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Tuesday, 22 June 2010

पर्वतों से आज मैं टकरा गया........(भाग 4)

बद्रीनाथ से लौटते हुए जोशीमठ में अंधेरा हो चुका था। रात वहीं होटल में रूके। सुबह 4 बजे मैंने नीति‍न को औली चलने के लि‍ए उठाया जो यहॉं से 12 कि.मी. ही दूर था। सोचा था, हम दोनों औली से 10 बजे तक लौट आऍंगे और उसके बाद सभी दि‍ल्‍ली के लि‍ए रवाना हो जाऍंगे। मगर सोचा हुआ होता कहॉं है।

जैसे ही हम दोनों चलने को हुए, शैलेंद्र जी और रोहित- दोनों औली जाने के लि‍ए तैयार मि‍ले। पहले तो इरादा था कि‍ जोशीमठ से रोपवे (केबल कार) के द्वारा औली पहुँचा जाए, मगर 6 बजे ये संभव नहीं था। उसका कि‍राया 500/- प्रति‍ व्‍यक्‍ति‍ था, और वह 9 बजे से आरंभ होता था। बजट और समय- दोनों का नुक्‍सान देखते हुए मैंने कार से ही जाना तय कि‍या। ऊपर सड़क मार्ग खत्‍म होने के बाद 2-3 कि.मी. पैदल चलना पड़ा। कार भी पहले ही खड़ी करनी पड़ी क्‍योंकि‍ रास्‍ते में बड़े गड्ढे और उभरी हुई चट्टानें थी।

वहॉं से हमारे चारो तरफ ऊँचे-ऊँचे पहाड़ ही नजर आ रहे थे। माना पर्वत,अल गामि‍न, कामेट, मुकुट पर्वत, त्रि‍शूल और नंदा देवी जैसे प्रसि‍द्ध पर्वतीय चोटि‍यॉं के अलावा हाथी-घोड़ा-पालकी और सुमेरू पर्वत सर उठाए खड़े थे। सुमेरू पर्वत का नाम रामायण में आता है, जब लक्ष्‍मण के लि‍ए हनुमान संजीवनी बूटी ढूँढते हुए यहॉं आए थे और इस पर्वत को उठा ले गए थे। इसलि‍ए हैरानी की बात नहीं कि‍ यहाँ के गॉंव में हनुमान की पूजा नहीं की जाती है।

मेरा 5 मेगापि‍क्‍सल का नि‍कॉन कैमरा धुंध में तस्‍वीरें लेने में नाकाम रहा क्‍योंकि उसका ऑटोफोकस खराब हो चुका था। इसलि‍ए जानकारी के लि‍ए गूगल की तस्‍वीरें दि‍खाकर काम चला रहा हूँ।

कंचनजंगा( 8,586 मीटर /28,169 फीट)  के बाद भारत की दूसरी सबसे ऊँची चोटी नंदा देवी ( 7,816 मीटर/25,643 फीट)मेरी दायीं तरफ ऐसी नजर आ रही थी जैसे गाए बैठी हो, वैसे तेवर शेर-चीते सा था-

नन्दा देवी पर्वत ( 7,816 मीटर/25,643 फीट)


ऑली के ठीक सामने त्रि‍शूल पर्वत नजर आता है-

त्रि‍शूल पर्वत (7,120 मीटर / 23,360 फीट)


उसके साथ कामेट और मुकुट पर्वत नजर आ रहा था-


कामेट (7,756 मीटर / 25,446 फीट) 





मुकुट पर्वत ( 7,242 मीटर / 23,760 फीट)




और बायीं तरफ देखने पर बद्रीनाथ की दि‍शा में नीलकंठ नजर आ रहा था।
नीलकंठ (6,596 मीटर / 21,640 फीट)






उसी के आसपास माना पर्वत और अल-गामि‍न भी थे-

माना पर्वत (7,272 मीटर / 23,858 फीट)
अबी गामि‍न (7,355 मीटर / 24,130 फीट)




तुलना के लि‍ए जानकारी दे रहा हूँ कि‍ वि‍श्‍व की उच्‍चतम चोटी एवरेस्‍ट की ऊँचाई 8,848 मीटर / 29,029 फीट है जो नेपाल में है। उसके बाद  के-2 (ऊॅंचाई- 8611 मीटर/ 28251) का नंबर आता है जो पाकि‍स्‍तान में है।


पर्वतों के बीच ईश्‍वर की इस भव्‍य और वि‍शालकाय रचना से अपनी लघुता और छुद्रता- दोनों का अहसास हो रहा था।
इन पर्वतों को देखकर ऐसा लग रहा था मानों ये सीख दे रही हो कि‍ वि‍शाल होना उतना महत्‍वपूर्ण नहीं है, महत्‍वपूर्ण है वि‍शाल होते हुए स्‍थि‍र रहना। इतनी ऊँचाई पर हम सोचते हैं कि‍ हमने पर्वतों पर फतह कर ली। पर सच्‍चाई ये है कि‍ हमने प्रकृति‍ के मूल रूप को सड़क मार्ग, वृक्ष उन्‍मूलन और डैम-निर्माण से रौंद डाला।
इसलि‍ए मुझे कभी-कभी लगता है कि‍ प्रकृति‍ जहॉ सबसे सुंदर नजर आती है, वहीं वह क्रूरतम रूप में प्रकट होकर मनुष्‍यों से प्रति‍कार लेती है। पि‍छले 200 सालों में उत्‍तराखण्‍ड 116 भूकंप झेल चुका है और उनमें सबसे ज्‍यादा वि‍नाश 1803, 1905, 1988 और 1991 में हुआ था।

ऑली लगभग 3000 मीटर की ऊँचाई पर स्‍थि‍त एक बेहद छोटा हि‍ल स्‍टेशन है जहॉं जी.एम.वी.एन. का एक रि‍सॉर्ट क्‍लीफ टॉप ही नजर आता है। इस मकान के अलावा यहॉं रोपवे के टावर और उसके दो स्‍टेशन नजर आते हैं।



पैदल चलते हुए हमने महसूस कि‍या कि‍ यहॉं पशुओं की हडि्डयाँ जहॉं-तहॉं बि‍खरी पड़ी थी। संभवत: ये जानवर बर्फीली ठंड न झेल पाने के कारण मर जाते होंगे।

पार्किंग-स्‍थल के पास गर्म दूध के साथ ब्रेड-बटर खाते हुए पहाड़ों को नि‍हारना अच्‍छा लग रहा था। इस बीच शैलेंद्र जी ने महसूस कि‍या कि‍ इतनी दूर आकर इन दृश्‍यों से बाकी लोग वंचि‍त रह जाऍं, यह ठीक नहीं है। उन्‍होंने फोन कर दि‍या कि‍ रोपवे आरंभ होने पर वे सभी ऑली आ जाऍं। अब वे मेरे ऑली आने के नि‍र्णय से खुश नजर आ रहे थे।

आपको ये बताना है कि‍ ऑली की इस तस्‍वीर में यह रास्‍ता कि‍स काम आता है?


रि‍सॉर्ट के पास टावर नं. 8 का रोपवे स्‍टेशन था। उसके बाद आखरी स्‍टेशन (नं 10) एक कि.मी. ऊपर नजर आ रहा था। हम टहलते हुए वहॉं तक जा पहुँचे।


मैं यह सोचकर उदास हो रहा था कि‍ कार से आने की वजह से मैं रोपवे का मजा नहीं ले पाउॅंगा। इस यात्रा के अगले और अंति‍म भाग में बताऊँगा कि‍ मैं रोपवे की सवारी कर पाया या नहीं!




फि‍लहाल आपको बॉंयी तरफ दो तस्‍वीरें दि‍‍खा रहा हूँ। आपको बताना है कि‍ ऑली में इन खंभों का इस्‍तमाल कि‍स लि‍ए कि‍या जाता है?

क्रमश:

अन्‍य कड़ि‍यॉं-
बद्रीनाथ- औली से वापसी(अंति‍म कड़ी)
बद्रीनाथ: एक रोमांचक सफर (भाग 3)
बद्रीनाथ: एक रोमांचक सफर (भाग 2)
बद्रीनाथ: एक रोमांचक सफर (भाग 1)

14 comments:

अन्तर सोहिल said...

रास्ता तो जरूर सर्दियों में स्कीईंग करने के काम में आता होगा जी
और इन खंबों पर रोपवे की ट्राली चलती होगी
बहुत सुन्दर यात्रा वृतांत चल रहा है।

प्रणाम स्वीकार करें

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुंदर विवरण ओर चित्र भी खुब सुरत

नीरज जाट जी said...

जैसा अन्तर सोहिल बता रहे हैं, अपने भी विचार वैसे ही हैं।

प्रवीण पाण्डेय said...

बड़ा मनोहारी यात्रा वृत्तान्त ।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

अब तो पहाड़ भी खतरे में आ रहे हैं.

Mrs. Asha Joglekar said...

आहा पहाडों की चोटियां देख कर आनंद आ गया । बहुत ही सुंदर तस्वीरें । लेख भी ।

rashmi ravija said...

बेहद मन मोहक तस्वीरें और सुन्दर विवरण..

अभिषेक ओझा said...

वाह !

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन said...

ऑली में इन खंभों का इस्‍तमाल कि‍स लि‍ए कि‍या जाता है?
अब तो उत्तर बता दो!

Manish Kumar said...

हम्म गूगल से ही सही पर बड़े मोहक चित्र सँजोए हैं आपने अपनी इस पोस्ट में...

Mired Mirage said...

बहुत भला लगा पढ़कर। किन्तु लगता नहीं कि ये पहाड़ बचे रहेंगे।
घुघूती बासूती

Rahul Singh said...

बहुत सुंदर, लाजवाब.

Umra Quaidi said...

लेखन के लिये “उम्र कैदी” की ओर से शुभकामनाएँ।

जीवन तो इंसान ही नहीं, बल्कि सभी जीव जीते हैं, लेकिन इस समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, मनमानी और भेदभावपूर्ण व्यवस्था के चलते कुछ लोगों के लिये मानव जीवन ही अभिशाप बन जाता है। अपना घर जेल से भी बुरी जगह बन जाता है। जिसके चलते अनेक लोग मजबूर होकर अपराधी भी बन जाते है। मैंने ऐसे लोगों को अपराधी बनते देखा है। मैंने अपराधी नहीं बनने का मार्ग चुना। मेरा निर्णय कितना सही या गलत था, ये तो पाठकों को तय करना है, लेकिन जो कुछ मैं पिछले तीन दशक से आज तक झेलता रहा हूँ, सह रहा हूँ और सहते रहने को विवश हूँ। उसके लिए कौन जिम्मेदार है? यह आप अर्थात समाज को तय करना है!

मैं यह जरूर जनता हूँ कि जब तक मुझ जैसे परिस्थितियों में फंसे समस्याग्रस्त लोगों को समाज के लोग अपने हाल पर छोडकर आगे बढते जायेंगे, समाज के हालात लगातार बिगडते ही जायेंगे। बल्कि हालात बिगडते जाने का यह भी एक बडा कारण है।

भगवान ना करे, लेकिन कल को आप या आपका कोई भी इस प्रकार के षडयन्त्र का कभी भी शिकार हो सकता है!

अत: यदि आपके पास केवल कुछ मिनट का समय हो तो कृपया मुझ "उम्र-कैदी" का निम्न ब्लॉग पढने का कष्ट करें हो सकता है कि आपके अनुभवों/विचारों से मुझे कोई दिशा मिल जाये या मेरा जीवन संघर्ष आपके या अन्य किसी के काम आ जाये! लेकिन मुझे दया या रहम या दिखावटी सहानुभूति की जरूरत नहीं है।

थोड़े से ज्ञान के आधार पर, यह ब्लॉग मैं खुद लिख रहा हूँ, इसे और अच्छा बनाने के लिए तथा अधिकतम पाठकों तक पहुँचाने के लिए तकनीकी जानकारी प्रदान करने वालों का आभारी रहूँगा।

http://umraquaidi.blogspot.com/

उक्त ब्लॉग पर आपकी एक सार्थक व मार्गदर्शक टिप्पणी की उम्मीद के साथ-आपका शुभचिन्तक
“उम्र कैदी”

Anonymous said...

अरे भाईसाहब, भारत की सबसे ऊँची चोटी K-2 है, जोकि पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में हैं |