद है तूझको
खेल-खेल में
गिरा दिया था मैंने।
खून देखकर इतना
मैं घबराया था कितना!
’मैं खुद गिरी’ मॉं से कह कर
तुमने मुझे बचाया था बहना!
और ऐसी कितनी हैं बातें
जिसके लिए तब
माना नहीं अहसान
......आज माना है ये बहना!
अब तू अपने घर
मैं अपने घर
जाने कब बीत गई उमर
....तूने नहीं बताया बहना!
वो गलियॉं छूटी
वो साइकिल टूटी
साथ रही तू इस कदर
पीछे-पीछे परछाई बहना!
गृहस्थ-जीवन की कथा
कह दी यदा-कदा
दिन-दिन की व्यथा
सहती रही सदा।
.....अब कहॉं कुछ कहती बहना!
सुना है सत्तर की जिंदगी
होती है बहुत बड़ी।
पर सतरह साल तक
बचपन जो संग जिया
.........उम्र वही बड़ी थी बहना!
बड़े चाव से खरीदी है
तेरे नाम से राखी बहना!
परदेस में हूँ सो भूल गया-
यूँ न कुछ कहना बहना।
अपने ही हाथों से मैंने
बॉंधी इसे कलाई पर
सच कहूँ मन भर आया
याद जो तेरी आई बहना!
वो अठन्नी दो आने
भींची मुट्ठी खोल दे बहना!
इससे ज्या्दा पैसे दूँगा
प्यार से ‘भैया’ बोल दे बहना!
जी-भर लड़ ले,
कुछ न कहूँगा
पर ये कहे बिन
नहीं रहूँगा-
'वो मिठाई का आधा हिस्सा
आज भी बकाया है मेरी बहना!'
-जितेन्द्र भगत
(अपनी बहन को समर्पित ये कविता; उसी को याद करते हुए, जो मुझसे काफी दूर रहती है, हर बार राखी भेजती है मगर समय पर पहुँच नहीं पाती:)
कुछ याद नहीं,
मिला नहीं अबतक,
अवसाद यही!
बरबस ऑंखे भर आई है,
बहना जो तू याद आई है!
ठीक है कि
जिंदगी लंबी नहीं,
बड़ी होनी चाहिए!
पर जीने के लिए उनमें
रिश्तों की कड़ी होनी चाहिए।
.........ये कड़ी तू थी बहना!
जब तू नन्हीं थी, न्यारी थी
गोद लिए फिरता-इठलाता था
मेरी बहना-मेरी बहना!
कहकर तूझे बहलाता था।
फिर जाने कब बड़ी हुई
’पराय घर’ कहकर
जाने को खड़ी हुई।
छुपकर तब......
......मैं रोया था बहना!
याद है तूझको
खेल-खेल में
गिरा दिया था मैंने।
खून देखकर इतना
मैं घबराया था कितना!
’मैं खुद गिरी’ मॉं से कह कर
तुमने मुझे बचाया था बहना!
और ऐसी कितनी हैं बातें
जिसके लिए तब
माना नहीं अहसान
......आज माना है ये बहना!
अब तू अपने घर
मैं अपने घर
जाने कब बीत गई उमर
....तूने नहीं बताया बहना!
वो गलियॉं छूटी
वो साइकिल टूटी
साथ रही तू इस कदर
पीछे-पीछे परछाई बहना!
गृहस्थ-जीवन की कथा
कह दी यदा-कदा
दिन-दिन की व्यथा
सहती रही सदा।
.....अब कहॉं कुछ कहती बहना!
सुना है सत्तर की जिंदगी
होती है बहुत बड़ी।
पर सतरह साल तक
बचपन जो संग जिया
.........उम्र वही बड़ी थी बहना!
बड़े चाव से खरीदी है
तेरे नाम से राखी बहना!
परदेस में हूँ सो भूल गया-
यूँ न कुछ कहना बहना।
अपने ही हाथों से मैंने
बॉंधी इसे कलाई पर
सच कहूँ मन भर आया
याद जो तेरी आई बहना!
वो अठन्नी दो आने
भींची मुट्ठी खोल दे बहना!
इससे ज्या्दा पैसे दूँगा
प्यार से ‘भैया’ बोल दे बहना!
जी-भर लड़ ले,
कुछ न कहूँगा
पर ये कहे बिन
नहीं रहूँगा-
'वो मिठाई का आधा हिस्सा
आज भी बकाया है मेरी बहना!'
-जितेन्द्र भगत
(अपनी बहन को समर्पित ये कविता; उसी को याद करते हुए, जो मुझसे काफी दूर रहती है, हर बार राखी भेजती है मगर समय पर पहुँच नहीं पाती:)
Saturday, 1 August 2009
रूटीन!!
पड़ोसी का स्कूटर सुबह की नींद में खलल डाल रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे सपने में किसी को किक लगाते हुए सुन रहा हूँ और स्कूटर स्टार्ट न होने से एक बेचैनी-सी हो रही है। उस पड़ोसी को न मैं जानता हूँ और न उसके स्कूटर से मेरा कोई वास्ता है, पर पता नहीं क्यों ऐसा लगता है कि इसका स्कूटर स्टार्ट होना चाहिए। अचानक नींद खुल जाती है। स्कूटर की आवाज भी बंद है। मुझे लगता है मैंने सपना ही देखा था। मैं उठकर बाल्कनी में आ जाता हूँ।
दूसरी तरफ एक आदमी एक स्कूटर के इंजन के आसपास कुछ करता नजर आ जाता है।
दृश्य दो
मैं तैयार होकर ऑफिस के लिए निकल पड़ता हूँ। रास्ते में एक इंडिका कार बंद पड़ी है। लोग उसे धक्का लगा रहे हैं। गेयर लगाते ही गाड़ी झटका देती है, ऐसा लगता है कि अबकि बार कार चल पड़ेगी। गाड़ी घुर्र-घुर्र करके फिर खड़ी हो जाती है। धक्का लगानेवाले एक-दूसरे को देख रहे हैं....
मेरा ऑफिस आ गया है।
दृश्य तीन
ऑफिस में मेरे बगल की कुर्सी के साथ रामबाबू की कुर्सी है। वे दमे के मरीज हैं, एक दवा हमेशा साथ रखते हैं। खाँसी उठती है तो उठती ही चली जाती है।
आज उन्हें वैसी ही खॉंसी उठी है। गोली खाने के बाद वह रूक भी नहीं रही है। कोई पानी दे रहा है तो कोई आश्वासन। मुँह से खून आने लगा है। एम्बुलेंस बुलाई गई है। आधे घण्टे तक एम्बुलेंस के पहुँचने की संभावना है। वैसे रामबाबू के चचेरे भाई के पास एक कार भी है और वह इसी बिल्डिंग के पॉंचवें माले पर काम करता है। यह दूरी रिश्तों की दूरी से छोटी है, फिर भी वह नीचे नहीं आ पाएगा; यहॉं काम करनेवाले सभी लोगों का यही मानना हैं...... ओर मैं भी मानता हूँ।
दृश्य चार
शाम को ऑफिस से घर लौट रहा हूँ। सड़क पर एक लड़का बस पकड़ने के लिए चलती बस के पीछे भाग रहा है। दरवाजे का रॉड पकड़ने के बावजूद वह लड़खड़ा गया है। वहॉं खड़े कुछ लोगों का मत है कि उसका गिरना तय है जबकि कुछ लोगों को विश्वास है कि वह बस में चढ़ जाएगा।
सड़क के साथ बने एक पार्क में कुछ बुजुर्ग यह दृश्य् देख रहे हैं कि देखें क्या होता है। इनके मन में बस यही भाव आ रहा है कि अब उनकी उम्र दौडकर बस में चढ़ने की रही नहीं।
दृश्य पॉच
मैं घर आ गया हूँ। मेरा बेटा मेरी गोद के लिए मचल रहा है। मेरे एक हाथ में मेरा बैग है और दूसरे हाथ में शाम की सब्जी् और दूध का पैकेट। बच्चे की हड़बड़ाहट से दूध का पैकेट अचानक मेरे हाथ से छूट जाता है। सबको लगता है कि दूध बिखर गया होगा लेकिन हैरानी की बात है कि ‘धम्म’ से गिरने के बावजूद वह पैकेट फटता नहीं है। रात को वही दूध पीकर मुन्ना गहरी नींद में सो जाता है।
अदृश्य
सुबह-सुबह एक किक में स्कूटर स्टार्ट हो गया है। रास्ते में कार को धक्का देनेवाले लोग नजर नहीं आ रहे हैं। आफिस में पता चलता है कि एम्बुलेंस आई ही नहीं। हॉस्पीटल में रामबाबू का चचेरा भाई रात भर रूककर उनकी देखभाल करता रहा। शाम को घर लौटा तो पता चला कि मिलावटी दूध पीने की वजह से मुन्ने की तबीयत बिगड़ गई है। मुन्ने को डॉक्टर के पास ले जाते हुए सोच रहा हूँ कि उस लड़के का क्या हुआ होगा जो बस के पीछे भाग रहा था....
दूसरी तरफ एक आदमी एक स्कूटर के इंजन के आसपास कुछ करता नजर आ जाता है।
दृश्य दो
मैं तैयार होकर ऑफिस के लिए निकल पड़ता हूँ। रास्ते में एक इंडिका कार बंद पड़ी है। लोग उसे धक्का लगा रहे हैं। गेयर लगाते ही गाड़ी झटका देती है, ऐसा लगता है कि अबकि बार कार चल पड़ेगी। गाड़ी घुर्र-घुर्र करके फिर खड़ी हो जाती है। धक्का लगानेवाले एक-दूसरे को देख रहे हैं....
मेरा ऑफिस आ गया है।
दृश्य तीन
ऑफिस में मेरे बगल की कुर्सी के साथ रामबाबू की कुर्सी है। वे दमे के मरीज हैं, एक दवा हमेशा साथ रखते हैं। खाँसी उठती है तो उठती ही चली जाती है।
आज उन्हें वैसी ही खॉंसी उठी है। गोली खाने के बाद वह रूक भी नहीं रही है। कोई पानी दे रहा है तो कोई आश्वासन। मुँह से खून आने लगा है। एम्बुलेंस बुलाई गई है। आधे घण्टे तक एम्बुलेंस के पहुँचने की संभावना है। वैसे रामबाबू के चचेरे भाई के पास एक कार भी है और वह इसी बिल्डिंग के पॉंचवें माले पर काम करता है। यह दूरी रिश्तों की दूरी से छोटी है, फिर भी वह नीचे नहीं आ पाएगा; यहॉं काम करनेवाले सभी लोगों का यही मानना हैं...... ओर मैं भी मानता हूँ।
दृश्य चार
शाम को ऑफिस से घर लौट रहा हूँ। सड़क पर एक लड़का बस पकड़ने के लिए चलती बस के पीछे भाग रहा है। दरवाजे का रॉड पकड़ने के बावजूद वह लड़खड़ा गया है। वहॉं खड़े कुछ लोगों का मत है कि उसका गिरना तय है जबकि कुछ लोगों को विश्वास है कि वह बस में चढ़ जाएगा।

सड़क के साथ बने एक पार्क में कुछ बुजुर्ग यह दृश्य् देख रहे हैं कि देखें क्या होता है। इनके मन में बस यही भाव आ रहा है कि अब उनकी उम्र दौडकर बस में चढ़ने की रही नहीं।
दृश्य पॉच
मैं घर आ गया हूँ। मेरा बेटा मेरी गोद के लिए मचल रहा है। मेरे एक हाथ में मेरा बैग है और दूसरे हाथ में शाम की सब्जी् और दूध का पैकेट। बच्चे की हड़बड़ाहट से दूध का पैकेट अचानक मेरे हाथ से छूट जाता है। सबको लगता है कि दूध बिखर गया होगा लेकिन हैरानी की बात है कि ‘धम्म’ से गिरने के बावजूद वह पैकेट फटता नहीं है। रात को वही दूध पीकर मुन्ना गहरी नींद में सो जाता है।
अदृश्य
सुबह-सुबह एक किक में स्कूटर स्टार्ट हो गया है। रास्ते में कार को धक्का देनेवाले लोग नजर नहीं आ रहे हैं। आफिस में पता चलता है कि एम्बुलेंस आई ही नहीं। हॉस्पीटल में रामबाबू का चचेरा भाई रात भर रूककर उनकी देखभाल करता रहा। शाम को घर लौटा तो पता चला कि मिलावटी दूध पीने की वजह से मुन्ने की तबीयत बिगड़ गई है। मुन्ने को डॉक्टर के पास ले जाते हुए सोच रहा हूँ कि उस लड़के का क्या हुआ होगा जो बस के पीछे भाग रहा था....
Saturday, 18 July 2009
कैसेट !!
एक दिन मैं अलमारी साफ कर रहा था। एक कोने में हैलमेट का एक डिब्बा पड़ा था। जब मैंने उसे खोलकर देखा तो समझ नहीं आया कि इसे फेंक दूँ या यूँ ही रहने दूँ। उसमें 1990-97 में रीलीज फिल्मों के हिट कैसेट्स थे।ये वो जमाना था जब स्कूल-कॉलेज के दिनों में रंग, बलमा, कभी हाँ- कभी ना, दीवाना, चॉंदनी, लाल दुपट्टा मलमल का, तेजाब,
साजन, खिलाड़ी, बाजीगर, तड़ीपार, आशिकी, सलामी, इम्तेहान, चोर और चॉंद, दिल है कि मानता नहीं, जुनून, दिल का क्या कसूर जैसे फिल्मों के गाने लोगों के जुबान पर चढ़े हुए थे। आज जब 20-30 रूपये के एक एम.पी.थ्री. में 50 से लेकर 150 गाने तक आ जाते हैं तब वे दिन याद आते हैं जब इसी कीमत पर एक कैसेट मिला करता था- A साइड में 4-5 गाने और B साइड में भी इतने ही गाने। कम ही फिल्मों में 10 गाने होते थे इसलिए एक कैसेट को संपूर्ण बनाने के लिए चार फॉर्मूले आजमाए जाते थे-
1)हिट गाने को एक बार गायक की आवाज में,
2)उसी गाने को गायिका की आवाज में
3) उसी गाने को दोनों की आवाज में
4) उसी गाने का सैड वर्जन।
मेरा ख्याल है यह फॉर्मूला हिट गानों के साथ तो आजमाया जा सकता था लेकिन सभी गानों के साथ नहीं। इसलिए बाद के दिनों में दो चीजें सामने आईं-
पहली बात तो ये थी कि कैसेट की कीमतों में इजाफा हुआ, वे 35 से 50 रूपये में मिलने लगीं। तब भी टी.सीरीज़ की कैसेट सबसे सस्ती हुआ करती थी और एच.एम.वी. सबसे महंगी। बाकियों के नाम तो अब याद करने पड़ेंगे- वीनस,टिप्स, टाइम और न जाने क्या-क्या।
दूसरी बात, एक ही कैसेट में दो फिल्मों के गाने रखे जाने लगे। और बाद में तो 3-4 फिल्मों के गाने भी एक ही कैसेट में नजर आने लगे।
इन कैसेट्स को ज्यादा दिन तक इस्तमाल न करने पर उनमें सीलन आ जाती थी, रील फँसने का डर रहता था। जो कैसेट बर्बाद हो जाते थे, उसकी रील से मैंने पतंग उड़ाने की नाकाम कोशिश भी की थी।
खैर, एम.पी.थ्री. और सीडी, डीवीडी के आने के बाद मनोरंजन संसार में क्रांति-सी आ गई और कैसेट्स इतिहास के पन्नों में दफन होने लगे। हालॉंकि उक्त कंपनियॉं घाटे के बावजूद अब भी चल रही हैं।
एक छोटे से कस्बे की सीडी की दुकान से मैं एम.पी.थ्री. पसंद कर रहा था, और मेरे बगल में एक बुजुर्ग महिला कैसेट खरीद रही थी। उसने मुझसे पूछा कि बेटा देखकर बताना ये कैसेट चल तो जाएगा ना! मैंने कैसेट चेक करते हुए यूँ ही पूछ लिया कि दादी अम्मा, कैसेट पर इतने पैसे खराब क्यों कर रही हो। सीडी प्लेपयर क्यों नहीं ले लेती?
अम्मा मुस्कुराती हुई बोली- बेटा बात कैसेट की नहीं है, यह उस रिकॉर्डर पर चलती है, जिसे मेरे पति ने खास मेरे लिए खरीदा था, सन् 1980 में!
Wednesday, 15 July 2009
‘ब्लॉग-साहित्य’ पर शोध की संभावना !!
ज्ञानदत्त जी ने ब्लॉग पर लिखे जाने वाले साहित्य के लिए 'साइबेरित्य' नाम दिया है।
मैं ब्लॉग में लिखी जाने वाले साहित्य के लिए ‘ब्लॉगित्य’ या 'ब्लॉगहित्य' शब्द सुझाना चाहूँगा। वैसे साधारण शब्दों में ‘ब्लॉग-साहित्य’ कहने पर भी वह अपने अर्थ को सही संप्रेषित करता है। सवाल ये है कि इस नाम को पहचान देने वाली प्रवृतियों को कैसे सीमाबद्ध किया जाए, और कबाड़ में से काम की चीज कैसे ढ़ूँढ़ी जाए यानी साहित्यिक सामग्री को कैसे सूचीबद्ध किया जाए। इस शोध-कार्य के लिए चिट्ठा-चर्चा की भूमिका ऐतिहासिक साबित होने वाली है, और उसके बिना ब्लॉग-साहित्य की समझ अधूरी ही रह जाएगी।
हिन्दी साहित्य में रामचंद्र शुक्ल जी जैसे आलोचकों ने साहित्य को कई विभागों में विभाजित किया है, काल और प्रवृति के अनुसार उनको विवेचित किया है। मेरा मानना है कि वह दिन दूर नहीं, जब ब्लॉग पर लिखी जाने वाली कहानियों, कविताओं, यात्रा-वृतांतों, संस्मरण, आत्मकथा आदि पर शोधकार्य होना आरंभ हो जाएगा।
इसका स्पष्ट कारण ये है कि ब्लॉग पर लिखी जानेवाली अच्छी रचनाओं को ज्यादा दिन तक उपेक्षित नहीं रखा जा सकता। एक समय यह भी संभव है कि ब्लॉग ही साहित्य की कसौटी बन जाए, और पुस्तक रूप में छपने पर पाइरेटेड मानी जाए।
ब्लॉग साहित्य है या नहीं, इस पर काफी चर्चा हुई। मैं अपना मत यहॉं रखते हुए कहना चाहूँगा कि प्रिंट मीडिया की तरह ही ब्लॉग एक माध्यम भर है अपनी रचनाओं को प्रस्तुत करने के लिए। अब जैसे प्रिंट मीडिया स्थापित साहित्यकारों को छापते रहते हैं और कोई नवोदित रचनाकार अपनी पाण्डुलिपि लिए चार-पॉंच साल के लिए कतार में खड़े रहते हैं, ब्लॉग ने वह कतार तोड़ दी है। ब्लॉग एक ऐसा ‘बिग-बाजार’ है कि यहॉं चौबीसो घंटे सेल लगा रहता है, इसलिए इसमें बेतहाशा भीड़ होना लाजमी है। साथ ही कंपनी का लेबल चिपकाकर यहॉं कई बार खराब माल भी धड़ल्ले से बिक जाता है, तो कई बार उम्दा माल ग्राहकों को या तो महंगा लगता है या समझ से परे। खैर, ये तो ब्लॉग-साहित्य की बात है।
आज जो साहित्य पत्रिकाओं में छप रही हैं, उसकी भाषा गरिष्ठ और दार्शनिक होती जा रही हैं, और यही कारण है कि उसे पढ़ने के लिए अब आम आदमी की अभिरूचि घटी है और उसका एकेडेमिक महत्व ज्यादा रह गया है। पत्रिकाऍं अब वैचारिक हथियार के रूप में इस्तमाल हो रही है जिसमें संपादक/लेखक एक दूसरे पर प्रहार करते ज्यादा नजर आते हैं। अलबत्ता इनमें अच्छी कविताऍं/कहानियॉं जरूर पढ़ने को मिल जाती हैं।
साहित्य के क्षेत्र में प्रतिवर्ष नगण्य शोधकार्य ही अपनी मौलिकता और सर्जनात्मकता के कारण चर्चा का विषय बनते हैं। आज जब एक से एक घटिया विषयों पर शोध-कार्य हो सकता है, किसी प्रोफेसर/प्राध्यापक के मित्र कवि के रद्दी काव्य-संग्रह को शोध के काबिल समझा जा सकता है तो मुझे लगता है कि हमारे ब्लॉग जगत में एक-से-एक अनमोल हीरे हैं, जिनके रचनात्मक विवेक को किसी महान रचनाकार से कम नहीं ऑका जा सकता। सवाल है कि हम ऐसी रचनाओं को एकमत से स्वीकार करें और निरपेक्ष भाव के साथ उसके साहित्यिक महत्व का मूल्यांकन करें।
तो मित्रों, भरोसा रखें, आप इतिहास रच रहे हैं,ब्लॉग में साहित्य रच रहे हैं, अभी शैशवावस्था में कुछ अस्थिरता जरूर नजर आ रही है मगर इसका भविष्य अत्यंत उज्ज्वल है।
जाते-जाते:
आशा जोगलेकर जी की कविता इस संदर्भ में प्रिय लगी-
कितनों ने यहाँ देखो कितने कलाम लिख्खे
संपादकों के दफ्तर कितने पयाम रख्खें ।
जूते ही घिस गये रे चक्कर लगा लगा कर
फिर देखा प्रकाशक की भी हाजिरी लगा कर ।
कविता की ये किताबें बिकती नही है यारों
शायर की मुफलिसी है दुनिया में आम यारों ।
इसी से तो ब्लॉग पर ही लिखने की हमने ठानी।
.......
मैं ब्लॉग में लिखी जाने वाले साहित्य के लिए ‘ब्लॉगित्य’ या 'ब्लॉगहित्य' शब्द सुझाना चाहूँगा। वैसे साधारण शब्दों में ‘ब्लॉग-साहित्य’ कहने पर भी वह अपने अर्थ को सही संप्रेषित करता है। सवाल ये है कि इस नाम को पहचान देने वाली प्रवृतियों को कैसे सीमाबद्ध किया जाए, और कबाड़ में से काम की चीज कैसे ढ़ूँढ़ी जाए यानी साहित्यिक सामग्री को कैसे सूचीबद्ध किया जाए। इस शोध-कार्य के लिए चिट्ठा-चर्चा की भूमिका ऐतिहासिक साबित होने वाली है, और उसके बिना ब्लॉग-साहित्य की समझ अधूरी ही रह जाएगी।
हिन्दी साहित्य में रामचंद्र शुक्ल जी जैसे आलोचकों ने साहित्य को कई विभागों में विभाजित किया है, काल और प्रवृति के अनुसार उनको विवेचित किया है। मेरा मानना है कि वह दिन दूर नहीं, जब ब्लॉग पर लिखी जाने वाली कहानियों, कविताओं, यात्रा-वृतांतों, संस्मरण, आत्मकथा आदि पर शोधकार्य होना आरंभ हो जाएगा।
इसका स्पष्ट कारण ये है कि ब्लॉग पर लिखी जानेवाली अच्छी रचनाओं को ज्यादा दिन तक उपेक्षित नहीं रखा जा सकता। एक समय यह भी संभव है कि ब्लॉग ही साहित्य की कसौटी बन जाए, और पुस्तक रूप में छपने पर पाइरेटेड मानी जाए।
ब्लॉग साहित्य है या नहीं, इस पर काफी चर्चा हुई। मैं अपना मत यहॉं रखते हुए कहना चाहूँगा कि प्रिंट मीडिया की तरह ही ब्लॉग एक माध्यम भर है अपनी रचनाओं को प्रस्तुत करने के लिए। अब जैसे प्रिंट मीडिया स्थापित साहित्यकारों को छापते रहते हैं और कोई नवोदित रचनाकार अपनी पाण्डुलिपि लिए चार-पॉंच साल के लिए कतार में खड़े रहते हैं, ब्लॉग ने वह कतार तोड़ दी है। ब्लॉग एक ऐसा ‘बिग-बाजार’ है कि यहॉं चौबीसो घंटे सेल लगा रहता है, इसलिए इसमें बेतहाशा भीड़ होना लाजमी है। साथ ही कंपनी का लेबल चिपकाकर यहॉं कई बार खराब माल भी धड़ल्ले से बिक जाता है, तो कई बार उम्दा माल ग्राहकों को या तो महंगा लगता है या समझ से परे। खैर, ये तो ब्लॉग-साहित्य की बात है।
आज जो साहित्य पत्रिकाओं में छप रही हैं, उसकी भाषा गरिष्ठ और दार्शनिक होती जा रही हैं, और यही कारण है कि उसे पढ़ने के लिए अब आम आदमी की अभिरूचि घटी है और उसका एकेडेमिक महत्व ज्यादा रह गया है। पत्रिकाऍं अब वैचारिक हथियार के रूप में इस्तमाल हो रही है जिसमें संपादक/लेखक एक दूसरे पर प्रहार करते ज्यादा नजर आते हैं। अलबत्ता इनमें अच्छी कविताऍं/कहानियॉं जरूर पढ़ने को मिल जाती हैं।
साहित्य के क्षेत्र में प्रतिवर्ष नगण्य शोधकार्य ही अपनी मौलिकता और सर्जनात्मकता के कारण चर्चा का विषय बनते हैं। आज जब एक से एक घटिया विषयों पर शोध-कार्य हो सकता है, किसी प्रोफेसर/प्राध्यापक के मित्र कवि के रद्दी काव्य-संग्रह को शोध के काबिल समझा जा सकता है तो मुझे लगता है कि हमारे ब्लॉग जगत में एक-से-एक अनमोल हीरे हैं, जिनके रचनात्मक विवेक को किसी महान रचनाकार से कम नहीं ऑका जा सकता। सवाल है कि हम ऐसी रचनाओं को एकमत से स्वीकार करें और निरपेक्ष भाव के साथ उसके साहित्यिक महत्व का मूल्यांकन करें।
तो मित्रों, भरोसा रखें, आप इतिहास रच रहे हैं,ब्लॉग में साहित्य रच रहे हैं, अभी शैशवावस्था में कुछ अस्थिरता जरूर नजर आ रही है मगर इसका भविष्य अत्यंत उज्ज्वल है।
जाते-जाते:
आशा जोगलेकर जी की कविता इस संदर्भ में प्रिय लगी-
कितनों ने यहाँ देखो कितने कलाम लिख्खे
संपादकों के दफ्तर कितने पयाम रख्खें ।
जूते ही घिस गये रे चक्कर लगा लगा कर
फिर देखा प्रकाशक की भी हाजिरी लगा कर ।
कविता की ये किताबें बिकती नही है यारों
शायर की मुफलिसी है दुनिया में आम यारों ।
इसी से तो ब्लॉग पर ही लिखने की हमने ठानी।
.......
Friday, 10 July 2009
बूँदो को कहीं देखा है !!
बेरंग पत्तों पर सरसराती बूँदों को देखे एक अरसा हुआ!
मुरझाए चेहरों के पीछे
मन तक है तरसा हुआ!
अभी एक कार रूकी है रेड लाइट पर
कि यकायक चल पड़ा है वाइपर!
भीखू की हथेली पर पड़ी है चार बूँदें मचलकर अपनी बहन को दिखा रहा है,
जो अभी छल्ले का करतब दिखाके
सुस्ता रही है छॉव में।
कभी जोर की बारिश मेंछतरी उड़ा करती थी,
चहकते कदमों तले
राहें मुड़ा करती थी!
अब धूल है, ऑंधी है
गर्म हवाओं में होश उड़ा करता है!
आसमॉं पे होते थे परींदों के घेरे।
नजरें तलाशती-सी हैं
बादलों के डेरे!
सुना है तेरे शहर में
हुई है बारिश!
कि हवा का कोई झोंका
सिहराता है मन को
और बूँदे तन को!
कि भीखू के चेहरे पर
चमक लौट आई है!
साथ ही लौटी है
खेतीहरों के खेतों में
सूखे फसलों की जीजिविषा!!

और
अभी एक सपना देखा था
और अभी एक सपना टूटा है!!
बारिश की कोई बूँद
ऑंखों से छलक आई है...........
-जितेन्द्र भगत
(सभी चित्र गूगल से साभार)
Sunday, 5 July 2009
ताकतवर-कमजोर और सही-गलत का युग्म क्या एक दूसरे के विरोधी हैं?
जिंदगी के अनुभव के दौरान कई सवाल पैदा होते हैं। एक ऐसा ही सवाल जेहन में आता है- ताकतवर-कमजोर और सही-गलत का युग्म क्या एक दूसरे के विरोधी हैं? जब मैं सही-गलत की बात सोचता हूँ तब डार्विन की बात याद आती है- वही जीवित रह पाता है जो ताकतवर है। इसका मतलब यह है कि संसार सिर्फ ताकतवर लोगों के लिए है। क्या यह सार्वभौम सिद्धांत है? अगर यह सही होता तो सामाजीकरण की प्रक्रिया में सही-गलत का कभी कोई सवाल उठाया ही नहीं गया होता ?
हम सभी ये जानते हैं कि आज प्राय: हर देश का एक संविधान है। वहॉं सही-गलत को ही आधार बनाकर सामाजिक संरचना नीर्मित की जाती है। नगर का ताकतवर समुदाय या व्यक्ति किसी कमजोर समुदाय या व्यक्ति को दबाने का प्रयास न करे, इसी चीज़ के लिए कानून-कायदे बनाए जाते हैं, यानी सभ्यता के क्रमिक विकास में इस बात पर जोर दिया गया कि ताकत को नियंत्रित करने के लिए सही-गलत को आधार बनाया जाए। इस आधार को नैतिक माना गया।
सिकंदर, नेपोलियन, हिटलर ने विश्व विजेता बनने के लिए कई देशों पर कब्जा किया, खून की नदियॉं बहाई, नगरों में घुस-घुसकर आम लोगों की नृशंस हत्याऍं कीं।

इन विजेताओं ने अपने नजरिए से यह सुनिश्चित किया कि सही क्या है।
तो क्या ये मान लिया जाए कि सही-गलत का विचार एक वैयक्तिक विचार है, एक भावात्माक विचार है। और इस आधार पर यह तो सुनिश्चित किया जा सकता है
कि कौन ताकतवर है और कौन कमजोर मगर यह कभी सुनिश्चित नहीं किया जा सकता कि क्या गलत है और क्या सही। पता नहीं किसने कहा था- सत्य की हमेशा जीत होती है !!!!
हम सभी ये जानते हैं कि आज प्राय: हर देश का एक संविधान है। वहॉं सही-गलत को ही आधार बनाकर सामाजिक संरचना नीर्मित की जाती है। नगर का ताकतवर समुदाय या व्यक्ति किसी कमजोर समुदाय या व्यक्ति को दबाने का प्रयास न करे, इसी चीज़ के लिए कानून-कायदे बनाए जाते हैं, यानी सभ्यता के क्रमिक विकास में इस बात पर जोर दिया गया कि ताकत को नियंत्रित करने के लिए सही-गलत को आधार बनाया जाए। इस आधार को नैतिक माना गया।

सिकंदर, नेपोलियन, हिटलर ने विश्व विजेता बनने के लिए कई देशों पर कब्जा किया, खून की नदियॉं बहाई, नगरों में घुस-घुसकर आम लोगों की नृशंस हत्याऍं कीं।

इन विजेताओं ने अपने नजरिए से यह सुनिश्चित किया कि सही क्या है।
तो क्या ये मान लिया जाए कि सही-गलत का विचार एक वैयक्तिक विचार है, एक भावात्माक विचार है। और इस आधार पर यह तो सुनिश्चित किया जा सकता है
कि कौन ताकतवर है और कौन कमजोर मगर यह कभी सुनिश्चित नहीं किया जा सकता कि क्या गलत है और क्या सही। पता नहीं किसने कहा था- सत्य की हमेशा जीत होती है !!!!
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