तो, पिछले साल के लिहाज से इस बार बाजार में कीट-पतंगों की रौनक रही, और दुकानदारी फीकी।

ये तो थी कीड़ो की दिवाली, अब हम बड़कीड़ों ने दिवाली कैसे मनायी, इस पर भी एक नजर डालते हैं। मिठाई की दुकानों पर ऑर्डर गया हुआ है कि ऑफिस में इतने स्टाफ हैं, इतने डिब्बे पैक करने हैं, बॉस का डिब्बा अलग, मेमसाब का डिब्बा अलग, शर्मा जी का अलग, वर्मा जी का अलग, अजी त्योहार न हुआ डिब्बा-पर्व हो गया। जैसे हर धर्म में, उपासना गृह में भगवान बसते हैं, वैसे ही हर पर्व में डिब्बा बसता है।
पूँजी के बाजार ने पर्व मनाने की नई परम्परा का ईजाद किया है। शायद इसलिए अचानक हर पर्व दो-दो दिन मनाने की कवायद चल पड़ी है। छोटी दिवाली है- क्या किया जी, उपहार बॉंटे, आज बड़ी दिवाली है, क्या किया जी, आज भी उपहार बॉंटे। इस तरह होली, ईद और दूसरे पर्व भी दो-दो दिन मनाए जाने लगे हैं। पहले भी ये दो बार मनाए जाते होंगे, मगर बाजार और मीडिया ने इसे अपने मतलब से अचानक उछाला है। दिक्कत तो ये है कि शेयर बाजार में कभी आए उछाल के बाद आज जितनी गिरावट दर्ज की गई है, पर्वाश्रित इस बाजार में भी वह गिरावट नजर आएगी, यह सोचना बेमानी है। वैलेंटाइन डे, फादर्स डे, मदर्स डे, ये डे, वो डे- हर डे को मीडियावाले अपने लिए खबर का एक नया मसाला मानते हैं और बाजार माल खपाने के लिए मार्केटिंग का एक और अवसर।
दिल्ली एक महानगर है, गॉव तो है नहीं कि दरवाजे से बाहर निकले कि पड़ोस में ही रिश्तेदार या दोस्त मिल जाऍगे। यहॉं किसी को उपहार देने निकलो तो पता चलता है एक उत्तर में रहता है दूसरा दक्षिण में। बिना फोन किए जाओ तो पता चलता है कि वह पूरब गया हुआ है उपहार बॉंटने। महानगरों में पर्व मनाने के नाम पर लोगों को सिर्फ और सिर्फ उपहार का आदान-प्रदान करते देखा है मैंने। सिर्फ इस वजह से भारी ट्रैफिक जाम और दुकानों में मेला देखने को मिलता है। चीजों की खपत पर्व त्योहारों पर इतनी बढ़ जाती है कि दाम बेलगाम हो जाते हैं।
उपहार बॉंटने का सिलसिला जिनका खत्म हो जाता है, वे बम-पटाखे निकालते हैं तथा शोर और धुँओं में नोट को जलते देख खुशियॉं मनाते हैं। मि.आहूजा एण्ड फैमिली इंतजार करती है कि जब उनके पटाखे खत्म हो जाऍगे तब ये पटाखे फोड़ना शुरू करेंगे और अगले दिन चर्चा का विषय बनेंगे कि इस बार आहूजा जी ने देर रात तक, जमकर दिवाली मनायी। इस तरह, पर्व पर अनेक लोग मानो अपनी जेब में बम-पटाखे फोड़ते हैं और उस फटी जेब को अगले कई महिनों तक छिपकर रफ्फू करवाते फिरते हैं।
उम्मीद है हम बाजार और मीडिया की इस मंशा को समझेंगे और कठिन होती महानगरीय जिंदगी के लिए पैसे जोड़ने के साथ-साथ पर्व को मनाने के व्यवहारिक तरीके की तलाश करेंगे तथा पर्यावरण, परम्परा और जेब के बीच सामंजस्य और संतुलन बनाने का जतन करेंगे।